एप्सटीन सेक्स फाइल्स जैसे सत्तागत सड़ांध पर भारत में चर्चा क्यों लाजिमी? समझिए

एप्सटीन सेक्स फाइल्स जैसे सत्तागत सड़ांध पर भारत में चर्चा क्यों लाजिमी? समझिए
@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

सेक्स की भूख प्रकृति प्रदत्त है, लेकिन इसकी उन्मुक्त और अनियंत्रित प्रवृत्ति विभिन्न शारीरिक व सामाजिक विकृतियों की वाहक समझी जाती है। हालांकि अब जिस तरह से इसे सियासी विस्तार, कारोबारी धंधे और प्रशासनिक प्रभुत्व के लिए बतौर हथियार इस्तेमाल किया जाने लगा है, उससे हमारी जनतांत्रिक, धार्मिक और मनोवैज्ञानिक व्यवस्था खतरे में है। खासकर ब्रह्मचर्य के नीति-नियंता सनातनी राष्ट्र भारत से जुड़े विभिन्न हस्तियों के ऊपर जो उंगलियां उठ रही  हैं, वह बड़े ही शर्म की बात है।

दुनिया के शीर्ष कारोबारी देश अमेरिका से जिस तरह से कभी विकिलीक्स खुलासे, व कभी एप्सटीन सेक्स फाइल्स रहस्योद्घाटन के मामले सामने आते हैं और फिर अंतरराष्ट्रीय जगत में हलचल मच जाती है, वह शायद उसकी रणनीतिक साजिश ही क्यों न हो, लेकिन सड़ांध मार रहीं लोकतांत्रिक प्रवृतियों पर खुली चर्चा आवश्यक है, ताकि मानवीय सूरत और सीरत दोनों बदले व सभ्य-सुसंस्कृत समाज को बढ़ावा मिले, जिसे सुख-शांति-समृद्धि का आधार समझा जाता है।
एप्सटीन सेक्स फाइल्स जैसे सड़ांध पर भारत में चर्चा  लाजिमी है।

बता दें कि 'एप्सटीन सेक्स फाइल्स' जेफरी एप्सटीन नामक अमेरिकी वित्तीय अपराधी और सेक्स ट्रैफिकिंग रैकेट के संचालक से जुड़े दस्तावेज हैं, जिसमें नाबालिग लड़कियों के शोषण, हाई-प्रोफाइल व्यक्तियों (जैसे राजनेता, अरबपति) के नाम, फोटो, वीडियो और फ्लाइट लॉग्स शामिल हैं। दरअसल, ये फाइल्स 2025-2026 में अमेरिकी न्याय विभाग द्वारा धीरे-धीरे जारी की गईं, जिनमें मशहूर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जैसे नाम सामने आए, लेकिन कई विवादास्पद हिस्से अभी भी गोपनीय हैं। दुनिया की अन्य मशहूर हस्तियां भी इसके लपेटे में आईं और उनके धड़ाधड़ इस्तीफे तक हो रहे हैं।

बहरहाल भारत में भी एप्सटीन फ़ाइल पर चर्चा इसलिए लाजिमी है क्योंकि फाइल्स में भारतीय संदर्भ (जैसे पत्रकारों या राजनीतिक दावों से जुड़े आरोप) सामने आए हैं, जो स्थानीय मीडिया और सोशल प्लेटफॉर्म्स पर वायरल हो चुके हैं। लिहाजा सरकार और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप बढ़े हैं, खासकर जब एप्सटीन जैसे वैश्विक सेक्स स्कैंडल्स को भारतीय राजनीतिक संदर्भों से जोड़ा जा रहा है। मसलन यह नाबालिग शोषण और एलीट वर्ग की जवाबदेही पर वैश्विक बहस को भारत के कथित सोशल जस्टिस व कानूनी सुधारों से जोड़ता है।

चूंकि एप्सटीन फाइल्स में भारतीय नामों का जिक्र मीडिया रिपोर्ट्स और कोर्ट दस्तावेजों के आधार पर सामने आया है, लेकिन ये ज्यादातर संपर्क या उल्लेख हैं, न कि प्रत्यक्ष यौन अपराधों के सबूत। इसलिए इन पर सिर्फ बहस की गुंजाइश बनती है, स्पष्ट कानूनी कार्रवाई की फिलवक्त नहीं, क्योंकि ऐसी किसी भी कार्रवाई के लिए सबूत होना चाहिए। भारत से जुड़े प्रमुख उल्लिखित नाम में शामिल हैं- 

 बताया जाता है कि एप्सटीन के दस्तावेजों में अनिल अंबानी का नाम उद्योगपति के रूप में आया, जहां उन्हें "मोदी का आदमी" कहा गया; और उनका संपर्क भारत-अमेरिका मुद्दों पर सम्बन्धित था। वहीं केंद्रीय हरदीप सिंह पुरी का नाम "भारत में आपका आदमी" के रूप में उल्लिखित है; और उन्होंने खुद स्वीकार किया कि अंतरराष्ट्रीय शांति संस्थान से जुड़ी तीन मुलाकातें हुईं। वहीं, आरएसएस के प्रचारक रहे ब्रह्मचर्य शिरोमणि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम ईमेल्स में इजरायल दौरे के संदर्भ में उल्लिखित हैं, लेकिन खुशी की बात यह है कि उनसे जुड़ा कोई सीधा संपर्क या तस्वीर नहीं मिली है। वहीं वेलनेस गुरु दीपक चोपड़ा का ईमेल एप्सटीन को इजरायल न्योता देने वाला के रूप में सामने आया है; जबकिं अन्य संदर्भ बॉलीवुड या उद्योग से जोड़े गए।

इन मामलों में महत्वपूर्ण नोट यह है कि ये नाम फ्लाइट लॉग्स, ब्लैक बुक या ईमेल्स से जुड़े हैं, पर कोई किसी भी भारतीय को यौन शोषण में सीधे आरोपी सिद्ध नहीं किया जा सकता है और न ही अबतक ऐसा हुआ। वहीं मीडिया में कई बॉलीवुड हस्तियां, जयपुर महाराजा और अन्य की अफवाहें हैं, लेकिन आधिकारिक कोर्ट रिकॉर्ड्स में पुष्टि सीमित है। इसलिए इन पर राजनीतिक विवाद बढ़ा, विपक्ष ने सफाई मांगी, पर ज्यादातर रिपोर्ट्स असत्यापित दावों पर आधारित हैं।

एप्सटीन फाइल्स पर भारतीय राजनीति में पक्ष-विपक्ष के बीच तीखे आरोप-प्रत्यारोप हो रहे हैं, जहां नाम उल्लेखों को इस्तीफे और साजिश के रूप में पेश किया जा रहा है। खासकर लोकसभा में विपक्ष के नेता (कांग्रेस) राहुल गांधी ने लोकसभा में केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी पर एप्सटीन से हुई 3-4 मुलाकातों का आरोप लगाया, और उनके इस्तीफे की मांग की और मोदी सरकार को ट्रेड डील दबाव में बताया। उल्लेखनीय है कि श्री पुरी के नाम उक्त फाइल्स में 430 बार आए और पीएम मोदी के नाम भी 33 बार आने को श्री गांधी ने नैतिक सवाल बनाया, व अडानी-एप्सटीन लिंक भी जोड़ा।

वहीं, सत्तापक्ष से बीजेपी ने कपिल सिब्बल पर 2010 में एप्सटीन वित्त पोषित पुरस्कार लेने का आरोप लगाया, और राहुल गांधी से जवाब मांगा। पार्टी ने कांग्रेस को "मोहब्बत की दुकान" चलाने वाला बताया। केंद्रीय मंत्री पुरी ने भी अपनी मुलाकातें शांति संस्थान की बताकर खारिज कीं। भारतीय विदेश मंत्रालय ने भी पीएम मोदी से जुड़े ईमेल दावों को खारिज किया, पर कांग्रेस ने इस बचाऊ प्रवृत्ति पर भी सवाल उठाए। पूरा विवाद संसद सत्र में हंगामा बन गया, लेकिन कोई कानूनी साबित सबूत नहीं मिला।
इसलिए एप्सटीन फाइल्स में उल्लिखित भारतीय नामों (जैसे अनिल अंबानी, हरदीप सिंह पुरी, नरेंद्र मोदी, दीपक चोपड़ा) पर अभी तक कोई प्रत्यक्ष कानूनी कार्रवाई नहीं हुई है।

वर्तमान स्थिति यह है कि भारत में फरवरी 2026 तक सुप्रीम कोर्ट में एक पत्र-याचिका दायर हुई, जिसमें इन नामों की निगरानी वाली जांच की मांग की गई, लेकिन कोर्ट ने अभी कोई आदेश जारी नहीं किया। उद्योगपति अनिल अंबानी पर FEMA से जुड़े पूर्व जांच (जयपुर-रींगस हाईवे प्रोजेक्ट) चल रहे हैं, लेकिन एप्सटीन से कोई लिंक नहीं जोड़ा गया। वहीं, केंद्रीय मंत्री हरदीप पुरी ने मुलाकातें स्वीकार कीं, पर कांग्रेस के आरोपों पर संसदीय बहस हुई, कोई FIR या चार्जशीट नहीं हुई।

बहरहाल, अमेरिका में ही कथित फाइल्स जारी करने पर Ro Khanna जैसे भारतीय मूल के सांसदों ने रेडैक्टेड नामों पर पारदर्शिता मांगी, लेकिन भारतीयों पर कोई DOJ जांच नहीं चली। अलबत्ता ये नाम उल्लेख संपर्क या ईमेल्स तक सीमित हैं, इसलिए अपराध सिद्ध न होने से कार्रवाई नहीं हुई।

वहीं, फरवरी 2026 तक एप्सटीन फाइल्स से जुड़ी सुप्रीम कोर्ट की पत्र-याचिका पर कोई अंतिम आदेश जारी नहीं हुआ है; यह दायर हो चुकी है लेकिन कोर्ट ने अभी स्वतः संज्ञान या नोटिस पर फैसला नहीं लिया। चूंकि यह याचिका अनुच्छेद 32, 129 और 142 के तहत दायर हुई, जिसमें भारतीय नेताओं (जैसे हरदीप सिंह पुरी) के नामों की निगरानी वाली जांच, विशेष समिति गठन और रिकॉर्ड सार्वजनिक करने की मांग है। याचिकाकर्ता ने आरोपों की सत्यता जांचने पर जोर दिया, लेकिन दस्तावेज कथित हैं।

वर्तमान अपडेट यह है कि 12-13 फरवरी 2026 की रिपोर्ट्स में केवल दाखिले की खबरें हैं; कोर्ट ने केंद्र को नोटिस या सुनवाई की कोई पुष्टि नहीं की। जबकि मीडिया में राजनीतिक हंगामा है, लेकिन आधिकारिक कोर्ट वेबसाइट या लाइव लॉ जैसी साइट्स पर कोई प्रगति दर्ज नहीं है।

खास बात यह कि एप्सटीन फाइल्स में पीएम मोदी का नाम एक ईमेल के माध्यम से आया, जो 2017 या 2019 के आसपास का माना जाता है। इसमें एप्सटीन ने दावा किया कि मोदी ने उनसे सलाह ली, खासकर इजरायल यात्रा या अमेरिकी राष्ट्रपति (ट्रंप) के हित में काम करने के संदर्भ में। ईमेल में उल्लेख है कि मोदी ने हाल ही में एप्सटीन से मुलाकात की और अमेरिका-इजरायल संबंधों पर चर्चा हुई, लेकिन यह एप्सटीन का एकतरफा, अप्रमाणित दावा प्रतीत होता है। 

लिहाजा विदेश मंत्रालय ने इसे "सिर-पैर वाला नहीं" बताकर खारिज किया, कहा कि कोई प्रमाणिक सबूत नहीं। जबकि कांग्रेस नेता व मीडिया प्रमुख पवन खेड़ा ने इसे शेयर कर राजनीतिक सवाल उठाए। इसका राजनीतिक प्रभाव यह पड़ा है कि यह उल्लेख फ्लाइट लॉग या ब्लैक बुक से नहीं, बल्कि ईमेल चेन से जुड़ा है, इसलिए कोई प्रत्यक्ष आपराधिक लिंक सिद्ध नहीं। वहीं विपक्ष ने इसे ट्रेड डील और नैतिकता से जोड़ा, जबकि बीजेपी ने निराधार बताया।
इसलिए एप्सटीन सेक्स फाइल्स जैसे सड़ांध पर भारत में चर्चा लाजिमी है, ताकि जनमानस हकीकत समझ सके।

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