क्या पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणाम सवर्णों के राजनीतिक-सामाजिक भविष्य को तय करेंगे?
क्या पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणाम सवर्णों के राजनीतिक-सामाजिक भविष्य को तय करेंगे?
@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
देश के पश्चिम बंगाल समेत असम, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी जैसे 5 राज्यों के विधानसभा चुनाव हो रहे हैं, जिसके मतदान/परिणाम भाजपा नीत एनडीए की भावी रीति-नीति और सवर्णों के सामाजिक-राजनीतिक भविष्य को तय करेंगे। बताया जाता है कि यदि इन चुनावों को भाजपा नीत गठबंधन जीत जाता है तो वह ओबीसी-दलित वोटरों को रिझाने के लिए सवर्ण विरोधी एजेंडों को इत्मीनान पूर्वक धार देगा!
ऐसा इसलिए कि सामान्य जातियों से जुड़े सवर्ण वोटर ही भाजपा के कोर वोटर माने जाते हैं, लेकिन ओबीसी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार के रहते हुए भी जिस तरह से सवर्ण विरोधी यूजीसी इक्विटी बिल लाया गया है, उससे सामान्य जातियों के लोग अर्थात सवर्ण समुदाय का एक बड़ा तबका अपनी मुख्य पार्टी भाजपा से काफी नाराज हैं और बदलती राजनीति के बीच वे किधर करवट लेंगे, यह बात पूरी तरह से चुनाव परिणाम आने के बाद ही पता चलेगा।
राजनीतिक मामलों के जानकार बताते हैं कि अपने हिंदुत्व के एजेंडे को धार देने के लिए भाजपा कांग्रेसी राज और समाजवादी राज की दलित, ओबीसी, अल्पसंख्यक व भाषाई क्षेत्र सम्बन्धी नीतियों को और अधिक धार दे रही है। आरक्षण, जातीय जनगणना, एससी-एसटी एक्ट से जुड़े पदोन्नति प्रावधान, कमाऊ मंदिर संचालन जैसी नीतियों में पहले की सरकारों में और अब की सरकार में कोई अंतर नहीं आया है।
कोढ़ में खाज यह कि भाजपा अपने हिंदुत्व के एजेंडे से भटकती प्रतीत हो रही है। ऐसे में सत्ता के जातीय, सांप्रदायिक और भाषाई-क्षेत्रवाद की मानसिकता में कोई बदलाव न देख देश का सामाजिक इंजन वर्ग यानी सवर्ण समुदाय भाजपा से काफी नाराज है और यूजीसी इक्विटी बिल ने आग में घी का काम किया है।
चूंकि सवर्ण वोट कभी कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस और इंडिया गठबंधन में शामिल क्षेत्रीय दलों का भी कोर वोट बैंक हुआ करता था, और इनकी दलित-ओबीसी आरक्षण व अल्पसंख्यक तुष्टीकरण की नीतियों से आजिज होकर भाजपा के आकर्षक मंडल विरोधी कमण्डलवाद पर फिदा हो चुका था, वह मोदी-शाह युग में एक के बाद दूसरे झटके लगते रहने से सियासी विकल्प ढूंढ रहा है। चूंकि भाजपा नेतृत्व पूंजीपतियों के इशारे पर ब्राह्मण-राजपूत नेतृत्व को दरकिनार करते हुए ओबीसी-दलित नेतृत्व को मजबूत कर रहा है, इससे भी सवर्ण वर्ग में नाराजगी है।
यही वजह है कि 5 राज्यों में हो रहे विधानसभा चुनावों में कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस और उसके सहयोगी दल भाजपा के खिलाफ पनपे सवर्ण प्रतिरोध को पूरी तरह से अंदर ही अंदर भुनाने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि उनका दलित-ओबीसी-अल्पसंख्यक कोर वोट बैंक नाराज भी न हो और सवर्ण भी उनकी ओर लौट जाएं, ताकि अबतक की हारी हुई बाजी को पुनः जीता जा सके और यत्र तत्र जीती हुई बाजी को बरकरार रखाक जा सके! हालांकि, अब वे अपनी कोशिशों में कितने कामयाब होंगे, यह तो मतदान/मतगणना बाद ही पता चल पाएगा।
वहीं, कतिपय राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि देश के पश्चिम बंगाल समेत असम, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी जैसे 5 राज्यों के विधानसभा चुनाव के चुनाव परिणाम सवर्णों के सामाजिक-राजनीतिक भविष्य को तय नहीं करेंगे, भले ही भाजपा इन चुनावों में पश्चिम बंगाल और असम जीत जाए और तमिलनाडु, केरल व पुड्डुचेरी में पहले से ज्यादा मजबूत होकर जीते। क्योंकि यूजीसी इक्विटी बिल के बाद उपजे सवर्ण जनाक्रोश को डैमेज-कंट्रोल करने के लिए भाजपा-आरएसएस के रणनीतिकार जुट गए हैं, हालांकि उन्हें भी यह आशंका है कि ये चुनाव भाजपा के सवर्ण वोट बैंक के लिए महत्वपूर्ण परीक्षा की घड़ी हैं! वहीं, भाजपा की ओर कितने दलित-ओबीसी वोटर लौटते हैं, इससे भाजपा को सियासी तंदुरुस्ती मिलेगी।
भाजपा की सवर्ण लॉबी का कहना है कि अब भी सवर्ण वोट पार्टी के कोर सपोर्टर बने हुए हैं, क्योंकि उनके पास भाजपा से उम्दा विकल्प मौजूद नहीं है। जबकि भाजपा अपनी चुनावी जीत के लिए दलित, आदिवासी और ओबीसी वोटों पर ही निर्भर करती है। इसलिए वह सभी समुदायों के बीच राष्ट्रवादी तालमेल बिठाने में जुटी हुई है। वहीं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मुस्लिम देश, भारत के खिलाफ नहीं खड़े हों, इसलिए भाजपा ने भी कुछ बदलावों के साथ अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की नीतियों को अपना लिया है।
मसलन, यदि 5 राज्यों में हो रहे चुनावों की चुनावी पृष्ठभूमि पर नजर डाली जाए तो 2026 में पश्चिम बंगाल की 294 सीटों के लिए मतदान 23-29 अप्रैल 2026 को होंगे। वहीं असम की 126 विधानसभा सीटों, तमिलनाडु की 234 विधानसभा सीटों, केरल की 140 विधानसभा सीटों और पुडुचेरी की 30 विधानसभा सीटों के लिए भी चुनाव होंगे। इन चुनावों में भाजपा मुख्य रूप से पश्चिम बंगाल और असम पर फोकस कर रही है। क्योंकि जहां पिछले विधानसभा चुनाव 2021 में पश्चिम बंगाल में बीजेपी को 77 सीटें मिलीं थी। वहीं, असम में भाजपा की सत्ता बरकरार रहा गई थी और अभी वहां भाजपा सत्तारूढ़ पार्टी है।
इसलिए, जहां तक पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में सवर्णों की भूमिका की बात है तो भाजपा को सवर्ण यानी ब्राह्मण, कायस्थ, वैद्य आदि से मजबूत समर्थन मिलता बताया जा रहा है। यद्यपि राष्ट्रीय स्तर पर सभी जातियों व धर्मों को मिलाकर 61% सवर्ण वोट हैं। वहीं पश्चिम बंगाल में भाजपा '5% हिंदू वोट फॉर्मूला' से सवर्णों को 'सनातनी' के रूप में साध रही है। जबकि पश्चिम बंगाल में टीएमसी के नेतृत्व में सूबाई सत्ता के शीर्ष पर सवर्ण कायम हैं, जबकि जीत के पीछे अल्पसंख्यक-दलित-आदिवासी-ओबीसी वोट मुख्य हैं।
इसलिए भाजपा भी पश्चिम बंगाल में सवर्णों को टीएमसी की सत्ता से खींचकर अपनी ओर करना चाहती है और ओबीसी-दलित-आदिवासी वोटरों को भी अपने पाले में करने में जुटी हुई है, जबकि अल्पसंख्यक वोटों के रायता फैलाने हेतु उसके गुप्त इशारे पर वहां की लोकल अल्पसंख्यक पार्टी ताल ठोक चुकी है। वहीं बंगाल अस्मिता का सवाल कितना मुखर होगा, घुसपैठियों का मुद्दा कितना रंग लाएगा, वह मतदान ट्रेंड और चुनाव परिणाम से ही पता चलेगा।
वहीं, जहां तक पश्चिम बंगाल में भाजपा की जीत के परिणाम की बात है तो भाजपा की जीत से सवर्णों का राजनीतिक प्रभाव बढ़ेगा, लेकिन उनका सामाजिक भविष्य भाजपा की राष्ट्रीय नीतियों यथा- आरक्षण, जाति जनगणना आदि पर ही निर्भर करेगा। वहीं, असम में भी यही बातें लागू होंगी, क्योंकि वहाँ तो भाजपा पहले से ही सत्ता में है। वहीं, तमिलनाडु और केरल में सवर्ण प्रभाव कम है, इसलिए 5 राज्यों की जीत से सवर्ण गठबंधन मजबूत होगा, न कि सवर्णों का राजनीतिक-सामाजिक भविष्य तय होगा। उत्तरप्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश, राजस्थान, गुजरात आदि के भावी विधानसभा और आम चुनाव 2029 के रुझान, मतदान और चुनाव परिणाम वास्तविक तौर पर सवर्णों के सामाजिक और राजनीतिक भविष्य को तय करेंगे।
यही वजह है कि भाजपा की पश्चिम बंगाल में जीत से सवर्ण ईडब्ल्यूएस आरक्षण पर भी सीधा असर पड़ने की संभावना कम है, क्योंकि यह केंद्र सरकार के नीति क्षेत्र में आता है। राज्य स्तर पर भाजपा सवर्ण समर्थन को मजबूत करने वाली नीतियां ला सकती है, लेकिन 10% आर्थिक रूप से कमजोर सवर्ण (EWS) आरक्षण राष्ट्रीय कानून है। यदि इसे पश्चिम बंगाल में भी लागू करवाया जाता है तो यह और भी अच्छी बात होगी।
जहां तक वर्तमान आरक्षण स्थिति की बात है तो पश्चिम बंगाल में वर्तमान आरक्षण 39% हैं, जिसमें अनुसूचित जाति (SC) 22%, अनुसूचित जनजाति (ST) 6%, अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) 10%, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) 1% है, जो 50% की अनुमन्य सीमा से 11% कम है। चूंकि भाजपा केंद्र में ईडब्ल्यूएस (EWS) आरक्षण को साल 2019 से लागू कर चुकी है, जो सवर्णों के लिए आर्थिक आधार पर है, जाति आधार पर नहीं। यही वजह है कि भाजपा यदि पश्चिम बंगाल की सत्ता में आती है तो इसका संभावित प्रभाव राज्य नीति पर भी पड़ेगा।
चर्चा है कि पश्चिम बंगाल की जीत पर भाजपा ईडब्ल्यूएस (EWS) कोटा बढ़ा सकती है और सवर्ण-केंद्रित योजनाएं जो शिक्षा, नौकरी से जुड़ी हैं, वहां ला सकती है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट की 50% सीमा बाधा बनेगी। जहां तक राजनीतिक बात है तो पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से सवर्ण वोट मजबूत होंगे, लेकिन दलित-ओबीसी विरोध बढ़ सकता है, जैसा यूजीसी नियमों पर देखा गया। इसका राष्ट्रीय लिंक यह है कि पश्चिम बंगाल की जीत भाजपा नीत एनडीए को मजबूती देगी, जिससे संसदीय बहुमत से ईडब्ल्यूएस विस्तार संभव है, पर सुप्रीम कोर्ट की चुनौती बनी रहेगी।
चुनाव पूर्व सर्वे के रुझान चुगली कर रहे हैं कि पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में सवर्ण वोटर भाजपा के लिए कोर समर्थन आधार बने रहेंगे, लेकिन उनकी भूमिका निर्णायक से अधिक सहायक होगी। ताजा ओपिनियन पोल्स के अनुसार, सवर्ण हिंदू वोटों का लगभग 33% भाजपा को मिल सकता है, जबकि 20% अभी अनिर्णय की स्थिति में है, यानी अनडिसाइडेड हैं। जहां तक सवर्ण वोटों के आकार की बात है तो पश्चिम बंगाल में हिंदू सवर्ण यानी ब्राह्मण, कायस्थ, वैश्य मतदाता, कुल मतदाताओं का करीब 15-20% हैं, जो मुख्यतः शहरी और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में बसते हैं। भाजपा इन्हें 'सनातनी एकता' के जरिए साध रही है, और 2021 के विधानसभा चुनाव में 68% हिंदू वोट, जिनमें सवर्ण वोट प्रमुख रहे, भाजपा को मिले थे, जिससे वह 77 सीटें जीत पाई है।
जहां तक रणनीतिक महत्व की बात है तो भाजपा का '5% हिंदू वोट स्विंग' फॉर्मूला सवर्णों समेत हिंदू वोटों पर केंद्रित है, और टीएमसी से शिफ्ट का लक्ष्य रखा गया है। चूंकि सवर्ण अनडिसाइडेड हैं, मुस्लिम-टीएमसी समर्थन 23% हैं, इसलिए मतुआ/ओबीसी वोट निर्णायक साबित हो सकते हैं। हालांकि कुछ चुनौतियां भी हैं, क्योंकि एसआईआर (SIR) विवाद से मतुआ वोट प्रभावित हो रहे, जो सवर्ण-केंद्रित भाजपा की रणनीति को कमजोर कर सकता है। वहीं टीएमसी (TMC) सवर्णों को 'ब्राह्मण वोट' के रूप में लुभा रही, क्योंकि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी खुद शांडिल्य गोत्रीय ब्राह्मण हैं। लेकिन सवर्णों पर भाजपा का पारंपरिक दबदबा भी बरकरार है। लिहाजा, सवर्णों का वोट विभाजित होना तय है।
रही बात असम, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी के 2026 विधानसभा चुनावों में सवर्ण वोटरों की भूमिका की तो यह राज्य-विशेष परिस्थितियों के अनुरूप होगी। मुख्य रूप से ये भाजपा या एनडीए (NDA) के पक्ष में काम कर सकते हैं, लेकिन निर्णायक प्रभाव सीमित रहेगा। जहां तक असम की बात है तो यहां सवर्ण वोटरों में मुख्यतः ब्राह्मण-अग्रवाल वैश्य हैं, जो कुल मतदाताओं के 10-12% हैं और भाजपा के मजबूत समर्थक माने जाते हैं। यहां पर एनडीए (NDA) की भाजपा ने राज्य की 89 सीटें जीत करके अपनी सत्ता बरकरार रखने की कोशिश करेगी, क्योंकि मुख्यमंत्री हिमंत विश्वसरमा की लोकप्रियता के साथ लोग एकजूट हैं।
वहीं, केरल में सवर्ण वोटरों में नायर, ब्राह्मण प्रमुख हैं जो हिंदू वोट बैंक का बड़ा हिस्सा हैं, लेकिन यहां पर अल्पसंख्यक यानी मुस्लिम 27% और ईसाई 18% अबतक निर्णायक होते आए हैं। जबकि इस बार भाजपा को मामूली समर्थन मिल सकता है, पर यहां सत्तारूढ़ लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (LDF) और मुख्य विपक्षी यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) के द्वंद्व में भाजपा की राजनीतिक भूमिका गौण ही रहेगी, या फिर वह मजबूती और रणनीतिक कौशल से लड़ी तो किंग मेकर भी बन सकती है। त्रिस्तरीय चुनाव परिणामों से तो यही पता चलता है।
जहां तक तमिलनाडु की बात है तो यहां सवर्ण प्रभाव न्यून है, जबकि द्रविड़ राजनीति में ओबीसी/दलित प्रमुख हैं। इसलिए भाजपा-एआईएडीएमके गठबंधन को सीमित फायदा मिलेगा। जबकि डीएमके-कांग्रेस गठबंधन का वर्चस्व, विजय की ओर है। वहीं टीवीके (TVK) एक नया फैक्टर बन चुका है। यदि इसे चुनावी सफलता मिलती है तो भाजपा गठबंधन वहां भी किंगमेकर की भूमिका निभा सकता है।
जहां तक पुडुचेरी की बात है तो यहां सवर्ण वोटर में वन्नियार, ब्राह्मण हैं जो एनडीए (एन.रंगासामी) के पक्ष में हैं, और 30 सीटों में शहरी क्षेत्रों पर फोकस करते हैं। ये कांग्रेस-बीजेपी मुकाबले में सहायक हैं।
बताया जाता है कि 2026 में इन 5 राज्यों यथा- पश्चिम बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडु, पुडुचेरी के विधानसभा चुनावों में सवर्ण ईडब्ल्यूएस आरक्षण मुख्य मुद्दा नहीं बनेगा, क्योंकि यह ईडब्ल्यूएस आरक्षण केंद्र स्तर पर स्थापित नीति है, जबकि राज्य चुनाव स्थानीय मुद्दों, जैसे बंगाल में घुसपैठ के खिलाफ ध्रुवीकरण, असम में प्रवासी आदि पर केंद्रित रहेंगे। इसका प्रमुख कारण है आर्थिक रूप से कमजोर सवर्ण वर्ग आरक्षण (10% ईडब्ल्यूएस) जो 2019 से कानूनी रूप से लागू है, और सुप्रीम कोर्ट द्वारा इसे मान्य करार दिया गया है।
वहीं, हालिया चुनावी विमर्श में पश्चिम बंगाल में प्रस्तावित बाबरी मस्जिद बनाम राम मंदिर और यूजीसी इक्विटी बिल 2026 जैसे नए विवाद उभरे हैं, जो हिंदुओं खासकर सवर्णों के सियासी मूड को बदल सकते हैं, न कि पुरानी नीति पर वह कायम रहेंगे। इसलिए राज्यवार संभावना है कि पश्चिम बंगाल में हिंदू एकता वनाम टीएमसी (TMC) का पारंपरिक वोट समीकरण हावी रहेगा, इसलिए यहां ईडब्ल्यूएस (EWS) आरक्षण का मुद्दा गौण रह जाएगा। वहीं असम में भाजपा नीत एनडीए की सत्ता, सूबाई/राष्ट्रीय रक्षा नीति और जातिगत गठजोड़ पर टिकी रहेगी। जबकि केरल/तमिलनाडु में अल्पसंख्यक और क्षेत्रीय ओबीसी समीकरण हावी रहेंगे। वहीं, पुडुचेरी में गठबंधन राजनीति भारी पड़ेगी। इसलिए इन चुनावों में असम में जहां भाजपा को अपनी सत्ता बरकरार रखनी है, वहीं पश्चिम बंगाल की सत्ता हासिल करना उसकी प्राथमिकता में है। यदि वह तमिलनाडु, केरल और पुड्डुचेरी में अपने गठबंधन सहयोगियों के साथ सत्ता पाने में कामयाब होती है तो यह उसकी सियासी कौशल का ही नतीजा होगा, जिसके लिए केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह मशहूर माने जाते हैं और अपने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हनुमान बताए जाते हैं।
उल्लेखनीय है कि यूजीसी इक्विटी बिल उच्च शिक्षा संस्थानों में जातिगत, धार्मिक और सामाजिक भेदभाव रोकने के लिए लाया गया एक नियमावली है, जो 2026 में लागू हुआ, लेकिन विवादों के कारण सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी है। मुख्य यह 'प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस रेगुलेशंस, 2026' के नाम से जाना जाता है, जो 15 जनवरी 2026 से सभी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में लागू होना था। इसके तहत हर संस्थान में इक्विटी कमेटी और इक्वल ऑपर्च्युनिटी सेंटर बनाना अनिवार्य है, जहां भेदभाव की शिकायतों पर 24 घंटे में कार्रवाई और 15 दिनों में रिपोर्ट देनी होती है। चूंकि एससी, एसटी, ओबीसी, महिलाओं और दिव्यांगों के प्रतिनिधित्व पर जोर है, लेकिन सामान्य वर्ग का प्रतिनिधित्व न होने से इस पर विवाद बढ़ा।
चूंकि सामान्य वर्ग (कथित सवर्ण) के छात्र इस नए यूजीसी इक्विटी बिल को भेदभावपूर्ण मानते हैं, क्योंकि यह कथित रूप से उन्हें 'डिफॉल्ट अपराधी' ठहराता है और झूठी शिकायतों पर सजा का प्रावधान है। विरोध प्रदर्शन सड़कों तक पहुंच गए, और इसे 'काला कानून' कहा जा रहा है, और इससे बीजेपी के सवर्ण नेताओं व उनके समर्थकों में भी असंतोष है। चूंकि नए बिल में पुराने 2012 नियमों को बदलने का दावा है, इसलिए आलोचक इसे विभाजनकारी बताते हैं। यही वजह है कि 13-15 जनवरी 2026 को यह बिल अधिसूचित होने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने अगली सुनवाई तक स्थगित कर दिया।
जबकि यूजीसी का कहना है कि यह समानता बढ़ाएगा, लेकिन पालन न करने पर संस्थानों की मान्यता रद्द हो सकती है। इससे भाजपा की सियासी सफलता अब सवालों के घेरे में है। यदि उसका दलित/ओबीसी आधार मजबूत नहीं हुआ और कोर वोटर सवर्ण भी उदासीन हो गए, तो 1980-90 के दशक वाली कांग्रेस की तरह 2020-30 के दशक वाली भाजपा भी काफी मजबूत होने के बावजूद सियासी दुर्गति को प्राप्त हो सकती है। क्योंकि सवर्णों के बीच यह संदेश जा चुका है कि यदि भाजपा और अधिक मजबूत होगी तो वह सवर्ण विरोधी कानूनों पर जोर देगी। इसलिए यह सवाल अहम है कि क्या पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणाम में भाजपा गठबंधन की जीत सवर्णों के राजनीतिक-सामाजिक भविष्य को तय करेंगे या नहीं? यक्ष प्रश्न है।
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