सरकारी दृष्टांत के सहारे लोगों को निःस्वार्थ कर्म के लिए प्रेरित करने का प्रेरणा पुष्प है कर्मकुम्भ
सरकारी दृष्टांत के सहारे लोगों को निःस्वार्थ कर्म के लिए प्रेरित करने का प्रेरणा पुष्प है कर्मकुम्भ
@ कमलेश पांडेय/संपादक की कलम से...
समकालीन दुनिया में सनातन सभ्यता व संस्कृति के आलोक में 'वसुधैव कुटुम्बकम' और 'सर्वे भवन्तु सुखिनः' की अवधारणा को पुनः प्रतिष्ठापित करने के उदेश्य से 'कर्म-कुंभ' नामक इस पुस्तक की परिकल्पना की गई, जिसमें न केवल महाकुम्भ 2025 से जुड़े महत्वपूर्ण पलों को रेखांकित करने का एक विनम्र प्रयास किया गया है बल्कि एक प्रशासनिक अधिकारी के व्यक्तिगत/टीमगत कार्यों से उपजने वाली सामूहिक चेतना के सकारात्मक पहलुओं को भी दर्शाने की एक अदद कोशिश की गई है, ताकि समस्त मानवता को अनुप्राणित करने वाले शासक-सेवक वर्ग की अन्तरात्मा को झंकझोरा जा सके।
आईएएस अधिकारी डॉ दिनेश चन्द्र सिंह द्वारा मौलिक रूप से लिखित तथ्यों व मौखिक रूप से प्रेषित स्वर संग्रह रूपी वाक्यों को संपादित करना निःसंदेह एक जटिल कार्य रहा है। लेकिन जब उद्देश्य व्यक्ति नहीं समष्टि हो तो फिर पेशेवर दक्षता अपने आप ही छाप छोड़ने लगती है। मेरे द्वारा संपादित यह पुस्तक लेखक की तीसरी रचना है जो आपको इस बात के लिए भी अभिप्रेरित करेगी कि आखिर क्यों नहीं पहली पुस्तक 'काल-प्रेरणा' और दूसरी पुस्तक 'कर्म-निर्णय' पर भी दृष्टिपात किया जाए।
आपको पता है कि शिक्षा का महान उद्देश्य ज्ञान और कर्म है जिसको लौकिक व अलौकिक रूप से हासिल करने-करवाने में पुस्तकों के योगदान से इंकार नहीं किया जा सकता। खासकर प्राचीन वेद-पुराण-उपनिषद-महाकाव्यों-गीता आदि के देश में किसी भी नई पुस्तक श्रृंखला को प्रदान करने का एक पावन उदेश्य होता है। ऐसे में वर्तमान हिंसा व द्वेषग्रस्त देश-दुनिया को एक सही मार्ग पर लाने के लिए लेखक/सम्पादक द्वारा जो भागीरथ प्रयास इन पुस्तकों के माध्यम से किया जा सकता है, वह किया गया है। इस हेतु प्रशासनिक विमर्श का भाव पैदा करना-करवाना भी इन पुस्तकों का एक महती उद्देश्य है।
प्रयागराज की पावन संगम स्थली पर 144 वर्ष बाद लगा दुनिया का सबसे बड़ा 'महाकुम्भ मेला 2025' को बहुआयामी दृष्टिकोण से देखने और उसके भीतर छिपी हुई विराट चेतना से सुधी पाठकों को अवगत कराने का जो विनम्र प्रयास लेखक ने किया है, उसे सम्पादकीय कौशल से परिपूर्ण करने की चेष्टा मैंने की है।
इसके अलावा, ऑपरेशन सिंदूर पर त्वरित राष्ट्रवादी टिप्पणी, पक्षीराज मयूर, जैविक खाद का स्रोत ढैचा फसल, डाकू वेशधारी गरीब हितैषी, किसी गरीब के शव को परदेश से स्वदेश लाने की प्रशासनिक उदारता जैसे प्रसंगों को यहाँ देने का स्पष्ट मतलब है कि 'कर्म-कुंभ' की व्यापकता को समझा जाए और उसके अनुरूप ही व्यक्तिगत व सामाजिक आचरण किया जाए। तभी पददलित लोगों का उद्धार संभव है।
यहां पर मैं प्रोफेसर (डॉ) मनोज मिश्र, संकायाध्यक्ष, अनुप्रयुक्त सामाजिक विज्ञान, मानविको संकाय, विभागाध्यक्ष जौनपुर (उ.प्र.) एवं जनसंचार एवं पत्रकारिता विभाग, वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय, जौनपुर द्वारा अभिव्यक्त बातों को संशोधित करते हुए रख रहा हूँ, जिसमें इस पुस्तक 'कर्मकुम्भ' और इसके लेखक डॉ दिनेश चंद्र सिंह के, आईएएस के ऊपर सारगर्भित टिप्पणी की गई है। वह यह कि डॉ. दिनेश चन्द्र सिंह, आई.ए.एस. द्वारा सृजित इस नवीन पुस्तक कर्मकुम्भ, आर्ष परम्परा में गोस्वामी तुलसीदास जी की उन महनीय पंक्तियों का स्मरण करा रही है जिसमें उन्होंने लिखा है कि 'कीरति भनिति भूति भलि सोई। सुरसरि सम सब कहँ हित होई।' अर्थात कीर्ति, कविता और सम्पत्ति वही उत्तम है, जो गंगाजी की तरह निर्मल और सबका हित करने वाली हो। वाकई कुल 24 अध्यायों से अलंकृत इस पुस्तक में.... महाकुंभ का शुभ कलश, मंगलकारी चेतना और विराट स्वरूप का दिग्दर्शन, प्रशासनिक तैयारियां अब शोध अनुसंधान का विषय, उत्कृष्ट प्रबंधकीय व्यवस्था का अनुपम उदाहरण, संगम स्रान की दिव्य अनुभूति, प्रयागराज से जुड़ी महत्वपूर्ण अनुभूतियाँ, महाकुंभ की आस्था और जलवायु परिवर्तन घोषणा पत्र, अनुपम व अविस्मरणी योग्यता, सनातन धर्म के अस्तित्व से आबद्ध है।
वहीं, देवाधिदेव महादेव और भगवान विष्णु के अवतार श्रीराम और श्रीकृष्ण, प्रयागराज महाकुंभके सामाजिक-सांस्कृतिक मायने, संकल्प से सिद्धि-उद्वेग रहित कर्म, जौनपुर महोत्सव 2025 : विकास लोक कल्याण व कलाकारों की मेधा का सम्मान, भक्ति और प्रेम रस की दिव्य अनुभूति, चीनियों और अमेरिकियों की तुलना में भारतीयों को बौद्धिक रूप से मजबूत बनाते हैं सनातनी धार्मिक संस्कार, गरीबों का मसीहा सुल्ताना डाकू एक प्रगतिशील नजरिया, धर्मपूर्वक राजनीति का संधान कीजिए राष्ट्रहित सधेगा, भारतीय संस्कृति में राष्ट्र प्रेम-परिवार प्रेम सवीपरि, पक्षी राज मयूर सप्रेरणा और मन मयूर नृत्य, वृक्षारोपण, गौ-सेवा और पशु पक्षी सेवा के लिए समर्पित एक वैवाहिक वर्षगांठ, शुभकामनाओं से बढ़ा आत्मसम्बल, हृदय से आभार पूर्वक धन्यवाद, अधर्मी पाकिस्तान को कड़वे सबक सिखाने होंगे यदि पुनः सीज फायर टूटा तो?, अधर्म का नाश होगा, धर्म की विजय होगी, अपने मन कछु और है करता के मन कछु और..., जैविक खेती को प्रोत्साहित करने के लिए जिलाधिकारी डॉ. दिनेश चन्द्र सिंह ने लिया ढेंचा खेती का सहारा, मैं हिमालय हूँ... मीडिया कवरेज और अंत में फोटो फीचर शामिल है।
इस प्रकार लेखक ने अपनी कृति कर्मकुम्भ को प्रभु जी तथा अभूतपूर्व महाकुम्भ-दिव्य कुम्भ के ऐतिहासिक आयोजन की भव्यता एवं सफल सम्पादन के लिए लोक पुरुष माननीय प्रधानमन्त्री श्री नरेंद्र मोदी जी एवं उत्तरप्रदेश के तपस्वी एवं यशस्वी माननीय मुख्यमंत्री श्री योगी आदित्यनाथ जी को केंद्र-बिंदु में रखते हुए सादर समर्पित किया है जो निश्चित रूप से विराट महाकुम्भ में एक लोकसेवक के रूप में अपने दायित्व एवं सेवाभाव के साथ महाकुम्भ में अलौकिक दृश्यों के साक्षी बने और उन दिव्य पलों को अन्तर्मन में महसूस किया है।
इस बात में कोई दो राय नहीं कि आज जब सामाजिक ताने-बाने स्वार्थ केन्द्रित हो रहे हों, डिज़िटल होती दुनिया में संयुक्त परिवार एक स्वप्न बन चुका हो, आपसी संबंधों में विघटन हो रहा हो तथा बाजारवाद के प्रभाव ने मानवीय संवेदनाओं को बुरी तरह से कुचल दिया हो, तब भारतीय संस्कृति के ऐसे सुनहरे पृष्ठों को पिरोती हुई कालजयी रचना 'कर्मकुम्भ' की जनोपयोगिता न केवल बढ़ जाती है, बल्कि हमारे सामने विभिन्न अध्यायों/रंगों में सजे 'कर्मकुम्भ' रूपी विचार दीपक के रूप यह कृति संग्रहणीय व प्रदर्शनीय बन जाती है। निःसन्देह गंगाजल लिए मनोभावों से सुजित यह अद्वितीय कृति अपने स्वर्णिम राष्ट्रीय अतीत की बाँकी झाका प्रस्तुत करते हुए समकालीन समाज को जागरूक करने के लिए संकल्पित है।
वस्तुतः रचनाधर्मिता के क्रम में लेखक डॉ. दिनेश चन्द्र सिंह, आईएएस, संप्रति जिलाधिकारी, जौनपुर, उत्तरप्रदेश अगाध साहित्यिक चेतना से ओतप्रोत है तथा अपने हृदय में रचना संसार का सृजन करते हुए सुविचारित रचना धर्मिता का परिचय देते हुए इस पुस्तक के माध्यम से हम सबके बीच एक वैचारिक प्रकाश स्तम्भ सरीखा स्तुत्य भी है। क्योंकि इस नवीनतम और राष्ट्रीय महत्व वाले सृजन के विविध अध्यायों में जहाँ एक ओर उनकी सरलता और निष्कपटता दृष्टिगोचर है तो वहीं दूसरी ओर वसुधैव कुटुम्बकम और भारतीय संस्कृति की विविधता का सम्मान वाला भाव भी झंकृत होता चला जाता है, जिससे पाठक शुरू से अंत तक इससे बंधे रह सकते हैं।
वाकई लेखक की निर्विवाद लेखनी ने कालजयी कृति 'कर्मकुम्भ' के जरिए न केवल भारतीय जीवन पद्धति, उसकी उदात्त परम्परा और जनोपयोगी संस्कारों को सिखाया-दिखाया है अपितु यथार्थ के धरातल पर उन्होंने अपने विभिन्न भावों-अनुभावों को भी अपनी लेखनी से समुचित जगह दी है। इस तरह से आप महान रचनाकार कालिदास जी की आर्ष वाणी 'सरस्वती श्रुति महती महीयता' को भी चरितार्थ करते हैं। आपका लम्बे समय तक प्रशासनिक पदों पर रहने का अनुभव, पूरब के आक्सफोर्ड कहे जाने वाले इलाहाबाद विश्वविद्यालय, प्रयागराज में ज्ञान के सागर गुरुजनों के सानिध्य में रह कर अन्तेवासी शिष्य के रूप में ज्ञान प्राप्त करने के सुयोग का जो सुंदर व सराहनीय प्रतिबिम्बन इस पुस्तक के माध्यम से किया है, वह सभी महानुभावों, खासकर छात्र-छात्राओं के लिए अनुकरणीय है। ऐसा इसलिए कि देश-काल-पात्र के अक्स भी इसमें दृष्टिगोचर हो रहे है।
देखा जाए तो इस कृति में लेखक ने महाकुम्भ की व्यापकता, उसकी तैयारी और सफल क्रियान्वयन के साथ भारतीय संस्कृति की विराटता और महनीयता, इलाहाबादी अमरुद की चर्चा, अमर बलिदानी पं. चंद्रशेखर आजाद जी को श्रद्धा सुमन, अपने युवावस्था के छात्र-जीवन के इलाहाबादी दिनों की झांकी, प्रयागराज के सभी ऐतिहासिक स्थलों की चर्चा, आदरणीय गुरुजनों का स्मरण आदि आपके श्रेष्ठ सुसंस्कारों से परिचित कराता है। वास्तव में इस पुस्तक की इकलौती काव्य रचना 'मैं हिमालय हूँ' में आपने हिमालय की आवश्यकता और व्यापकता के बोध के साथ उसकी प्रासंगिकता को भी गजब तरीके से समझाया है और भारत के मस्तक के आत्मकथ्य को रूपक के रूप में बुलंदी पूर्वक निरूपित किया है, जो प्रारंभ के साथ-साथ उत्तरोत्तर भाव-भाषा, बिंब और प्रवाह में हिमालय की अडिगता का बोध कराता है। इससे बच्चों, युवाओं और बुजुर्गों सभी को सदैव प्रेरणा मिलती रहेगी।
वस्तुतः विद्यार्थी जीवन से ही गागर में सागर भरने की कला, सदैव विमर्श के लिए प्रस्तुत रहने वाला नजरिया, अतीत और भविष्य के बीच सेतु निर्माण कर चलने का संकल्प और लोक मंगल की भावना लेखक का सहज मौलिक गुण है। इस रूप में आप अपने विद्यार्थी जीवन से ही साध्य साधक जीवन के निर्वाहक, निर्भीक, जागरूक, संवेदनशील एवं बहु आयामी व्यक्तित्व के घनी रहे हैं। वहीं, दुर्लभ प्रशासनिक सेवा में भी लोकमंगल की भावना लिए हुए आप साधुमना रहे है और रहेंगे भी। क्योंकि यह आपका प्राकृतिक स्वभाव है।
इस प्रकार कर्म पथ पर निरंतर गतिमान रहने के कारण आप अपने मित्रों, शुभेच्छुओं, सहकर्मियों एवं आम जनमानस में अत्यंत लोकप्रिय है। साथ ही राष्ट्र निर्माता शासकों के अत्यंत प्रिय समझे जाते हैं, जो कि आपका सौभाग्य भी है। भारतीय संस्कृति के अनुसरण, अमृत सरोवरों की स्थापना एवं विलुप्त हो रही सदा नीरा पीली नदी के अविरल प्रवाह को बनाए रखने की पहल और सुशासन एवं नैतिक मूल्यों के उन्नयन के लिए आप सदैव सक्रिय और प्रयत्नशील रहते हैं, जो कि आपका एक दुर्लभ गुण है। एक भले मानुष की तरह पतित पावनी माँ गंगा से प्रेरणा लेकर आपने सभी के लिए अपने द्वार खोले हुए हैं जो कि जनमानस के लिए प्रेरक और अनुसरण योग्य है। सर्वजन हिताय सर्व जन सुखाय को आदर्श वाक्य मान कर उसी रीति-नीति के आधार पर आपने एक प्रशासनिक अधिकारी के रूप में स्वयं को संचालित करने का विनम्र प्रयास किया है, जिसकी कुछ अविस्मरणीय झलक कर्मकुम्भ के स्वणीक्षरों में भी मिलती है।
निःसन्देह, 'कर्मकुम्भ' के उत्तरोत्तर अध्यायों में लेखक के सरल सहज व्यक्तित्व और विनीत जोवन शैली के उच्चतम आदर्शों के प्रतिबिम्ब मिलते है जो किसी आदर्श मानव जीवन संहिता का शाश्वत प्रतीक समझा जा सकता है। यह पुस्तक आपके उद्बोधन और व्यक्तित्व की गरिमा, प्रशासनिक दायित्वों के साथ आपके सारस्वत अध्यवसाय को भी द्योतित करती है। एक सफल जिलाधिकारी के रूप में जन-सेवा का व्रत आपके संस्कारों का प्रतिबिम्बन है। एक विख्यात प्राचीन उक्ति है कि 'केवल संस्कार युक्त वाणी से ही व्यक्ति की शोभा होती है। क्योंकि सभी आभूषण देश-काल-पात्र रूपी समय प्रवाहवश नष्ट हो जाते हैं लेकिन वाणी रूपी आभूषण सदा विद्यमान रहता है।' इसलिए आपके कार्यस्थल पर सुदूर क्षेत्रों से न्याय की आशा लिए आने वाले आम-जन द्वारा आपकी कार्यशैली की हो रही प्रशंसा भी इसी बात का द्योतक है।
इस पुस्तक के पुरोवाक में अष्टावक्र गीता के कल्याणकारी सन्देश में भी आपकी लेखनी के सारस्वत साधना का नैरन्तर्य परिलक्षित होता है। लेखक के लेखन की सार्थकता पाठक या श्रोता ही समझता है। आपकी पुस्तक में यथार्थ का निरूपण है। यथार्थ का आलोड़न-विलोड़न और रस निष्पत्ति के लिए सन्निहित अध्यायों में विभाव, अनुभाव और संचारी भाव की निरंतरता भी सदा गतिमान है। पुस्तक में जीवन के विविध रंगों के सन्देश के साथ-साथ ही जीवन की विविधताओं का साक्षात्कार भी समाहित है। यह कृति निश्चित रूप से जन-जागरण और जन-संग्रहण के मानस पक्ष को और सुप्रतिष्ठित करेगी। आपकी लेखनी में सदा मां सरस्वती विराजमान रहें, आप सदा स्वस्थ रहें- शतायु हों, यही मंगलकामना।
मुझे आशा ही नहीं बल्कि दृढ विश्वास है कि इस पुस्तक की पृष्ठ सज्जा, सम्पादन शैली, अध्याय अनुक्रम आदि पाठकों को पसंद आएगी। आपके महत्वपूर्ण सुझाव व सलाह आमंत्रित है।
# सम्पादक
कमलेश पाण्डेय, वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार, दिल्ली-एनसीआर, मोबाइल नम्बरः +91-8586800513
Email: kamleshforworld@gmail.com
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