मंजूषा लोक चित्रकला को राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय फलक तक पहुंचाने की दिशा में आखिर कब जागरूक होंगे अंग के बुद्धिजीवी
मंजूषा लोक चित्रकला को राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय फलक तक पहुंचाने की दिशा में आखिर कब जागरूक होंगे अंग के बुद्धिजीवी
@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार
जहां तक इसकी उत्पत्ति और विशेषताएँ की बात है तो अवकाश प्राप्त प्रधानाध्यापिका श्री मती गायत्री देवी बताती हैं कि यह कला मुख्य रूप से बिहुला-विषहरी लोककथा पर आधारित है, जिसमें सर्प चित्रण और रेखाचित्र शैली प्रमुख हैं। अपने जमाने की विदुषी महिला समझी जाने वाली गायत्री जी बताती हैं कि मंजूषा को अंगिका चित्रकला या सर्प चित्रकला भी कहा जाता है, जिसमें सीमाओं (बॉर्डर) का विशेष महत्व होता है और यह स्क्रॉल पेंटिंग के रूप में बनाई जाती है। बचपन से ही हमलोग इसे देखते व बनाते आए हैं।
जहां तक इसे मिले जीआई टैग के महत्व की बात है तो उपेंद्र महारथी शिल्प अनुसंधान संस्थान द्वारा 7 अगस्त 2019 को इसके लिए आवेदन किया गया था, जो उत्पाद को उसके मूल क्षेत्र से जोड़ता है और नकल से सुरक्षा प्रदान करता है। इससे राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इसे ख्याति मिलेगी। हालांकि, जीआई टैग मिलने के बावजूद बिहार में इसकी ब्रांडिंग और प्रचार की कमी देखी गई है, जबकि मधुबनी जैसी अन्य कलाओं को अधिक मान्यता मिली है।
यही वजह है कि भागलपुर के दो नामचीन पत्रकारों हिंदुस्तान टाइम्स से कुमार राजेश और सहारा समय से शिवलोचन ने इसे मशहूर करने का बीड़ा उठाया और समसामयिक बिहार का भविष्य समझे जाने वाले उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को इसे भेंट किया। इसके साथ ही भागलपुर में समय समय पर पदस्थापित रहे पुलिस विभाग के आला अधिकारियों को भी इसे भेंट किया। ताकि उनके दफ्तर या ड्राइंग रूम के माध्यम से इसकी लोकप्रियता बढ़े।
जहां तक इसकी वर्तमान स्थिति की बात है तो भागलपुर जिला प्रशासन के प्रयास से यह जीआई उत्पाद बना, लेकिन पर्यटन विभाग की वेबसाइटों पर इसका उचित प्रतिनिधित्व नहीं है, जिससे कलाकारों को चुनौतियाँ का सामना करना पड़ रहा है। उम्मीद है कि पूर्वी बिहार से ही आने वाले उपमुख्यमंत्री श्री चौधरी इस दिशा में गौर करते हुए उचित आदेश देंगे।
भागलपुर से जुड़े युवा समाजसेवी प्रणय राज बताते हैं कि मंजूषा कला को जीआई टैग 14 सितंबर 2021 को प्रदान किया गया था, जब इसका प्रमाणपत्र संख्या 386 जारी हुई। जहां तक आवेदन और प्रक्रिया की बात है तो इसके लिए आवेदन उपेंद्र महारथी शिल्प अनुसंधान संस्थान, भागलपुर द्वारा 7 अगस्त 2019 को किया गया था, Lmao जर्नल नंबर 136 के तहत दर्ज हुआ।
उल्लेखनीय है कि इस संस्थान ने बिहार के अंग क्षेत्र (भागलपुर) की इस पारंपरिक लोक चित्रकला को भौगोलिक संकेतक के रूप में मान्यता दिलाने में प्रमुख भूमिका निभाई। इसे जुड़ी महत्वपूर्ण तिथियाँ निम्नलिखित हैं- उपलब्धि तिथि: 22 मई 2020; प्रमाणपत्र तिथि: 14 सितंबर 2021. वाकई यह टैग मंजूषा को उसके मूल स्थान से जोड़ता है और नकली उत्पादों से सुरक्षा प्रदान करता है।
धैर्य इंडिया के चेयरपर्सन ज्योति सिंह बताते हैं कि जीआई टैग मिलने के बाद मंजूषा कलाकारों को मांग में तीन गुना वृद्धि, उच्च कीमतों पर बिक्री (500 से लाखों रुपये तक), और बड़े म्यूजियमों में प्रदर्शन के अवसर मिले। इससे आर्थिक लाभ की गुंजाइश बनी। अब कलाकारों को सरकारी एवं गैर-सरकारी संस्थानों से अधिक ऑर्डर प्राप्त हो रहे हैं, जिससे युवा कलाकार परिवार का खर्च चला रहे हैं। साड़ियों और अन्य उत्पादों पर मंजूषा डिजाइन की मांग बढ़ी है।
जहां तक प्रशिक्षण और मान्यता की बात है तो उपेंद्र महारथी शिल्प अनुसंधान संस्थान द्वारा प्रशिक्षण से युवाओं में रुझान बढ़ा, और कलाकार देश-विदेश में कार्यशालाएं चला रहे हैं। जीआई टैग ने कला की प्रामाणिकता सुनिश्चित कर स्थानीय कारीगरों को आर्थिक सुरक्षा प्रदान की।
वरिष्ठ पत्रकार राजेश और शिवलोचन संयुक्त रूप से बताते हैं कि मंजूषा कला बिहार के अंग क्षेत्र (वर्तमान भागलपुर) से उत्पन्न एक प्राचीन लोक कला है, जिसकी जड़ें 7वीं शताब्दी तक जाती हैं। जहां तक इसकी उत्पत्ति की बात है तो यह कला मुख्य रूप से कुंभकार और मालाकार समुदायों द्वारा विकसित की गई, जो बांस, जूट, कागज या मिट्टी के बक्सों (मंजूषा) पर चित्र बनाते थे। ये बक्से विषहरी पूजा के दौरान उपयोग होते थे और बिहुला-विषहरी लोककथा पर आधारित होते हैं।
जहां तक इसके इतिहास की बात है तो लब्धप्रतिष्ठित इतिहासकार प्रो डॉ धनपति पांडेय के पुत्र और स्वनामधन्य पत्रकार अशोक अनंत बताते हैं कि मंजूषा कला बिहुला की प्रेम और बलिदान की कथा को घूमते सांपों, चंपा फूल, शिवलिंग जैसे प्रतीकों से दर्शाती है, जो 1931-1948 के बीच प्रमुखता से उभरी। पारंपरिक रूप से स्क्रॉल पेंटिंग के रूप में जानी जाती है, यह बिहार की सबसे पुरानी कलाओं में से एक है।
बिहपुर विधायक इंजीनियर शैलेंद्र बताते हैं कि मंजूषा और मधुबनी कला दोनों बिहार की प्रसिद्ध लोककलाएँ हैं, लेकिन इनकी उत्पत्ति, विषयवस्तु, शैली और उपयोग में मुख्य अंतर हैं। जहां तक उत्पत्ति और क्षेत्र की बात है तो मधुबनी कला मिथिला क्षेत्र (मधुबनी, दरभंगा आदि) से जुड़ी है, जबकि मंजूषा कला अंग क्षेत्र (भागलपुर) की है। मधुबनी मुख्यतः महिलाओं द्वारा दीवारों पर बनाई जाती थी, वहीं मंजूषा कुंभकार समुदाय द्वारा बांस या मिट्टी के बक्सों पर।
इनकी विषयवस्तु और शैली में भी अंतर है। पत्रकार अर्चना राजहंस के मुताबिक, मधुबनी में धार्मिक, पौराणिक कथाएँ, प्रकृति (पक्षी, फूल, मछली) और ज्यामितीय पैटर्न प्रमुख हैं, जो जटिल और विविध रंगों वाली होती है। जबकि मंजूषा विशिष्ट रूप से बिहुला-विषहरी लोककथा, सर्प पूजा, घुमावदार सर्पाकार रेखाओं और सरल प्रतीकों (चंपा फूल, शिवलिंग) पर केंद्रित है।
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