आख़िर राजनीति को समाजनीति में बदलने की जरूरत क्यों है? समझिए
आख़िर राजनीति को समाजनीति में बदलने की जरूरत क्यों है? समझिए
@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
राजनीति को “समाजनीति” में बदलने की जरूरत इसलिए है क्योंकि आज राजनीति अक्सर सत्ता, वोटबैंक और व्यक्तिगत स्वार्थ के खेल में तब्दील हो गई है, जबकि असली बदलाव तभी संभव है जब समाज के भीतर ही नैतिकता, सहिष्णुता और सामूहिक जिम्मेदारी की राजनीति (समाजनीति) बन जाए। इसलिए आइए सबसे पहले राजनीति और समाजनीति में मौलिक अंतर को समझते हैं और फिर उसके अनुरूप व्यवस्था को बदलने की मुहिम छेड़ते हैं।
देखा जाए तो "राजनीति" सामान्यतः सत्ता, चुनाव, नीतियाँ और धुरंधर नेतृत्व पर केंद्रित होती है, जबकि "समाजनीति" मानवीय मूल्यों, सामाजिक सुधार और नागरिक‑स्तरीय कार्यवाही से जुड़ती है। समाजनीति का लक्ष्य नेता‑केंद्रित शासन नहीं, बल्कि समाज के भीतर जागरूकता, सहभागिता और सामाजिक न्याय की संस्थापना होती है।
यही वजह है कि राजनीति के विकृत रूप से उबरने की जरूरत आज सभी बुद्धिजीवी समझते हैं। चूंकि आज राजनीति अक्सर जाति, धर्म, भाषा और पहचान के आधार पर विभाजन को बढ़ाती है, जिससे समाज की एकता और विश्वास कमजोर होते हैं। मसलन, सत्ता के लिए होने वाली राजनीति में भ्रष्टाचार, नैतिक पतन और अल्पकालिक वादों की जगह बढ़ती है, जबकि समाज की असली चुनौतियाँ यथा- एक समान शिक्षा, स्वास्थ्य, न्याय, पर्यावरण आदि लंबे अंतराल में असमान बनी रहती हैं।
इसलिए सबकुछ संतुलित रखने हेतु एक व्यापक समाजनीति जरूरी है और उसे संवैधानिक स्वीकृति मिल जाए तो राह और आसान हो जाती है। आमतौर पर जब समाज खुद अपने स्तर पर नैतिक पुनर्जागरण, रचनात्मक कार्यक्रम और स्वयंसेवी प्रयास शुरू करता है, तो राजनीति पर निर्भरता कम होती है और नीतियाँ भी जन‑आधारित बनती हैं। चूंकि समाजनीति का अर्थ है कि नेता जनता को ऊपर से “शासित” करें, बल्कि जनता स्वयं अपने समाज के निर्माण की जिम्मेदारी ले—इसके लिए शिक्षा, सामाजिक आंदोलन, स्थानीय संगठनों की भूमिका अहम हो जाती है।
लिहाजा, बदलते वक्त की अहम मांग है कि राजनीति और समाजनीति के बीच संतुलित दृष्टि स्थापित की जाए। यूँ तो राजनीति को बिल्कुल कमजोर करना भी सही नहीं होगा; बल्कि जरूरत यह है कि राजनीति को समाजनीति के फ्रेम में रखा जाए—अर्थात सत्ता में बैठे लोग समाज की नैतिक और सामाजिक चेतना को आधार बनाकर नीतियाँ बनाएँ।
इस तरह लोकतंत्र की वास्तविक सार्थकता यह होगी कि मतदाता न सिर्फ वोट दें, बल्कि समाज की “समाजनीति” को जागरूक सिविल सोसाइटी के रूप में प्रतिष्ठित करें, ताकि राजनीति उसकी सेवा में झुके, उस पर हावी न हो।
आधुनिक भारत में धर्मनिरपेक्षता के प्रतीक मोहनदास करमचंद गांधी, दलित चेतना के वाहक डॉ भीमराव आंबेडकर और सामाजिक न्याय के सूत्रधार राममनोहर लोहिया के सामाजिक आंदोलन स्पष्ट करते हैं कि राजनीति यानी शक्ति–सरकार–चुनाव, के साथ‑साथ “समाजनीति” अर्थात समाज के मानस, जाति‑प्रथा, आर्थिक‑सांस्कृतिक ढांचे में बदलाव, भी ज़रूरी है, वरना बाहरी लोकतंत्र के नाम पर भीतरी जातिवाद और आर्थिक वर्ग‑विषमता का दबाव बरकरार रहता है।
इस नजरिए से गांधी की दृष्टि को समझते हैं, जिन्होंने राजनीति में नैतिक‑सामाजिक आंदोलन का सूत्रपात किया। इसके तहत गांधी ने स्वतंत्रता‑संग्राम को सिर्फ राजनीतिक संघर्ष नहीं, बल्कि खादी, ग्रामोद्योग, अस्पृश्यता निवारण, मद्यत्याग जैसे “रचनात्मक कार्यों” के ज़रिए एक सामाजिक चरित्र‑निर्माण की प्रक्रिया बनाया। इसका अर्थ है: राजनीति बिना समाजनीति यानी सामाजिक विचारधारा, नैतिक अनुशासन, जातिगत बाधाओं को घटाने की चेष्टा, के औपचारिक और रिक्त रह जाती है– बस शासन बदलता है, समाज नहीं।
वहीं, आंबेडकर की दृष्टि में कानून‑राजनीति और जाति‑समाज को निर्देशित करते हैं। इसलिए आंबेडकर ने दलितों के लिए आंदोलन, रिजर्वेशन, अस्पृश्यता उन्मूलन और संविधान के माध्यम से राजनीतिक‑कानूनी एजेंडा खड़ा किया, ताकि राजनीतिक दरवाज़े खुलें और संस्थागत विवेकता घर करे। पर उनका जोर यह भी था कि बिना जाति‑व्यवस्था के मूल संरचनात्मक खंडन के कानूनी अधिकार “कागज़ी” रह जाएंगे – इसलिए आंबेडकरवादी विचार राजनीति के साथ समाजनीति यानी जाति‑संस्कार, शिक्षा‑सांस्कृतिक बदलाव, की दोहरी ज़रूरत पर बल देता है।
वहीं, लोहिया की दृष्टि में समाजवाद, जाति तोड़ो और ‘समान्तर’ समाजनीति का प्रमुख औजार बना। क्योंकि लोहिया ने “जाति तोड़ो अभियान”, दलितों का मंदिर प्रवेश, पिछड़ों के लिए विशेष अवसर और आर्थिक वर्ग‑संरचना को निशाना बनाकर गांधी और आंबेडकर की परियोजनाओं में समाजवादी व व्यावहारिक राजनीतिक‑सामाजिक संश्लेषण किया, जो एक हद तक सही भी था। उनका तर्क स्पष्ट था कि राजनीति अर्थात सरकार, चुनाव, राजनीतिक एजेंडा, तभी अर्थपूर्ण है जब वह समाजनीति यानी जाति‑विषमता, मानसिक श्रम–शारीरिक श्रम का भेद, पूँजीवादी विशेषाधिकारों का उन्मूलन, को बदलने के अभियान में खप जाए; वरना “समानता” नारा बनकर रह जाती है।
इस प्रकार से राजनीति और समाजनीति की आवश्यकता के अनुरूप जहां गांधी के मुताबिक राजनीति में नैतिक और सांस्कृतिक पुनर्निर्माण घुलना ज़रूरी है, नहीं तो स्वतंत्रता सिर्फ ताज़ा शासक–परिवर्तन है। वहीं आंबेडकर के अनुसार राजनीतिक‑कानूनी अधिकार और संस्थागत सुरक्षा बिना जाति‑मुक्त समाजनीति के अधूरी हैं। जबकि
लोहिया के अनुरूप राजनीति का समाजवादी–समावेशी एजेंडा वही काम करता है जब जाति‑वर्ग की मानसिक और आर्थिक विषमताओं पर समाजनीति का लगातार दबाव बनाया जाए।
इस तरह, तीनों के आंदोलन मिलाकर यह निष्कर्ष निकलता है कि भारत जैसे “जाति‑समाज” में राजनीति और समाजनीति एक‑दूसरे की समानांतर तथा अनिवार्य पूरक हैं; एक के बिना दूसरी या तो अपूर्ण या झूठी हो जाती है। हमारे मौजूदा नेताओं को इस पर मंथन करना चाहिए और देश-समाज का सर्वश्रेष्ठ मार्गदर्शन करते रहना चाहिए। इसी में सबका हित निहित है।
वास्तव में राजनीति को “समाजनीति” में बदलने की बात कोई भावनात्मक नारा भर नहीं है, बल्कि यह लोकतंत्र की गुणवत्ता से जुड़ा एक गंभीर प्रश्न है। जब राजनीति सिर्फ सत्ता पाने और बनाए रखने का साधन बन जाती है, तब समाज के वास्तविक मुद्दे पीछे छूट जाते हैं। ऐसे में राजनीति का लक्ष्य समाजहित (public good) की ओर मोड़ना ज़रूरी हो जाता है। इसे समझने के लिए कुछ ठोस कारण देखिए:
पहला, सत्ता बनाम सेवा का संतुलन की दरकार: आज कई बार राजनीति का फोकस चुनाव जीतने, गठजोड़ और ध्रुवीकरण पर रहता है। जबकि समाजनीति का मतलब है—नीतियाँ ऐसी हों जो शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और न्याय जैसी बुनियादी जरूरतों को प्राथमिकता दें।
दूसरा, असमानता और न्याय का सुलगता सवाल: भारत जैसे समाज में आर्थिक, सामाजिक और क्षेत्रीय असमानताएँ गहरी हैं। इसलिए महात्मा गांधी ने “अंत्योदय” (सबसे अंतिम व्यक्ति का उत्थान) की बात की,
जबकि बी आर अंबेडकर ने सामाजिक न्याय और समान अधिकारों पर जोर दिया, और राम मनोहर लोहिया ने सामाजिक-आर्थिक विषमता के खिलाफ संघर्ष किया।
इन सभी का मूल संदेश था—राजनीति का उद्देश्य समाज में बराबरी लाना होना चाहिए।
तीसरा, नीतियों का ज़मीनी असर कम दिखा: जब राजनीति समाजनीति में बदलती है, तो फैसले सिर्फ कागज़ पर नहीं रहते, बल्कि लोगों की रोज़मर्रा की जिंदगी में बदलाव लाते हैं—जैसे बेहतर स्कूल, अस्पताल, स्वच्छता, और अवसरों की समान पहुँच। हालांकि 1990 के बाद विसंगतियां बढ़ीं हैं।
चौथा, लोकतंत्र की मजबूती पर सवाल: अगर राजनीति केवल चुनावी गणित तक सीमित रहे, तो लोकतंत्र कमजोर होता है। लेकिन जब नागरिकों की भागीदारी, पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ती है, तो लोकतंत्र मजबूत बनता है—यही समाजनीति का लक्ष्य है।
पांचवां, विभाजन से सहयोग की ओर: सामान्य राजनीति अक्सर जाति, धर्म या क्षेत्र के आधार पर समाज को बाँटती है। समाजनीति इन विभाजनों को कम करके साझा हित (common good) पर जोर देती है।
निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि राजनीति को समाजनीति में बदलने की जरूरत इसलिए है ताकि शासन “किसके लिए” और “क्यों” का जवाब दे सके। जब तक राजनीति का केंद्र समाज नहीं होगा, तब तक विकास अधूरा और असमान रहेगा।
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