International Plastic Bag Liberation Day: Targets incomplete due to illegal administrative recovery, who will decide democratic responsibility?
अंतरराष्ट्रीय प्लास्टिक बैग मुक्ति दिवस: अवैध प्रशासनिक वसूली से लक्ष्य अपूर्ण, लोकतांत्रिक जिम्मेदारी तय करेगा कौन?
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@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
हर वर्ष 3 जुलाई को अंतरराष्ट्रीय प्लास्टिक बैग मुक्ति दिवस मनाया जाता है। इसका उद्देश्य एकल-उपयोग (सिंगल-यूज़) प्लास्टिक बैग के दुष्प्रभावों के प्रति जन-जागरूकता बढ़ाना और पर्यावरण-अनुकूल विकल्पों को प्रोत्साहित करना है। भारत में भी प्लास्टिक पर नियंत्रण के लिए कानून बनाए गए, प्रतिबंध लागू हुए और समय-समय पर विशेष अभियान चलाए गए। इसके बावजूद आज भी अधिकांश बाजारों में प्रतिबंधित प्लास्टिक बैग खुलेआम बिकते और उपयोग होते दिखाई देते हैं।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जब कानून मौजूद हैं, तब उनका प्रभावी पालन क्यों नहीं हो पा रहा? यदि प्रशासन केवल छापेमारी और जुर्माने तक सीमित रह जाए, जबकि प्रतिबंधित प्लास्टिक का उत्पादन, आपूर्ति और बिक्री निर्बाध चलती रहे, तो अभियान का उद्देश्य अधूरा ही रहेगा।
कई स्थानों पर यह आरोप भी सुनने को मिलता है कि नियमों के निष्पक्ष पालन के बजाय अवैध वसूली की प्रवृत्ति पनप जाती है। यदि ऐसा कहीं होता है, तो यह केवल भ्रष्टाचार का प्रश्न नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण के पूरे अभियान की विश्वसनीयता पर भी प्रश्नचिह्न है। हालांकि ऐसे आरोपों की निष्पक्ष जांच और तथ्यात्मक पुष्टि आवश्यक है; क्योंकि अबतक मौखिक बातें बाजार में उड़ती रहती हैं, इसलिए बिना प्रमाण किसी संस्था या अधिकारी पर आरोप लगाना उचित नहीं होगा।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में जवाबदेही बहुस्तरीय होती है। नीति बनाना सरकार की जिम्मेदारी है, उसका निष्पक्ष क्रियान्वयन प्रशासन का दायित्व है, कानून की निगरानी न्यायपालिका और स्वतंत्र संस्थाओं की भूमिका का हिस्सा है, जबकि जनप्रतिनिधियों और नागरिक समाज का दायित्व है कि वे पारदर्शिता और उत्तरदायित्व सुनिश्चित करने के लिए निरंतर आवाज़ उठाएँ। नागरिकों की भी जिम्मेदारी कम नहीं है—यदि हम स्वयं प्लास्टिक का उपयोग बंद नहीं करेंगे, तो केवल सरकारी अभियान पर्याप्त नहीं होंगे।
समाधान केवल दंड में नहीं, बल्कि एक समग्र व्यवस्था में है—प्रतिबंधित प्लास्टिक के उत्पादन स्रोतों पर कठोर कार्रवाई, वैकल्पिक उत्पादों को सुलभ और किफायती बनाना, नियमित सामाजिक ऑडिट, शिकायतों की पारदर्शी जांच तथा भ्रष्टाचार पर शून्य सहिष्णुता। तभी प्लास्टिक मुक्ति का लक्ष्य व्यवहारिक रूप से हासिल किया जा सकेगा।
अंतरराष्ट्रीय प्लास्टिक बैग मुक्ति दिवस केवल एक प्रतीकात्मक अवसर नहीं, बल्कि आत्ममंथन का दिन है। यह प्रश्न हम सभी से पूछता है कि क्या पर्यावरण संरक्षण केवल सरकारी कार्यक्रम रहेगा, या शासन, प्रशासन और समाज मिलकर इसे जन-आंदोलन बनाएँगे? लोकतंत्र में जिम्मेदारी साझा होती है, और सफलता भी तभी संभव है जब जवाबदेही केवल कागज़ों तक सीमित न रहकर व्यवहार में दिखाई दे।
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