उत्तरप्रदेश में भाजपा कार्यकर्ताओं के बीच उपजे असंतोष को सूझबूझ पूर्वक पाट रहे हैं योगी आदित्यनाथ!

उत्तरप्रदेश में भाजपा कार्यकर्ताओं के बीच उपजे असंतोष को सूझबूझ पूर्वक पाट रहे हैं योगी आदित्यनाथ!
@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

उत्तर प्रदेश में भाजपा के संगठनात्मक पदों और सरकारी निकायों के पदों पर नियुक्तियों में विलंब मुख्य रूप से जातीय-क्षेत्रीय संतुलन, आंतरिक खींचतान और केंद्रीय नेतृत्व के मंथन के कारण हो रहा है। इससे कार्यकर्ताओं में असंतोष बढ़ा है, हालांकि मार्च 2026 तक बड़े बदलाव की तैयारी चल रही है। आलम यह है कि प्रदेश के सभी 16 नगर निगम में 10-10 मनोनीत होने वाले पार्षदों की नियुक्ति अटकी पड़ी है, जबकि तीन साल बीतने को है। विभिन्न बोर्डों की भी यही स्थिति है। इससे विधानसभा चुनाव 2027 में पार्टी की रणनीति पर भी असर पड़ना लाजिमी है, क्योंकि अमित शाह और योगी आदित्यनाथ की रस्साकशी में कार्यकर्ताओं में निराशा है।

जहां तक विलंब के प्रमुख कारण की बात है तो जातीय एवं सामाजिक समीकरण इसकी पहली वजह है। भाजपा का ओबीसी करण होने से पार्टी के वफादार कार्यकर्ताओं में रोष गहराता जा रहा है। इसका असर 2027 में होने वाले विधानसभा चुनावों और 2026 में होने वाले त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों पर अवश्य पड़ेगा। लिहाजा पार्टी इससे पहले सभी वर्गों (ओबीसी, दलित, सवर्ण, खासकर ब्राह्मण राजपूत आदि) को प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने में जुटी है, जिसपर प्रदेश अध्यक्ष और सरकार के मुखिया की खींचातानी से चयन अटका हुआ बताया जाता है।

वहीं पार्टी की आंतरिक गुटबाजी जैसे सांसदों-विधायकों के बीच खींचतान और केंद्रीय नेतृत्व व आरएसएस के बीच वैचारिक मतभेद (चुनावी साख बनाम संगठन अनुभव) से  कई पद लंबित हैं। वहीं, सरकारी पदों पर देरी यानी निगमों, बोर्डों और आयोगों के 100+ रिक्त पदों पर पार्टी-संगठन व सरकार के बीच समन्वय की कमी, साथ ही योगी सरकार की मंजूरी का इंतजार है। अब तक ऐसा नहीं होने से जमीनी कार्यकर्ताओं में असंतोष स्वाभाविक है। 

खासकर वफादार कार्यकर्ता कार्यगत पुरस्कार न मिलने, लगातार चुनावी मेहनत के बावजूद पद न पाने से नाराज हैं; जिसके चलते कतिपय जिलों में सामूहिक इस्तीफे तक हुए। योगी-केशव जैसे नेताओं के बीच अनबन की अटकलें भी असंतोष बढ़ा रही हैं। वर्तमान स्थिति यह है कि पंकज चौधरी दिसंबर 2025 में प्रदेश अध्यक्ष बने, जिससे 70+ जिलाध्यक्ष घोषित हो चुके हैं। जबकि होली के बाद मिशन-2027 के तहत नई टीम, क्षेत्रीय अध्यक्षों में बदलाव की घोषणा संभावित है, जिसके दृष्टिगत पर्यवेक्षक भेजे गए हैं।

वहीं उत्तर प्रदेश भाजपा कार्यकर्ताओं के असंतोष को कम करने के लिए संगठनात्मक बदलाव, प्रत्यक्ष संवाद, प्रशिक्षण अभियान और पदों पर समायोजन जैसे कदम उठाए जा रहे हैं। ये प्रयास मुख्य रूप से 2027 चुनाव की तैयारी के तहत होली के बाद अब तेज हो रहे हैं। इस निमित्त कई संगठनात्मक कदम उठाए जा चुके हैं और कुछ प्रक्रिया धीन हैं। जहां तक नई टीम के गठन की बात है तो प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी के नेतृत्व में होली बाद बड़े फेरबदल, जिलाध्यक्षों-क्षेत्रीय अध्यक्षों की नियुक्तियां, जातीय संतुलन बनाकर कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारी मिलेगी। वहीं, सरकारी पदों पर समायोजन यानी निगमों, बोर्डों, आयोगों के खाली पदों पर कार्यकर्ताओं की सूची तैयार है, और मिशन-2027 के तहत तोहफा के रूप में वितरण कार्य शेष रहने की खबर है।

संवाद एवं प्रशिक्षण प्रयास के तहत प्रत्यक्ष मुलाकातें हो रही हैं। 'कार्यकर्ता सर्वप्रथम' मंत्र से वन-टू-वन मैपिंग, वीआईपी संस्कृति खत्म कर रूठे कार्यकर्ताओं से सीधा संवाद; सीएम योगी विधायकों से नियमित बैठकें कर रहे हैं।वहीं डिजिटल एवं वैचारिक प्रशिक्षण के तहत कार्यकर्ताओं को डिजिटल हथियार से लैस करने का अभियान, और बूथ स्तर पर नीतियां-कार्यपद्धति सिखाना जारी है। आरएसएस-बीजेपी में समन्वय की कोशिशें परवान चढ़ी हुईं हैं।आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत से योगी की मुलाकातें, कानपुर समन्वय बैठक में असंतोष मुद्दों पर चर्चा हुई, जिसके दृष्टिगत आंतरिक कलह सुलझाने की कोशिश जारी है।

यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भाजपा कार्यकर्ताओं की नाराजगी संभालने के लिए प्रत्यक्ष बैठकें शुरू कर दी है। आरएसएस-बीजेपी समन्वय मंचों पर खुली चर्चा और जमीनी मुद्दों पर आश्वासन जैसे कदम उठाए हैं। मार्च 2026 तक गोरखपुर व कानपुर जैसी जगहों पर ये प्रयास तेज हुए। प्रत्यक्ष संवाद हो रहे हैं। खुद योगी ने 200+ विधायकों, सांसदों व पूर्व नेताओं से अलग-अलग मुलाकातें कीं, जहां उन्होंने पार्टी की हार के कारणों (कार्यकर्ता-सरकार डिस्कनेक्ट) को सुने और विपक्षी प्रचार पर जवाब देने को कहा। साथ ही जमीनी स्तर पर समस्याओं (जैसे अस्पताल बेड) के समाधान का आह्वान किया।

मुख्यमंत्री की आरएसएस से समन्वय बैठकें भी चल रही हैं। गोरखपुर (मार्च 2026) में पदाधिकारियों से मन की बात सुनकर जवाब दिए, और एआई (AI) युग व कैशलेस इलाज जैसे सवाल हल किए। वहीं कानपुर (मार्च 2026) में आरएसएस के साथ बैठक में कार्यकर्ता सम्मान, यूजीसी नियमों से सवर्ण असंतोष, स्थानीय विवादों पर चर्चा हुई; साथ ही अनुशासनहीनता पर कार्रवाई व बेहतरी का आश्वासन दिया। जबकि अन्य प्रयास के तहत बूथ स्तर पर कार्यकर्ताओं को निर्देश दिए कि एसआईआर (SIR) फॉर्म भरें, मतदाता जागरूकता कैंप लगाएं; और अफसरों से कार्यकर्ता शिकायतें दूर करने को कहा। साथ ही कार्यकर्ताओं से 'कैंडिड फीडबैक' भी लिया।

देखा जाए तो योगी आदित्यनाथ की रणनीति ने उत्तर प्रदेश भाजपा में आंतरिक एकता को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, खासकर क्षेत्रीय समन्वय बैठकों और प्रत्यक्ष संवाद से। इससे कार्यकर्ताओं की नाराजगी घटी और 2027 चुनाव की तैयारी एकजुट हुई। वहीं क्षेत्रीय समन्वय बैठकें भी हुईं। योगी ने छह क्षेत्रों (अवध, काशी, गोरखपुर, कानपुर, ब्रज, पश्चिम) में आरएसएस-बीजेपी समन्वय बैठकें आयोजित कीं, जहां कार्यकर्ता शिकायतें (अधिकारियों का रवैया, सम्मान की कमी) सुनीं और तत्काल समाधान पर मंथन हुआ। साथ ही आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत से लखनऊ में हुई मुलाकात ने संगठन-सरकार तालमेल बढ़ाया, जातीय समीकरणों व यूजीसी नियम विवादों को सुलझाया।

मुख्यमंत्री और आरएसएस ने जमीनी स्तर पर एकीकरण मजबूत करने पर जोर दिया। खासकर बूथ मजबूती पर जोर देते हुए एसआईआर (SIR) अभियान समीक्षा, मतदाता पुनरीक्षण से कार्यकर्ताओं को नई जिम्मेदारी, वीआईपी (VIP) संस्कृति खत्म कर प्रत्यक्ष फीडबैक लिया।इससे नेताओं से मुलाकातें भी तेज हुईं। योगी आदित्यनाथ 200+ विधायकों-सांसदों से अलग-अलग चर्चा करते हुए, पार्टी की कमजोरियां सुधारने का आश्वासन दिया। कानपुर बैठक में अनुशासन व सुधार पर बल दिया गया।परिणामस्वरूप एकता मजबूत हुई। इन प्रयासों से आंतरिक कलह कम हुई, नई संगठनात्मक टीम गठन संभव हुआ, और मिशन-2027 के लिए सभी वर्ग एकजुट हुए। वही  2024 चुनाव में मिले सबकों पर अमल होने से बूथ मजबूत हुआ।

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