अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंफ के 'स्टेट ऑफ द यूनियन' भाषण के वैश्विक निहितार्थ

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंफ के 'स्टेट ऑफ द यूनियन' भाषण के वैश्विक निहितार्थ
@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

दुनिया के थानेदार अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप का 2026 स्टेट ऑफ द यूनियन भाषण मुख्य रूप से अमेरिकी अर्थव्यवस्था और घरेलू उपलब्धियों पर केंद्रित रहा। उन्होंने अमेरिकियों को आश्वस्त किया कि 'मेक अमेरिका ग्रेट अगेन' की उनकी नीति सफल रही और इसके तहत दुनियावी देशों पर लगाए गए टैरिफ से अमेरिका के पुराने स्वर्णिम दिन लौट आए हैं। वहीं उनके भाषण में वैश्विक मामलों पर भी उल्लेख हुआ जो भारत, पाकिस्तान और ईरान जैसे परस्पर जुड़े देशों के लिए प्रासंगिक और अहम है। इसलिए इसके अंतरराष्ट्रीय निहितार्थों को समझना होगा।

कतिपय प्रमुख वैश्विक संदर्भ की चर्चा करते हुए ट्रंप ने दावा किया कि उन्होंने भारत-पाकिस्तान के बीच परमाणु युद्ध रोक दिया, जिसमें पाकिस्तानी पीएम शहबाज शरीफ के हवाले से कहा कि 3.5 करोड़ लोग मरने वाले थे। इसके अलावा, उन्होंने ईरान के न्यूक्लियर कार्यक्रम पर 2025 के 'ऑपरेशन मिडनाइट हैमर' का भी जिक्र किया और तेहरान को स्पष्ट चेतावनी दी कि उसकी कोई भी परमाणु व मिसाइल महत्वाकांक्षा बर्दाश्त नहीं होगी। खासबात यह कि ट्रंप ने थाईलैंड-कंबोडिया तथा ईरान-इजरायल जैसे अन्य युद्ध रोकने का भी श्रेय लिया।

निःसंदेह उनके भाषणों का भारत-पाकिस्तान पर प्रभाव पड़ेगा। वाकई उनका यह दावा भारतीय उपमहाद्वीप में तनाव को कम करने की अमेरिकी भूमिका को रेखांकित करता है, हालांकि भारत ने इसे खारिज किया है। बावजूद इसके वैश्विक रूप से, दक्षिण एशिया में अमेरिकी मध्यस्थता की छवि मजबूत होती है, जो क्षेत्रीय स्थिरता के लिए सकारात्मक संदेश देता है।

वहीं, व्यापार और टैरिफ नीति को स्पष्ट करते हुए ट्रंप ने अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के टैरिफ फैसले को 'दुर्भाग्यपूर्ण' बताया और कहा कि डील तोड़ने वाले देशों के लिए 'बुरा डील' तैयार होगा। एक प्रकार से यह भारत जैसे देशों के लिए भी चेतावनी है, जहां अमेरिकी टैरिफ व्यापार संबंधों को प्रभावित कर सकते हैं। वहीं, ईरान पर निहितार्थ यह निकला जा रहा है कि ईरान पर सैन्य कार्रवाई का उल्लेख मध्य पूर्व में तनाव बढ़ा सकता है, जो वैश्विक ऊर्जा बाजार और भारत की विदेश नीति को असर डाल सकता है।

देखा जाए तो ट्रंप के 2026 स्टेट ऑफ द यूनियन भाषण में टैरिफ नीतियों पर सख्त रुख अपनाने से वैश्विक व्यापार पर अनिश्चितता बढ़ सकती है, खासकर डील तोड़ने वाले देशों के लिए। इसप्रकार अमेरिकी टैरिफ नीतियों का प्रभाव पड़ेगा। ट्रंप ने सुप्रीम कोर्ट के टैरिफ फैसले को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहा कि अमेरिका अब 'बुरे डील' तैयार करेगा, जो चीन, भारत जैसे देशों के निर्यात को निशाना बना सकता है। यह नीति वैश्विक सप्लाई चेन को बाधित करेगी, क्योंकि ब्रिक्स देशों ने पहले ही चेतावनी दी है कि एकतरफा टैरिफ WTO नियमों का उल्लंघन करते हैं और आर्थिक असमानता बढ़ाते हैं।

विश्व व्यापार संगठन (WTO) के अनुसार, ऐसी नीतियां 2025 में वैश्विक व्यापार को 0.2% से 1.5% तक कम कर सकती हैं, विशेष रूप से उत्तरी अमेरिका के निर्यात पर असर डालते हुए। जबकि भारत के लिए निहितार्थ यह निकल रहा है कि भारत पर 50% तक टैरिफ लगने से टेक्सटाइल, ज्वेलरी और लेदर जैसे क्षेत्र प्रभावित होंगे, लेकिन 'चीन+1' रणनीति से वैकल्पिक आपूर्ति श्रृंखला में अवसर भी मिल सकते हैं। खासकर भारत को प्रतिक्षण बदलती अमेरिकी टैरिफ नीति से सावधान रहना होगा और नीतिगत परिपक्वता दिखानी होगी। क्योंकि अमेरिका रूस और चीन से निबटकर भारत को कमजोर करने का कोई मौका नहीं छोड़ेगा ताकि जी-सात देशों की बादशाहत बनी रहे।

इतना ही नहीं, दुनिया की विकासशील अर्थव्यवस्थाओं पर अमेरिकी टैरिफ का विनाशकारी प्रभाव पड़ सकता है, लेकिन भारत बहुपक्षीय व्यापार प्रणाली को मजबूत करने में ब्रिक्स के माध्यम से जवाब दे सकता है। इससे वैश्विक व्यापार पर व्यापक असर पड़ेगा। टैरिफ से उपभोक्ता कीमतें बढ़ेंगी, निर्यात घटेगा और बाजारों में अस्थिरता आएगी, जैसा कि अमेरिका-चीन व्यापार युद्ध में देखा गया।
इस दृष्टिकोण से भले ही अमेरिकी नीतियां घरेलू उद्योगों की रक्षा का दावा करती हैं, लेकिन वैश्विक विकास को धीमा कर सकती हैं, जिससे सभी देशों को बातचीत पर जोर देना होगा।

ट्रंप के स्टेट ऑफ द यूनियन भाषण में टैरिफ नीतियों पर जोर से चीन और ब्रिक्स देशों पर व्यापक आर्थिक दबाव पड़ेगा, क्योंकि ट्रंप ने ब्रिक्स को डॉलर-विरोधी साजिश बताया और 10% अतिरिक्त टैरिफ की धमकी दी। जहां तक चीन पर प्रभाव की बात है तो चीन को 15-25% या इससे अधिक टैरिफ का सामना करना पड़ सकता है, जिससे इलेक्ट्रॉनिक्स, मैन्युफैक्चरिंग और फार्मास्यूटिकल्स निर्यात घटेगा, जैसा कि पहले व्यापार युद्ध में हुआ। यह अमेरिकी बाजार से उसे बाहर धकेल सकता है, लेकिन चीन ब्रिक्स के माध्यम से वैकल्पिक व्यापार बढ़ा सकता है।

जहां तक अमेरिकी नीतियों से ब्रिक्स देशों पर असर की बात है तो ट्रंप की 10% अतिरिक्त टैरिफ नीति सभी ब्रिक्स सदस्यों (भारत, रूस, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका आदि) पर लागू होगी, बिना अपवाद के, जो निर्यात-निर्भर अर्थव्यवस्थाओं को नुकसान पहुंचाएगी। ब्रिक्स ने इसे WTO-विरोधी बताया और अपनी मुद्रा में व्यापार बढ़ाने की योजना बनाई, जो डॉलर की साख को चुनौती देगी।इसके व्यापक निहितार्थ निकलेंगे। वास्तव में ये अमेरिकी टैरिफ वैश्विक सप्लाई चेन बाधित करेंगे, ब्रिक्स को एकजुट कर सकते हैं, लेकिन अमेरिकी उपभोक्ताओं पर भी महंगाई का बोझ डालेंगे। लिहाजा चीन और ब्रिक्स जवाबी कदम जैसे काउंटर-टैरिफ या दक्षिण-दक्षिण व्यापार से निपट सकते हैं।

दिलचस्प बात तो यह है कि ट्रंप के टैरिफ नीतियों का अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर उल्टा असर मुख्य रूप से महंगाई बढ़ने, उत्पादन में कमी और व्यापार घाटे में वृद्धि के रूप में दिखा है। जहां तक महंगाई और उपभोक्ता बोझ की बात है तो टैरिफ से आयातित वस्तुओं की कीमतें बढ़ीं, जिसका 96% बोझ अमेरिकी उपभोक्ताओं पर पड़ा, क्योंकि कंपनियों ने लागत ग्राहकों पर डाली। मूडीज की रिपोर्ट के अनुसार, इससे मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर 'ग्रेट रिसेशन' से भी बदतर स्थिति में पहुंच गया। वहीं जहां तक जीडीपी और व्यापार घाटा की बात है तो 2025 की पहली तिमाही में जीडीपी 0.2% घटी, आयात में 42.6% उछाल के कारण, जो टैरिफ से पहले की होड़ थी। जबकि 2025 में व्यापार घाटा 901 अरब डॉलर पार कर गया, चीन के साथ घाटा कम हुआ लेकिन वियतनाम, मेक्सिको जैसे देशों से बढ़ा।इससे नौकरियां और मंदी का खतरा बढ़ा है। नौकरियां घटने और डॉलर कमजोर होने से ट्रंप का वादा उल्टा साबित हुआ, IMF विशेषज्ञों ने इसे नकारात्मक स्कोरकार्ड बताया।
कई अमेरिकी राज्य मंदी के कगार पर हैं, जो जीडीपी का एक-तिहाई हिस्सा बनाते हैं।

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