एयर इंडिया प्लेन क्रैश अहमदाबाद की नसीहत को समझिए, मर्माहत होइए, कुछ सोचिए-समझिए

एयर इंडिया प्लेन क्रैश अहमदाबाद की नसीहत को समझिए, मर्माहत होइए, कुछ सोचिए-समझिए
@ डॉ दिनेश चन्द्र सिंह, आईएएस

एयर इंडिया अहमदाबाद प्लेन क्रैश की घटना ने सभी संवेदनशील मनुष्यों को द्रवीभूत किया है और पुनः उस परमशक्तिशाली ईश्वरीय सत्ता के अधीन अपने को तन-मन को समर्पित करने और धर्म-कर्म से सम्बन्धित होकर सोचने के लिए विवश किया है। उल्लेखनीय है कि गत 12 जून 2025 को अहमदाबाद से लंदन के लिए सरदार वल्लभ भाई पटेल अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा, अहमदाबाद से उड़ान भरते ही बोईंग 787-8 ड्रीम लाइनर क्रैश हो गई। इस हृदयविदारक प्लेन क्रैश में जहां 270 से अधिक लोगों की मृत्यु हो गई, वहीं ईश्वरीय कृपा से एक यात्री इस विमान क्रैश की विभीषिका के बावजूद भी बाल-बाल बच गया। ऐसे में सवाल उठता है कि यह हादसा किन कारणों से हुआ और यदि एक व्यक्ति पर ईश्वर की कृपा रही, तो फिर अन्य पर क्यों नहीं?

यक्ष प्रश्न है कि क्या विमान में यात्रा कर रहे यात्रियों में से एक मात्र व्यक्ति ही पुण्य कर्म का भागी है? उत्तर होगा- शायद नहीं! मैं भी इस एकांगी विचार से असहमत हूँ। जैसा कि मैंने देखा, अनुभव किया, दुर्घटनाएं भी मानव जनित हैं, जिन्हें अकस्मात रोक पाना संभव नहीं। क्योंकि वैज्ञानिक उपलब्धियों की चकाचौंध में क्षण भर में जीवन जीने का मनुष्य आदी बन चुका है। वह क्षण मात्र में अनंत सुख-समृद्धि की कामना करता है। वह शीघ्र यात्रा के माध्यम से अपने लक्ष्य पर पहुंचने और वैभवपूर्ण जीवन जीने का आदी बन चुका है। इसी अभिलाषा के क्रम में वह विमान यात्रा में सवार होकर पूरी दुनिया घूमता रहता है। वह “जहाँ न पहुंचे रवि, वहां पहुंचे कवि” की अवधारणा को खंडित कर रहा है। 

आधुनिक वैज्ञानिकों ने अपनी उत्कृष्ट प्रतिभा के बल पर मानवीय जीवन को सरल, सहज व सुंदर बना दिया है। खासकर देश-विदेश के प्रशिक्षित तकनीकी शैक्षणिक  संस्थानों से पढ़े-लिखे वैज्ञानिकों ने अतुलनीय उपलब्धि हासिल की है। वहीं, विभिन्न क्षेत्रों के विविध विषयों के विशेषज्ञों की केवल विज्ञान पर आधारित योग्यता ने भी अपनी श्रेष्ठता को साबित किया है। उन्होंने प्रगति का आयाम बनाने की जिजीविषा और उत्कठ महत्वाकांक्षा प्रदर्शित  की है। 

इससे अन्य क्षेत्र के विषय विशेषज्ञ की योग्यता को नकारते हुए उन्होंने अहं पूर्ण व्यवहार प्रदर्शित किया है। इसके कारण उन्होंने अपने आपको केवल अभिमान पूर्वक प्रदर्शित किया है। इनका यह मानना कि, “जहाँ न पहुंचे रवि-कवि, वहां पहुंचेंगे विज्ञान आधारित उपलब्धि एवं देश-विदेश के प्रशिक्षित तकनीकी शैक्षणिक संस्थानों के एक ही विषय में विशेषज्ञ ज्ञानी वैज्ञानिक।” मेरे विचार में शायद उनकी यही सोच पतन और ब्रेक के बाद होते रहने वाली घटनाओं का कारण है।

सनातन धर्म में, कवि जयशंकर प्रसाद की "कामायनी" में मनुष्य के पतन और दुर्घटनाओं के कारणों को बहुत ही सुंदर शब्दों में अभिव्यक्त किया गया है जो इस प्रकार है- “ज्ञान दूर कुछ क्रिया भिन्न है, इच्छा क्यों हो पूरी मन की, तीनों मिलकर एक न हो सके, यही विडम्बना है जीवन की|” सवाल है कि एयर इण्डिया का विमान क्रैश क्यों हुआ? यह तकनीकी जाँच का विषय है, परन्तु दुर्घटना की विषम परिस्थिति इस बात की इशारे कर चुकी है कि उस एक मिनट से कम अवधि में भी पायलट ने जिस पुरुषार्थ और दिव्य मानवीय मूल्यों की रक्षा के संकल्प के साथ धैर्य, विवेक को योग साधना से सम्पृक्त रखते हुए, पायलट द्वय द्वारा विभीषिका की त्रासदी को सबसे कम स्तर पर लाने का प्रयास किया, वह उनके अदम्य साहस का प्रतीक है। इसलिए वो पूज्य हैं और हम सबके आदर्श बन चुके हैं।
ऐसे पायलट को मेरा विनम्र प्रणाम एवं श्रद्धांजलि। 

वहीं, इस घटना में शहीद हुए मृतक जनों के लिए केवल यही कहूँगा कि "आप याद सदा रहेंगे क्योंकि आपकी कोई गलती नहीं। आप सबने विज्ञान की उपलब्धियों पर विश्वास किया और धोखा खाया। मानव जनित वैज्ञानिक उपलब्धियों की खोज में आई तकनीकी खराबी और किसी व्यक्ति विशेष की लापरवाही का शिकार हुए मेरे प्रिय यात्रियों, आपको भी प्रणाम एवं विनम्र श्रद्धांजलि। आपके जीवन की इस अनकही यात्रा की। 

वहीं, उनके परिजनों के लिए केवल यही कहूँगा कि, 'इस गहन पीड़ा, वेदना को कैसे सहेंगे आप, जबकि मैं खुद दुखी हूँ सिर्फ इसके बारे में सोचकर, समझकर, गुणकर। मगर यह भी अकाट्य सत्य है कि दु:खों को सहना ही पड़ता है। ऐसे भी परिवार थे जिनके दुःख की पीड़ा को महसूस करने वाला भी कोई नहीं बचा। हाय! ऐसी त्रासदी फिर न हो कभी, इस बारे में हम सभी को सोचना होगा। परन्तु हमारे शास्त्र कहते हैं कि जो हमें शक्ति देंगे, वही शाश्वत रहेंगे। इसलिए यहाँ पर यह उद्धृत करता हूँ कि, "सुख दुःख नरे नार्या, संपत्सु च विपत्सु च। विशेषो नैव धीरस्य, सर्वत्र समदर्शिनः।। कहने का तातपर्य यह कि समदर्शी धीर के लिए सुख और दुःख में, नर और नारी में, सम्पत्ति और विपत्ति में, कहीं भेद नहीं है, परन्तु ऐसे व्यक्ति विरले ही होते हैं| 

निःसंदेह इस घटना ने सबको दु:खी किया है, परन्तु घटना के कुछ क्षण बाद भी विमान की उड़ान नहीं रुकी। लोगों ने निर्भीकता पूर्वक अपनी विमान यात्राएं जारी रखी। क्योंकि हमें घटना का तो दुःख है, परन्तु अपनी यात्रा और अपनी  सुख की लालसा में कहीं भी क्षण भर की वेदना, दुःख की गहन संकट की घड़ी में सोचकर अपनी किसी भी यात्रा की उड़ान को रोकने की चिंता नहीं है। चाहे घटना सडक पर हो, रेल में हो और जल में यानी जल, थल, नभ में कहीं भी हो, हमें क्षण भर घटना से सम्पृक्त होकर उस वेदना के क्षणों को महसूस करने की फुर्सत कहाँ है? 

बदलते युग और बदलती अर्थव्यवस्था में विज्ञान का अपना बहुत महत्वपूर्ण योगदान है और वैज्ञानिक उपलब्धियों को और वैज्ञानिकों के योगदान को किसी भी तरीके से हम कम नहीं आकलन कर सकते हैं। दुर्घटनाएं होने का तातपर्य यह नहीं कि वैज्ञानिकों के अविष्कार और वैज्ञानिकों का परिश्रम व्यर्थ गया है। दुर्घटनाएं जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में होती हैं। कोई भी क्षेत्र हो, चाहे वह विज्ञान पर आधारित उपलब्धि हो या जनसामान्य के द्वारा किया जा रहा कार्य हो, किसी भी तरीके से उपलब्धियों से कोई भी विषय वंचित नहीं रहा है। इसलिए इस दुर्घटना में तकनीकी खराबी के कारण जो भी हानि हुई है, उस हानि की भरपाई कोई नहीं कर सकता। 

परन्तु संसार गतिशील है, प्रकृति गतिशील है और जीवन की जीवंतता भी गति में ही है। इसलिए हमें दुःख प्रकट करते हुए अपनी गलतियों को सुधारते हुए और संकल्पित भाव से विज्ञान पर आधारित उपलब्धियों के कार्य में किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप न करते हुए केवल सुधारात्मक रवैया अपनाते हुए वैज्ञानिकों के उपलब्धियों  पर गर्व करते हुए, उनकी तकनीकियों पर गर्व करते हुए, उनके द्वारा किये जा रहे प्रयासों की सराहना करते हुए सचेत रहना आवश्यक है। 

क्योंकि सामान्य बोलचाल की भाषा में भी लिखा है कि सावधानी हटी और दुर्घटना घटी। इसलिए हमें सावधान रहते हुए दुर्घटनाओं पर नियंत्रण करना है। पुनः एक बार मैं वैज्ञानिक उपलब्धियों को नमन करते हुए यही कहना चाहूंगा कि हमें जल्दबाजी में किसी की आलोचना नहीं करनी चाहिए, अपितु उनके पुरुषार्थ, उनके योगदान की प्रशंसा करते हुए सावधान और सचेत रहकर उन दुर्घटनाओं से बचने का प्रयास करना चाहिए।

इसलिए विज्ञान आधारित उपलब्धियों की चकाचौंध में ऐसी घटनाओं को रोक पाना अब संभव नहीं। क्योंकि मनुष्य अब क्षण में जीता है। संस्कार, संस्कृति और धर्म में नहीं, जब बताया जाता था कि अब समय नहीं समुन्दर पार करने की यात्राओं का, क्योंकि नक्षत्र मना कर रहे हैं। निःसन्देह हमने धर्म को त्यागा और धर्म ने हमारी समस्या, पीड़ा और वेदना को त्यागा। परन्तु मासूम बच्चों के लिए मैं मौन हूँ और अश्रुपूर्ण आँखों से, हृदय की गहनतम पीड़ा से प्यारे बच्चों की दुर्घटना में हुई मृत्यु के लिए मुझे न विज्ञान कुछ बता पा रहा है, न धर्मशास्त्र।

प्यारे बच्चे! तुम शीघ्र जगत में अपनी यात्रा के लिए मानव के बच्चों बनकर चाह्कोगे और इसबार धर्मशास्त्र आधारित मान्यताओं के आधार पर उड़ान भरना। प्लेन क्रैश नहीं होगा। मेरे प्यारे बच्चे आओगे न। तुम्हारा अनजान अंकल पुकार रहा है। आओ किसी भी धर्मशास्त्र से युक्त परिवार में आना ना। आओ न, पुकारता है तुम्हें एक सरल हृदय, कवि युक्त, रसायन वैज्ञानिक, और कर्मठ प्रशासक, आ जाओ मेरे प्यारे बच्चों।

(लेखक उत्तरप्रदेश के जौनपुर जनपद के जिलाधिकारी हैं।)         





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