ग्लोबल नॉर्थ को ग्लोबल साउथ से मिल रही नीतिगत टक्कर के मायने समझिए
ग्लोबल नॉर्थ को ग्लोबल साउथ से मिल रही नीतिगत टक्कर के मायने समझिए
@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
वैश्विक मंचों पर भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ग्लोबल साउथ की बात दृढ़ता से रखते आए हैं, खासकर जी-20 जैसे मंचों पर प्रमुखता से। इसलिए भारत को ग्लोबल साउथ का प्रवक्ता समझा जाने लगा है। दरअसल, इसके पीछे उनकी सोच रहती है कि ग्लोबल नॉर्थ और ग्लोबल साउथ के बीच की नीतिगत और रणनीतिक असमानता को सामूहिक रूप से दूर किया जाए और इसके दृष्टिगत विकसित देश, विकासशील देशों को कुछ छूट और कुछ सहूलियत दोनों प्रदान करें। उनकी इस बदलती सोच से ग्लोबल नार्थ को ग्लोबल साउथ से नीतिगत टक्कर मिल रही है, जिसके दूरगामी मायने बेहद अहम हैं।
आईए सबसे पहले समझते हैं कि आखिर ग्लोबल नॉर्थ और साउथ क्या है और किसमें कौन से देश शामिल हैं। उल्लेखनीय है कि ग्लोबल नॉर्थ विकसित, धनी देशों को दर्शाता है जैसे अमेरिका, यूरोप, जापान- जहाँ उच्च आय, उन्नत तकनीक और औद्योगिक शक्ति है। जबकि ग्लोबल साउथ विकासशील देशों का समूह है, जिसमें भारत, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका जैसे एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के राष्ट्र आते हैं, जहाँ गरीबी, संसाधन कमी लेकिन बड़ी जनसंख्या है।
जहां तक परस्पर आर्थिक निर्भरता की बात है तो इसका सच ये है कि ऐतिहासिक रूप से, औपनिवेशिक काल से ग्लोबल नॉर्थ के देशों ने, ग्लोबल साउथ के देशों के कच्चे माल का दोहन किया, जो आज भी व्यापार और ऋण के माध्यम से जारी है। हालांकि, अब ग्लोबल साउथ भी तेजी से उभर रहा है और चीन, भारत जैसी अर्थव्यवस्थाएँ G-7 देशों से आगे निकल रही हैं, और BRICS जैसे मंच ग्लोबल नॉर्थ पर निर्भरता कम कर रहे हैं। यही वजह है कि ग्लोबल नार्थ के देशों की बेचैनी बढ़ी है।
जहां तक इस मामले में भारत की भूमिका की बात है तो भारत, ग्लोबल साउथ का नेता/प्रवक्ता बनकर ग्लोबल नॉर्थ और ग्लोबल साउथ के बीच सेतु का काम कर रहा है, जैसे G-20 में साउथ की आवाज उठाकर। आलम यह है कि अब ग्लोबल साउथ अपनी शर्तों पर वैश्विक व्यवस्था बदल रहा है। ग्लोबल साउथ के प्रमुख देश विकासशील अर्थव्यवस्थाओं वाले राष्ट्र हैं, मुख्यतः एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका में। ये देश वैश्विक मंचों पर अपनी सामूहिक आवाज उठाते हैं।
ग्लोबल साउथ के प्रमुख देश इस प्रकार हैं- एशिया के देश: भारत, चीन (कुछ संदर्भों में), इंडोनेशिया, पाकिस्तान, वियतनाम, फिलीपींस। अफ्रीका के देश: दक्षिण अफ्रीका, नाइजीरिया, इथियोपिया, मिस्र, केन्या, डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो। लैटिन अमेरिका के देश: ब्राजील, अर्जेंटीना, कोलंबिया, पेरू, वेनेजुएला। अन्य देश: फिजी, मालदीव (ओशिनिया)। इन देशों की संयुक्त रणनीति से विकसित देश फिक्रमंद हैं और फूट डालो, शासन करो की नीति पर अमल करते दिखाई दे रहे हैं।
आंकड़े बताते हैं कि ग्लोबल साउथ से जुड़े BRICS जैसे समूह के देश यानी ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका (संयुक्त नाम BRICS) के माध्यम से आर्थिक शक्ति दिखाते हैं, जिनका संयुक्त जीडीपी, जी-सात G-7 से अधिक है। भारत इनका प्रमुख प्रवक्ता बन चुका है। ऐसा इसलिए कि ग्लोबल साउथ की अर्थव्यवस्थाओं का संयुक्त GDP वैश्विक कुल जीडीपी का लगभग 40-45% है, जिसमें चीन और भारत जैसी बड़ी अर्थव्यवस्थाएँ प्रमुख योगदान देती हैं।
जहां तक BRICS से G7 की तुलना की बात है तो BRICS देशों (ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका) का संयुक्त GDP पहले से ही G7 से अधिक हो चुका है। यह दर्शाता है कि ग्लोबल साउथ तेजी से आर्थिक शक्ति बन रहा है। वहीं वर्तमान अनुमान के मुताबिक, 2030 तक ग्लोबल साउथ की चार सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से तीन (चीन, भारत सहित) होने का अनुमान है। वहीं पूर्ण ग्लोबल साउथ (एशिया, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका) का कुल GDP $50 ट्रिलियन से ऊपर माना जाता है।
वहीं, कतिपय आंकड़ों के मुताबिक, ग्लोबल साउथ का GDP ग्लोबल नॉर्थ से कम है, लेकिन अंतर तेजी से सिकुड़ रहा है। नवीनतम अनुमानों के अनुसार, नॉर्थ का संयुक्त GDP साउथ से लगभग 20-30% अधिक है। बताया जाता है कि ग्लोबल नॉर्थ (G7 देशों सहित) का कुल GDP वैश्विक 55-60% है, जबकि साउथ का 40-45%। इसप्रकार
BRICS जैसे साउथ समूहों ने G7 को पार कर लिया है, फिर भी समग्र साउथ नॉर्थ से पीछे है।
वहीं, विकास ट्रेंड के मुताबिक, 2030 तक साउथ की चार बड़ी अर्थव्यवस्थाएँ (चीन, भारत आदि) नॉर्थ को चुनौती देंगी। दोनों के बीच अंतर मुख्यतः प्रति व्यक्ति आय और तकनीकी असमानता से है। अब साउथ अपनी शर्तों पर वैश्विक व्यवस्था बदल रहा है। फिर भी कुछ लोग ग्लोबल साउथ को ग्लोबल नॉर्थ का "चारागाह" तक बताते हैं, हालांकि यह कहना पूरी तरह सही नहीं है। क्योंकि यह धारणा आर्थिक असमानता और ऐतिहासिक शोषण पर आधारित है, लेकिन वास्तविकता अधिक जटिल है। यह "चारागाह" वाली धारणा पुरानी हो चुकी है।
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