आखिर ईरान-अमेरिका युद्ध के चलते भारत जब 'ऊर्जा चक्रब्यूह' में घिरा ही गया तो फिर स्थायी समाधान ढूंढे!
आखिर ईरान-अमेरिका युद्ध के चलते भारत जब 'ऊर्जा चक्रब्यूह' में घिरा ही गया तो फिर स्थायी समाधान ढूंढे!
@ कमलेश पांडेय, वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
ईरान संकट अब भारत के लिए केवल कूटनीतिक चुनौती नहीं, बल्कि बड़ा “तेल संकट” बन चुका है। इसकी सबसे बड़ी वजह है कि भारत अपनी जरूरत का लगभग 85% कच्चा तेल आयात करता है और उसका बड़ा हिस्सा पश्चिम एशिया से आता है। सवाल है कि आखिर संकट कैसे पैदा हुआ? तो सीधा जवाब होगा कि होर्मुज जलडमरूमध्य पर खतरा की वजह है जहां ईरान और अमेरिका-इजरायल तनाव के कारण “स्ट्रेट ऑफ होर्मुज” असुरक्षित हो गया है।
बता दें कि दुनिया के लगभग 20% तेल टैंकर इसी रास्ते से गुजरते हैं। भारत के लिए आने वाला तेल और एलपीजी भी बड़े पैमाने पर इसी समुद्री मार्ग से आता है। यही कारण है कि: तेल आपूर्ति धीमी हुई, शिपिंग बीमा महंगा हुआ, और टैंकरों की आवाजाही प्रभावित हुई। जबकि भारत, रूस-ईरान के सहयोग से यूरोपीय बाजारों में सुगम प्रवेश करने की योजना बना चुका है और चाबहार पोर्ट इसी उद्देश्य से विकसित कर चुका है।
यही वजह है कि नया वैश्विक संकट समुपस्थित होते ही और चीन-रूस के स्पष्ट समर्थन के बावजूद भारत के ढुलमुल रवैये से कच्चे तेल की कीमतों में उछाल आ गया। क्योंकि चीन-पाकिस्तान के प्रभाव वश ईरान कभी कभार भारत के खिलाफ भी उल्टी सीधी हरकतें कर बैठता है, जो खुद उसके दूरगामी हित के लिए सही नहीं है। चूंकि युद्ध और हमलों के कारण वैश्विक बाजार में ब्रेंट क्रूड तेजी से महंगा हुआ। कई रिपोर्टों में बताया गया कि कीमतें 100–120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचीं।
इसलिए भारत पर इसका सीधा असर:हुआ। क्योंकि पेट्रोल-डीजल महंगे होने का दबाव बढ़ने से महंगाई बढ़ने का खतरा, पैदा हो गया, जबकि सरकार पर टैक्स घटाने का दबाव है। इसलिए भारत वासी चाहते हैं कि आखिर ईरान-अमेरिका युद्ध के चलते भारत जब 'ऊर्जा चक्रब्यूह' में घिरा ही गया तो फिर स्थायी समाधान ढूंढे!
सबसे बड़ी बात तो यह कि भारत की ऊर्जा निर्भरता उजागर हो गई। चूंकि भारत आज भी 85% कच्चा तेल,
60% एलपीजी, 50% एलएनजी आयात करता है। इसलिए भारत के विकास पर इसकी चोट पड़ेगी। यानी पश्चिम एशिया में जरा सा युद्ध भी भारत की रसोई, परिवहन और उद्योग पर असर डाल देता है। इससे रूस पर निर्भरता बढ़ती है, लेकिन हरामखोरों की जमात अमेरिका को इससे मिर्ची लगती है। चूंकि चीन की तरह वो भारत को अपनी कीमत पर विकसित नहीं होने देने चाहता है।
जानकारों की मानें तो ईरान पर हमले से पहले अमेरिकी डीप स्टेट ने खूब जोड़ घटाव किए होंगे और जब लगा होगा कि ऐसा करने से एक तीर से कई निशाने सधेंगे, तभी ऐसी जोखिम अमेरिकी प्रशासन ने उठाई होगी। परिणाम सामने है। हवाई यात्राएं प्रभावित होने के आसार बढ़ते नजर आ रहे हैं। यही वजह है कि मध्य-पूर्व से आपूर्ति घटने के बाद भारत ने रूस से तेल खरीद बढ़ाई। एक रिपोर्ट के अनुसार मार्च 2026 में भारत के कुल आयात का लगभग आधा हिस्सा रूस से आया। लेकिन इसमें भी खतरे हैं, क्योंकि अमेरिकी प्रतिबंधों का दबाव, भुगतान प्रणाली की दिक्कत, और लंबी समुद्री दूरी के कारण लागत बढ़ना स्वाभाविक है।
वहीं, इस युद्ध से एलपीजी और रसोई गैस संकट भी बढ़ गया है, क्योंकि भारत की अधिकांश एलपीजी आपूर्ति होर्मुज मार्ग से आती है। इसलिए कई जगह पर सिलेंडर की कमी, लंबी कतारें, डिलीवरी में देरी, और होटल-रेस्तरां पर असर देखा गया। महानगरों और शहरों का खुदरा खानपान व्यवसाय तो इससे बुरी तरह से प्रभावित हो रहा है। वहीं, मध्यम खानपान उद्योग महंगाई की चपेट में आ चुका है। मजदूरों के जीवन यापन पर गैस यानी ऊर्जा संकट बढ़ने से उद्योग और अर्थव्यवस्था पर भी असर पड़ना लाजिमी है।
ऐसा इसलिए कि ऊर्जा महंगी होने से परिवहन लागत बढ़ी, खाद और स्टील उद्योग प्रभावित हुए, रुपया दबाव में आया, और चालू खाता घाटा बढ़ने का खतरा पैदा हुआ। उद्योगों पर असर का आलम यह है कि स्टील, सिरेमिक, उर्वरक और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर ऊर्जा संकट से प्रभावित हो रहे हैं। गुजरात के कई उद्योगों में उत्पादन प्रभावित होने की खबरें हैं। वहीं, उर्वरक संकट और कृषि पर असर भी पड़ा है। यूरिया और गैस आधारित उर्वरकों की कीमतें तेजी से बढ़ी हैं। भारत को रिकॉर्ड महंगे दामों पर यूरिया आयात करना पड़ा। इससे सरकार की सब्सिडी बढ़ेगी और कृषि लागत भी बढ़ सकती है।
हालांकि, भारत के लिए सबसे बड़ा खतरा है “ऊर्जा असुरक्षा”, क्योंकि यदि होर्मुज पूरी तरह बंद होता है,
ईरान के तेल ठिकानों पर बड़े हमले होते हैं, खाड़ी देशों का उत्पादन बाधित होता है, तो भारत में:पेट्रोल-डीजल के दाम तेजी से बढ़ सकते हैं, महंगाई बेकाबू हो सकती है, और आर्थिक विकास दर प्रभावित हो सकती है।
ऐसे में सीधा सवाल है कि भारत क्या कर रहा है? तो जवाब होगा कि भारत फिलहाल अमेरिका-चीन की चक्की में पीसकर चीन के लिए लोकप्रिय सुस्वादु नूडल्स बनता जा रहा है। भले ही वह रूस और अफ्रीका से वैकल्पिक तेल खरीद रहा है, रणनीतिक तेल भंडार बढ़ाने की कोशिश कर रहा है, एलएनजी और पाइप्ड गैस विकल्प बढ़ा रहा है, नवीकरणीय ऊर्जा व इलेक्ट्रिक मोबिलिटी पर जोर दे रहा है। लेकिन कारगर समाधान वेदों में ही निहित है, जबकि मौजूदा संविधान और शासन भारत को नीतिगत रूप से पंगु और पराश्रित बनाता जा रहा है।
निष्कर्षत: यह कहा जा सकता है कि ईरान संकट ने भारत को यह एहसास करा दिया है कि “ऊर्जा पर विदेशी निर्भरता” राष्ट्रीय सुरक्षा का भी प्रश्न है। यह केवल तेल की कीमतों का मामला नहीं, बल्कि भारत की अर्थव्यवस्था, महंगाई, उद्योग, परिवहन और आम आदमी की रसोई तक जुड़ा संकट बन चुका है। इसलिए लोकलुभावन योजनाओं की जगह प्राचीन भारतीय अर्थव्यवस्था में ही समृद्धि का रास्ता तलाशा जाए तो आमलोगों के हित में होगा। शताब्दी नसीहत यही है कि आखिर ईरान-अमेरिका युद्ध के चलते भारत जब 'ऊर्जा चक्रब्यूह' में घिरा ही गया तो फिर स्थायी समाधान ढूंढे! अन्यथा विकास बाधित होगा।
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