A touching and sensitive portrayal of the mental state of the youth in the current scenario


वर्तमान परिदृश्य में युवाओं की मनः स्थिति का मार्मिक और संवेदनशील शब्द चित्रण (विश्लेषण)
 
 @ डॉ दिनेश चंद्र सिंह, वरिष्ठ आईएएस (अवकाशप्राप्त)

       (client=ca-pub-6262725213669814)
                             
देश-प्रदेश में विभिन्न महत्वपूर्ण जगहों की यात्राओं और विभिन्न जिम्मेदारियों के सम्यक निर्वहन के दौरान युवाओं के संपर्क में आने, उन्हें जानने-समझने और उनके वास्ते कुछ ठोस कर गुजरने का मौका ढूंढने का मैं आदी रहता हूँ। क्योंकि जब भी मैं अपने यौवनकाल पर दृष्टिपात डालता हूँ तो समकालीन युवाओं की  पारिवारिक परिस्थितियों, उनकी आर्थिक विडंबनाओं और मानसिक संघर्ष जनित वेदनाओं से जुड़ीं कटु-मधु यादें स्वतः तरोताजा हो जाती हैं। 
                            (फ़ाइल फोटो)
समाजसेवा में मेरी नैसर्गिक अभिरुचि का एक बड़ा कारण राष्ट्रवाद, सनातनवाद, ग्रामवाद के अलावा यह युवा पीढ़ी भी है, जिसे मैं किसी भी राष्ट्र का भविष्य करार देता आया हूँ। यही वजह हैं कि वर्तमान परिदृश्य में युवाओं की मनः स्थिति का एक मार्मिक और संवेदनशील शब्द चित्रण (विश्लेषण) करने की एक अदद कोशिश भर की है ताकि अन्य युवा जागरूक व सचेत हो सकें, यही पवित्र भावना है।
                          (फ़ाइल फोटो)
उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री श्री योगी आदित्यनाथ जी मेरे प्रेरणास्रोत हैं। उनकी हिन्दू युवा वाहिनी ने समकालीन युवाओं का अच्छा मार्गदर्शन किया है, जो अनवरत रूप से जारी है। मैंने भी विघ्नहर्ता भगवान गणेश के लिए 
'ॐ श्री गणेशाय नमः", अपने ईष्ट हनुमानजी के लिए "ॐ श्री हनुमते नमः" का जप करते हुए उनदोनों प्रभुओं को साष्टांग प्रणाम करता हूँ और जगतजननी जगदंबा माता भगवती के सभी स्वरूपों को प्रणाम एवं चरणों में नमन निवेदत करता हूँ। 
पुनः अपने ईष्ट मंत्र- "अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्।सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि॥
मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्।वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये।।" का ध्यान करते हुए युवाओं के समग्र कल्याण की प्रार्थना करता हूँ, क्योंकि उनके वर्तमान कंधों पर ही अतीत के बोझ को संभालते हुए एक बेहतर भविष्य के निर्माण की जिम्मेदारी होती है।

पुनः सभी को यथाश्रेष्ठ अभिवादन करते हुए मैं अपने ताजा अनुभवों को आपसे साझा करना अपना परम कर्तव्य समझता हूं। अकस्मात स्थानांतरण के बाद विगत दो महीने से मैं वीवीआईपी गेस्ट हाउस, नैमिषारण्य लखनऊ में ही प्रवासित हूं और शीघ्र ही अपने घर के लिए प्रस्थान करूंगा। बहरहाल, दो महीने से मैं विशिष्ट अतिथि गृह (गेस्ट हाउस) में आने-जाने वाले जनप्रतिनिधिगण, युवानेता, वरिष्ठ अधिकारी एवं भविष्य में जनप्रतिनिधि बनने वाले युवा नेताओं को बहुत ही नज़दीकी से प्रशासनिक अनुभव की कसौटी पर परख एवं देख रहा हूॅं। वहीं, अधिकारियों के आगमन एवं उनके प्रवास को भी देख जान समझ रहा हूॅं। 

निर्विवाद रूप से लोकतंत्र में नागरिक (मतदाता) की महत्त्वपूर्ण भूमिका हैं। युवाओं के दो-तीन स्वप्न होते हैं। जो दूरदर्शी हैं, युगांतरकारी परिवर्तन लाना चाहते हैं। उनकी पहली पसंद आज भी राजनीति में ही है और उद्यमी भी बनना पसंद है, परंतु उसमें पूॅंजी के अभाव में यह एक सीमित लोगों (युवाओं) की पसंद है। अलबत्ता सबसे अधिक युवा अपने परिवार की परिस्थिति के कारण एवं हमारे देश की सामंतवादी मानसिकता के कारण IAS/IPS, PCS/PPS एवं अन्य महत्त्वपूर्ण सेवा में आना चाहते हैं परंतु यह कठिन,जटिल तथा अनिश्चित यात्रा का मार्ग है।

दरअसल, सीमित, भाग्यशाली, और योग्य व्यक्ति ही इस मार्ग में सफल हो पाते हैं परंतु इन सेवाओं में आने के बाद भी आप सदैव भयभीत, डरे सहमें से रहते हैं (खासकर लोकतांत्रिक सरकार और उसके मातहत प्रशासन की प्राथमिकता के कारण) और प्रशासनिक व्यस्तताओं के चलते जीवन के वास्तविक सुख एवं खुशी से दूर ही रह पाते हैं। 

वहीं, बढ़ती मानसिक उपलब्धियों के दौर में AI (एआई) के प्रयोग से रोजगार के अवसर कम होंगे और युवाओं में बेरोजगारी बढ़ने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। दिलचस्प तो यह है कि इसके लिए कोई सरकार दोषी नहीं है, बल्कि  वैश्विक स्तर पर अपने को स्थापित करने के लिए एआई तकनीक का उपयोग आवश्यक है। चूंकि वैश्विक स्तर पर चल रही व्यवस्था गत वर्चस्व की लड़ाई ने सभी राष्ट्रों को भयभीत कर रखा है। अतः युवाओं को राजनीति में जाने का एकमात्र रास्ता ही दिख रहा है।

हकीकत यह है कि राजनीति में सफलता मिलना, सभी परीक्षाओं से कठिन है, क्योंकि इसमें सफलता की गारंटी बहुत कम होती है परंतु जो सफल हो जाता है वह कुछ ही वर्षों में इतना बड़ा बन जाता है कि युवाओं के आकर्षण का केंद्र बन जाता है। इसीलिए युवाओं को राजनीति में जाने की इच्छा प्रबल रहती है। वैसे भी भीड़ सब क्षेत्र में है। ऑनलाइन खरीददारी ने उद्यम/व्यापार को ग्रामीण एवं छोटे शहरों में लगभग खत्म सा कर दिया है परन्तु फिर भी हताश/निराश होने की जरूरत नहीं है।

वास्तव में, श्रम और मेधा पर विश्वास कर के आप अपने लिए सही मार्ग चयनित करें। खासकर अपनी चाहत के कार्य क्षेत्र को चुनें। सफलता अवश्य मिलेगी, परंतु अहंकार मत पालिए। अन्यथा अंत में आप अकेले ही रह जाएंगे।  वैसे भी विभिन्न उच्च पदों पर रहकर भी जब आप सोचते हैं तो आप अकेले एवं सहमें से ही रहते हैं। मैंने पद-पाने एवं खोने की यात्रा में सदैव सभी को उद्विग्न अवस्था में देखा। इसलिए कृषि एवं व्यापार महत्वपूर्ण है। प्रत्येक भारतीयों की पहली पसंद अभी भी कृषि एवं उद्योग होनी चाहिए, क्योंकि इनमें श्रम, मेधा दोनों चाहिए।यह मेरा व्यक्तिगत विचार है। 

अपने 30-32 वर्षों में मुझे PCS/ IAS की सेवा में उत्कृष्ट कार्य करने का अवसर मिला। मैं बहुत खुश रहा हूॅं और आज भी खुश हूॅं। सामाजिक सुसंस्कारों को पुनः जागृत करने हेतु चिंतन मनन कर रहा हूँ कि आगे उत्कृष्ट काम और किस क्षेत्र को चुनें, जहां से सबका कल्याण सुनिश्चित हो, सबके वास्ते जनकल्याण कारी मार्ग प्रशस्त हो। क्योंकि सभी राहें कठिन हैं, संघर्ष पथ है, एवं सफलता के लिए परिश्रम एवं संयम आवश्यक है, क्योंकि होगा वही जो ईश्वर चाहते हैं। 

शास्त्र सम्मत तरीके से कहा भी गया है- "सुनहु भरत भावी प्रबल, बिलखि कहेउ मुनिनाथ। हानि लाभु जीवनु मरनु, जसु अपजसु बिधि हाथ॥.......जेहि बिधि नाथ होइ हित मोरा। करहु सो बेगि दास मैं तोरा॥......होइहि सोइ जो राम रचि राखा। को करि तर्क बढ़ावै साखा।‌।" उपर्युक्त दर्शन के साथ परिश्रम, कर्म, संयम, धैर्य एवं चरित्र की सुचिता उत्कृष्ट बनने के लिए आवश्यक है तथा अहम् का परिशमन ही सफलता की गारंटी है। सभी से अनुरोध है कि यह मेरा व्यक्तिगत चिंतन है। मैं बहुत योग्य नहीं हूॅं, विषयगत विद्वान नहीं हूॅं , परंतु जनकल्याणकारी अनुभूति के आधार पर एक योग्य प्रशासक एवं अच्छा इंसान अवश्य हूॅं। 

यद्यपि मानवीय चित्त में दुर्बलताएं रहती हैं। इसका परिमार्जन ही मनुष्य को योग्य बनाता है। अतः श्रम, कर्म एवं योग करते रहिए, उत्कृष्ट बन जाओगे। साहित्यकार गोपाल दास नीरज की ग़ज़ल --

"समय ने जब भी अंधेरों से दोस्ती की है,
जला के अपना ही घर, हमने रोशनी की है।

सबूत है मेरे घर में धुएं के ये धब्बे,
कभी यहां पे उजालों ने खुदकुशी की है।

ना लड़खड़ाया कभी और कभी ना बहका हूँ,
मुझे पिलाने में फिर तुमने क्यूँ कमी की है?

कभी भी वक़्त ने उनको नहीं मुआफ़ किया,
जिन्होंने दुखियों के अश्कों से दिल्लगी की है।

किसी के ज़ख़्म को मरहम दिया है गर तूने,
समझ ले तूने खुदा की ही बंदगी की है।"

सच कहूं तो 30-32 वर्षों की सेवा काल में मेरा यही प्रयास रहा है कि पीड़ित, गरीब व्यक्ति के लिए सर्वसुलभ रहूँ। यही मेरी प्रार्थना एवं इबादत रही है। जिलाधिकारी, इससे पूर्व उपजिलाधिकारी व नगर आयुक्त के रूप में भी निज सेवा का प्रयास सदैव पीड़ित/गरीब व्यक्ति के लिए समर्पित रहा है। इसी सर्व सुलभ बनकर कार्य करने की पद्धति ने मुझे और मेरे दिल को सुकून दिया‌। यही मेरी पूॅंजी है। युवाओं के वास्ते कुछ अलहदा करने की चाहत है- मार्गदर्शन से लेकर उनके लक्ष्यप्राप्ति तक उन्हें निरंतर बौद्धिक सहयोग दे सकता तो देश समाज की यह भी बड़ी सेवा होगी। प्रयासरत हूँ, नैतिक सम्बल का आकांक्षी भी।

अंत में, युवाओं के लिए यह भी आवश्यक है। सुदीर्घ वर्षों से विभिन्न क्षेत्रों के विषय विशेषज्ञ से उनके सान्निध्य, सम्पर्क (सत्संग) में रहकर उनके अनुभूतिजन्य संघर्षों की यात्रा से सबक लेकर ही आगे बढ़ा जा सकता है। सुदीर्घ वर्षों के अनुभवी नागरिकों को बुजुर्ग मत समझें। महाभारत के युद्ध में सबसे प्रतापी योद्धा भीष्म पितामह ही थे, यदि उनकी बातों को युवाओं विशेष रूप से दुर्योधन (कौरवों) ने माना होता तो महाभारत का युद्ध इतना विनाशकारी नहीं होता। 

रामचरित मानस में महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी बालकांड में लिखते हैं कि- "बिनु सत्संग विवेक न होई, राम कृपा बिनु सुलभ न होई। सठ सुधरहिं सत्संगति पाई, पारस फस कुघात सुहाई।। बिनु सत्संगति लहहिं सुबिबेका, राम कृपा बिनु आवहिं केका।। अर्थात सत्संग (संतों और अच्छे लोगों की संगति) के बिना मनुष्य का विवेक जागृत नहीं होता और प्रभु राम की कृपा के बिना सत्संग का अवसर मिलना अत्यंत दुर्लभ है। सत्संग की महिमा इतनी अद्भुत है कि मूर्ख और दुष्ट मनुष्य भी उसे पाकर सुधर जाते हैं। ठीक उसी तरह जैसे पारस के छूने से ही लोहा कुंदन बन जाता है। 

अर्थात युवाओं से अनुरोध है कि वह अच्छे, अनुभवी, योग्य, चरित्रवान, नागरिकों (संत एवं सज्जनों) की संगति एवं उनके अनुभव का लाभ ले पंच प्रण के अनुसार विकसित उत्तरप्रदेश, विकसित भारत 2047 के संवाहक बनें। युवा जो राजनीति में आना चाहते हैं, वह राजनीति सेवा के लिए अपनी आजीविका के साधन तलाश कर ही इस क्षेत्र में यानी राजनीति में आएं, यही उत्कृष्ट होगा। जय हिंद।
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