भारतीय राजनीति में महिलाओं की भूमिका बढ़ाने के लिए करने होंगे भगीरथ प्रयास
भारतीय राजनीति में महिलाओं की भूमिका बढ़ाने के लिए करने होंगे भगीरथ प्रयास
@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
यही वजह है कि राजनीति में महिलाओं की भूमिका बढ़ाने के लिए निम्नलिखित प्रमुख उपाय करने होंगे।
पहला, अविलंब महिला आरक्षण लागू करें: नारी शक्ति वंदन अधिनियम (106वां संशोधन) भले ही 33% सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करता है, लेकिन 2026 के बाद जनगणना और परिसीमन के बाद ही यह प्रभावी होगा।
दूसरा, शिक्षा और प्रशिक्षण: महिलाओं को नेतृत्व कौशल, राजनीतिक जागरूकता और आत्मविश्वास बढ़ाने वाले कार्यक्रम चलाएं।
तीसरा, टिकट वितरण में हिस्सेदारी: राजनीतिक दलों को कम से कम 33% टिकट महिलाओं को दें, साथ ही OBC/SC/ST महिलाओं के लिए उप-आरक्षण पर विचार किया जाए।
चतुर्थ, सामाजिक बदलाव: परिवार और समाज को महिलाओं को निर्णय लेने में प्रोत्साहित करें, साथ ही लैंगिक भेदभाव कम करें। महिला संगठनों के माध्यम से जागरूकता अभियान चलाएं और आर्थिक सशक्तीकरण सुनिश्चित करें।
जहां तक महिला आरक्षण सम्बन्धी चुनौतियों की बात है तो परिसीमन में देरी से कार्यान्वयन 2029 या बाद तक हो सकता है। जबकि प्रॉक्सी उम्मीदवारों की समस्या और राजनीतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र की कमी बाधा हैं।
देखा जाए तो भारतीय संसद में महिलाओं का प्रतिनिधित्व वर्तमान में सीमित है, विशेष रूप से 18वीं लोकसभा में। 18वीं लोकसभा (2024 चुनावों के बाद) में कुल 543 सीटों पर लगभग 74 महिला सांसद हैं, जो करीब 13.6-14% है। यह वैश्विक औसत (25%) से काफी कम है। जबकि राज्यसभा के 245 सदस्यों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व लगभग 13% है। खुशी की बात है कि पश्चिम बंगाल की महिला मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की कोशिशों से उनके यहां सबसे अधिक महिला सांसद चुनी गईं।
वहीं, राज्य विधानसभाओं में राष्ट्रीय औसत मात्र 9% है, जबकि किसी भी राज्य में 20% से अधिक नहीं। छत्तीसगढ़ में सबसे अधिक 18% महिला विधायक हैं। पंचायती राज में 33-50% आरक्षण से स्थानीय स्तर बेहतर है। इस प्रकार
भारतीय राजनीति में महिलाओं का प्रतिनिधित्व अन्य देशों की तुलना में काफी कम है। हालांकि वैश्विक औसत से पीछे रहने के बावजूद स्थानीय स्तर पर प्रगति हुई है।
संसदीय स्तर पर तुलना करें तो भारत में लोकसभा में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 14% के आसपास है, जबकि वैश्विक औसत 26% है। रवांडा (61%), क्यूबा (55%) और ब्राजील (25%) जैसे देश काफी आगे हैं। यदि क्षेत्रीय स्तर पर तुलना करें तो दक्षिण एशिया में पाकिस्तान (17%) और बांग्लादेश (20%) भारत से बेहतर हैं। वहींपंचायती राज में भारत का 33-50% आरक्षण अन्य विकासशील देशों के लिए मॉडल है।
इस प्रकार भारतीय संसद में महिलाओं का प्रतिनिधित्व अन्य देशों की तुलना में कमजोर रहा है। वैश्विक औसत से पीछे होने के बावजूद स्थानीय स्तर पर आरक्षण ने प्रगति दिखाई है। संसदीय प्रतिनिधित्व के हिसाब से लोकसभा में भारत का 14% महिलाओं का प्रतिनिधित्व रवांडा (61%), क्यूबा (55%) और यूरोपीय संघ औसत (30-35%) से काफी कम है। वैश्विक औसत 26% है, जबकि दक्षिण एशिया में बांग्लादेश (20%) और पाकिस्तान (17%) आगे हैं।
यदि स्थानीय शासन में तुलना करें तो पंचायती राज में 33-50% आरक्षण ने भारत को अन्य विकासशील देशों से बेहतर बनाया है। कई अफ्रीकी देशों में भी इसी मॉडल को अपनाया गया, जो भारत के लिए खुशी की बात है। उम्मीद है कि अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर हमारे रणनीतिकार कोई संजीदगी भरी घोषणाएं करेंगे, ताकि आधी आबादी की राजनीतिक स्थिति सुधरे।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें