क्या अपने खिलाफ जारी वैश्विक षड्यंत्रों को समझ पाएगा भारत और निकाल लेगा उसकी रणनीतिक काट?


क्या अपने खिलाफ जारी वैश्विक षड्यंत्रों को समझ पाएगा भारत और निकाल लेगा उसकी रणनीतिक काट?
@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

पहले अमेरिका और सोवियत संघ, फिर अमेरिका एवं रूस और अब अमेरिका व चीन के बीच जो दुनिया का थानेदार बनने की होड़ मची है, उससे गुटनिरपेक्ष देश भारत के हित गहरे तक प्रभावित हुए हैं। यह हमारे देश के नेताओं और अधिकारियों की गलत और पक्षपाती नीतियों का ही दुष्परिणाम है कि भारत को न चाहते हुए भी कभी अंतरराष्ट्रीय सीमाओं पर तो कभी आंतरिक भूभाग पर युद्ध जैसे हालातों से गुजरना पड़ता है, जिसमें धन-जन की हानि होती है। 

दरअसल, हमारे देश में बढ़ते साम्प्रदायिक विवाद, जातीय विवाद, क्षेत्रीय विवाद आदि का मौलिक कारण यह है कि विदेशी तिकड़मों के चलते आजादी से पहले हमारे 'मानवीय मूल्यों' से 'सियासी बलात्कार' हुए हैं, और उसके बाद उपजे पक्षपाती 'संवैधानिक मूल्यों' से भी 'अनैतिक प्रशासनिक व न्यायिक बलात्कार' हुए हैं! जहां प्रशासनिक और न्यायिक विवेक का खुल्लमखुल्ला उल्लंघन यह कहते हुए किया गया कि हमारे संविधान में ऐसा कहा गया है अथवा उसकी मूल भावना यह है। यहां पर जीवन एवं प्रशासनिक मूल्यों का भी घोर अभाव महसूस किया गया है।

तल्ख अनुभव बताता है कि जब जब कोई 'राजा या उसका मंत्री' व्यवहारिकता की जगह परम्परा की दुहाई देता है और 'जनता या पड़ोसी राजाओं' से उसका तालमेल नहीं बैठता तो वह नष्ट कर दिया जाता है, क्योंकि बाह्य आक्रमणकारियों को असंतुष्ट जनता का साथ मिल जाता है। भारतीय इतिहास में ऐसे कई वृतांत भरे पड़े हैं कि मुस्लिम आक्रमणकारियों या ब्रिटिश कम्पनियों को यहां के हिन्दू राजाओं द्वारा एक दूसरे को कमजोर करने के लिए षड्यंत्र रचकर बुलाया गया और जब वो हिन्दू भारतीयों की कमजोरी पकड़ लिए तो यहां का शासक बन बैठे। जिससे लगभग 1000 वर्षों तक भारतीय गुलामी का दंश झेलते रहे और बमुश्किल आजाद हुए। लेकिन हमारे नेताओं की रस्साकशी ने फिर उसी विभाजनकारी घृणित सोच का सहज शिकार बना दिया, जो आज भी जारी है। 

वहीं, कांग्रेसियों, वामपंथियों, समाजवादियों, जातिवादी क्षेत्रीय दलों और राष्ट्रवादियों के जनतांत्रिक सत्ता संघर्ष में ये तमाम दुर्गुण मसहूस किए जा सकते हैं। इसी बीच वर्ष 1990 के दशक से भूमंडलीकरण, वैश्वीकरण और निजीकरण की आड़ में जो हिंसक-प्रतिहिंसक पूंजीवादी एजेंडा सियासी आवरण में चलवाया जा रहा है, उसके पीछे निहित उद्देश्य वश इतना है कि औद्योगिक क्रांति के बाद इंग्लैंड के नेतृत्व में जो उपनिवेश बनाये गए थे, वो अब सूचना व तकनीकी क्रांति के बाद अमेरिका के नेतृत्व में तथाकथित नए उपनिवेश में शामिल हो जाएं। 

हालांकि इस बीच पूर्वी देशों के साम्यवादी रूस और चीन के उभार ने अमेरिका-इंग्लैंड जैसे पश्चिमी देशों की जोड़ी के लिए 'भस्मासुर' का कार्य किया, जिससे निपटने के लिए भारत का पश्चिमी खेमे या पूर्वी खेमे से जुड़ना पहली शर्त है। जबकि गुटनिरपेक्ष भारत सभी धड़े से समान दूरी बनाकर रखता आया है और तीसरी दुनिया के देशों को नेतृत्व देता है। इसके बावजूद समाजवादी सोच वाली कांग्रेस की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने रूस से और पूंजीवादी सोच वाली भाजपा के प्रधानमंत्री अटलबिहारी बाजपेयी ने अमेरिका से मजबूत रिश्ते कायम किये। 

वहीं, पहले वित्तमंत्री के रूप में और फिर प्रधानमंत्री के तौर पर डॉ मनमोहन सिंह ने अमेरिकी शह पर व भारत के कारोबारियों की कीमत पर, चीन से कारोबारी सम्बन्ध मजबूत किए, जिसकी हवा उनके प्रधानमंत्रित्व काल में ही निकलनी शुरू हो चुकी थी, जो 2014 में उनपर और उनकी पार्टी पर भारी पड़ी। इस प्रकार देखा जाए तो कभी भी अखंड भारत और मजबूत हिंदुस्तान की बुनियाद नहीं रखी गई और अल्पमत-बहुमत के जनतांत्रिक हिसाब से भारतीयों को परस्पर लड़ाया गया, जिसकी भारी कीमत अब हिंदुस्तानी अवाम चुका रही है।

वहीं, जब 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश की कमान संभाली तो उन्होंने अतीत की गलतियों को नए सिरे से सुधारने की एक सकारात्मक पहल की। लेकिन विदेशी प्रलोभनों और दबाव में भारत का प्रतिपक्ष 'इंडिया गठबंधन' बनाकर उनके ऊपर दबाव बनाने में कामयाब हो गया। बावजूद इसके उन्होंने रूस, अमेरिका, जापान, इजरायल, फ्रांस आदि देशों से मजबूत सम्बन्ध स्थापित किए और भारत के पड़ोसियों की नकेल कसी। यही वजह है कि पहले अमेरिका और अब चीन के मार्फ़त पाकिस्तान को साधकर भारत के खिलाफ भड़काया गया।

एक तरफ रूस, अपने पड़ोसी यूक्रेन के साथ युद्ध में फंसा हुआ है, दूसरी तरफ इजरायल, अपने पड़ोसी फिलिस्तीन के साथ संघर्षरत है और तीसरा मोर्चा पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ खोल दिया है। वो भी ऐसे समय में जबकि भारत के दो मजबूत सहयोगी और शुभचिंतक अपनी अपनी सीमाओं पर युद्ध लड़ रहे हैं। यह अमेरिकी और चीनी पूंजीपतियों की आंतरिक चाल है, ताकि इनके हथियारों को नए-नए बाजार मिलते रहें। ऊपर से तो इनकी टैरिफ वार चलती रहती है, लेकिन अंदरखाने के दांवपेंच पूरी दुनिया के लिए शोध का विषय है। 

यही वजह है कि भारत को इससे ज्यादा सावधान रहना होगा। क्योंकि पहले हमारे खिलाफ कोरोना महामारी की साजिश रची गई, फिर लद्दाख पर चीनी दबाव बढ़ा। उस संकट से निकले हुए अभी 6 माह भी नए हुए हैं कि पाकिस्तान प्रेरित कश्मीर संकट पैदा कर दिया गया। अमेरिका और चीन के कारोबारी सम्बन्ध किसी से छुपे हुए नहीं हैं, वहीं दुनिया का नया थानेदार बनने की इनकी शतरंज की चाल पर भारत-रूस-इजरायल जैसे संघर्षरत अन्य देश सिर्फ मोहरा मात्र हैं, जिन्हें समझने की और एहतियाती रणनीति बनाने की जरूरत है।

जिस तरह से भारत ने शुक्रवार को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के उस प्रस्ताव का विरोध किया जिसमें पाकिस्तान को 2.3 अरब डॉलर का नया कर्ज देने की बात की गई थी। क्योंकि भारत का कहना है कि यह पैसा पाकिस्तान सरकार सीमापार आतंकवाद फैलाने में इस्तेमाल कर सकती है। इस बारे में वित्त मंत्रालय की ओर से जारी बयान में कहा गया कि भारत ने IMF बोर्ड की बैठक में हिस्सा तो लिया, लेकिन वोटिंग में भाग नहीं लिया। भारत ने कहा कि अगर ऐसे देश को बार-बार कर्ज दिया जाता है, तो इससे वैश्विक मूल्यों का मजाक बनता है और अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं भी जोखिम में आ जाती हैं।

बावजूद इसके, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने 09 मई 2025 दिन शुक्रवार को पाकिस्तान को मौजूदा एक्सटेंडेड फंड फैसिलिटी के तहत लगभग 1 अरब अमेरिकी डॉलर की तुरंत किस्त जारी करने की मंजूरी दे दी है। यह जानकारी पाकिस्तान के प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) ने दी।
प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने इस पर कहा कि 'आईएमएफ की ओर से पाकिस्तान के लिए 1 अरब डॉलर की किस्त को मंजूरी मिलना भारत की दबाव बनाने की रणनीति की असफलता है।' यह बयान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से जारी किया गया। इससे साफ है कि जिस अमेरिका और चीन ने पारस्परिक गुप्त सांठगांठ से पाकिस्तान को भारत के खिलाफ भड़काया है, वही लोग अब अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं से उसे धन भी दिलवा रहे हैं, ताकि चोर दरवाजे से वह सैन्य साजोसामान खरीद सके और भारत के मुकाबले हथियारों की होड़ पैदा की जा सके।

....और चतुराई तो देखिए, युद्ध प्रेमी अमेरिका के अमेरिकी उपराष्ट्रपति जे. डी. वेन्स ने भारत-पाकिस्तान में जारी तनाव पर कहा है कि अमेरिका इस युद्ध में शामिल नहीं होने जा रहा है। हम दोनों देशों को तनाव कम करने के लिए प्रोत्साहित कर सकते हैं, लेकिन हम युद्ध के बीच में नहीं पड़ेंगे। यह हमारा काम नहीं है।' कहने का तातपर्य यह कि जैसे यूक्रेन और फिलिस्तीन संघर्ष से भारत चतुराई पूर्वक तटस्थ रहता था, अब वही रणनीति पश्चिमी राष्ट्र भारत के ऊपर लागू कर रहे हैं और उधर चीन-पाकिस्तान को उकसा भी रहे हैं कि भारत से मुकाबला करो। ताकि भारत-रूस सम्बन्ध टूटे और लाचारी में भारत पश्चिमी देशों के ग्रुप में शामिल हो जाए।

वैश्विक मामलों के जानकार बताते हैं कि रूस और चीन मिलकर जिस तरह से अरब और इस्लामिक मुल्कों में अमेरिका को घेर रहे हैं और यूरोप से उसकी रणनीतिक दूरी बढ़वा रहे हैं, इससे भारत के बजाय पाकिस्तान की ओर झुकाव रखना उसके लिए ज्यादा फायदेमंद रहेगा। क्योंकि वहीं से अफगानिस्तान, तुर्की और अरब देशों के अलावा चीन को संतुलित रखने में भी वह मददगार साबित होगा, पूर्व की तरह। क्योंकि भारत उसके बस में रहने वाला नहीं है। 

इसके अलावा, वह इस्लामिक देशों में चीन-रूस-भारत के प्रति नया वैचारिक जहर घोलने वाला है ताकि मुस्लिम देश इनकी आंतरिक नीतियों के चलते उनके खिलाफ हो जाएं और अमेरिका विरोध छोड़ दें, जो 9/11 से दिखाई पड़ा था। इससे अमेरिकी हथियार भी बरास्ता पाकिस्तान, काफी बिकने की संभावना है। इसी अमेरिकी रणनीति के तरह यूरोपीय देश इंग्लैंड के अलावा अब फ्रांस भी इस्लामिक देशों से सहानुभूति विकसित कर रहा है, जो इजरायल के भविष्य के मद्देनजर ठीक नहीं है। ऐसी परिस्थिति में भारत को फूंक फूंक कर चलना होगा, ताकि उसके राष्ट्रीय हित प्रभावित नहीं हों।


क्या अपने खिलाफ जारी वैश्विक षड्यंत्रों को समझ पाएगा भारत और निकाल लेगा उसकी रणनीतिक काट?

@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

पहले अमेरिका और सोवियत संघ, फिर अमेरिका एवं रूस और अब अमेरिका व चीन के बीच जो दुनिया का थानेदार बनने की होड़ मची है, उससे गुटनिरपेक्ष देश भारत के हित गहरे तक प्रभावित हुए हैं। यह हमारे देश के नेताओं और अधिकारियों की गलत और पक्षपाती नीतियों का ही दुष्परिणाम है कि भारत को न चाहते हुए भी कभी अंतरराष्ट्रीय सीमाओं पर तो कभी आंतरिक भूभाग पर युद्ध जैसे हालातों से गुजरना पड़ता है, जिसमें धन-जन की भारी हानि होती है। 

दरअसल, हमारे देश में बढ़ते साम्प्रदायिक विवाद, जातीय विवाद, क्षेत्रीय विवाद आदि का मौलिक कारण यह है कि विदेशी तिकड़मों के चलते आजादी से पहले हमारे 'मानवीय मूल्यों' से 'सियासी बलात्कार' हुए हैं, और उसके बाद उपजे पक्षपाती 'संवैधानिक मूल्यों' से भी 'अनैतिक प्रशासनिक व न्यायिक बलात्कार' हुए हैं! जहां प्रशासनिक और न्यायिक विवेक का खुल्लमखुल्ला उल्लंघन यह कहते हुए किया गया कि हमारे संविधान में ऐसा कहा गया है अथवा उसकी मूल भावना यह है। यहां पर जीवन एवं प्रशासनिक मूल्यों का भी घोर अभाव महसूस किया गया है।

तल्ख अनुभव बताता है कि जब जब कोई 'राजा या उसका मंत्री' व्यवहारिकता की जगह परम्परा की दुहाई देता है और 'जनता या पड़ोसी राजाओं' से उसका तालमेल नहीं बैठता तो वह नष्ट कर दिया जाता है, क्योंकि बाह्य आक्रमणकारियों को असंतुष्ट जनता का साथ मिल जाता है। भारतीय इतिहास में ऐसे कई वृतांत भरे पड़े हैं कि मुस्लिम आक्रमणकारियों या ब्रिटिश कम्पनियों को यहां के हिन्दू राजाओं द्वारा एक दूसरे को कमजोर करने के लिए षड्यंत्र रचकर बुलाया गया और जब वो हिन्दू भारतीयों की कमजोरी पकड़ लिए तो यहां का शासक बन बैठे। जिससे लगभग 1000 वर्षों तक भारतीय गुलामी का दंश झेलते रहे और बमुश्किल आजाद हुए। लेकिन हमारे नेताओं की रस्साकशी ने फिर उसी विभाजनकारी घृणित सोच का सहज शिकार बना दिया, जो आज भी जारी है। 

वहीं, कांग्रेसियों, वामपंथियों, समाजवादियों, जातिवादी क्षेत्रीय दलों और राष्ट्रवादियों के जनतांत्रिक सत्ता संघर्ष में ये तमाम दुर्गुण मसहूस किए जा सकते हैं। इसी बीच वर्ष 1990 के दशक से भूमंडलीकरण, वैश्वीकरण और निजीकरण की आड़ में जो हिंसक-प्रतिहिंसक पूंजीवादी एजेंडा सियासी आवरण में चलवाया जा रहा है, उसके पीछे निहित उद्देश्य वश इतना है कि औद्योगिक क्रांति के बाद इंग्लैंड के नेतृत्व में जो उपनिवेश बनाये गए थे, वो अब सूचना व तकनीकी क्रांति के बाद अमेरिका के नेतृत्व में तथाकथित नए उपनिवेश में शामिल हो जाएं। 

हालांकि इस बीच पूर्वी देशों के साम्यवादी रूस और चीन के उभार ने अमेरिका-इंग्लैंड जैसे पश्चिमी देशों की जोड़ी के लिए 'भस्मासुर' का कार्य किया, जिससे निपटने के लिए भारत का पश्चिमी खेमे या पूर्वी खेमे से जुड़ना पहली शर्त है। जबकि गुटनिरपेक्ष भारत सभी धड़े से समान दूरी बनाकर रखता आया है और तीसरी दुनिया के देशों को नेतृत्व देता है। इसके बावजूद समाजवादी सोच वाली कांग्रेस की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने रूस से और पूंजीवादी सोच वाली भाजपा के प्रधानमंत्री अटलबिहारी बाजपेयी ने अमेरिका से मजबूत रिश्ते कायम किये। 

वहीं, पहले वित्तमंत्री के रूप में और फिर प्रधानमंत्री के तौर पर डॉ मनमोहन सिंह ने अमेरिकी शह पर व भारत के कारोबारियों की कीमत पर, चीन से कारोबारी सम्बन्ध मजबूत किए, जिसकी हवा उनके प्रधानमंत्रित्व काल में ही निकलनी शुरू हो चुकी थी, जो 2014 में उनपर और उनकी पार्टी पर भारी पड़ी। इस प्रकार देखा जाए तो कभी भी अखंड भारत और मजबूत हिंदुस्तान की बुनियाद नहीं रखी गई और अल्पमत-बहुमत के जनतांत्रिक हिसाब से भारतीयों को परस्पर लड़ाया गया, जिसकी भारी कीमत अब हिंदुस्तानी अवाम चुका रही है।

वहीं, जब 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश की कमान संभाली तो उन्होंने अतीत की गलतियों को नए सिरे से सुधारने की एक सकारात्मक पहल की। लेकिन विदेशी प्रलोभनों और दबाव में भारत का प्रतिपक्ष 'इंडिया गठबंधन' बनाकर उनके ऊपर दबाव बनाने में कामयाब हो गया। बावजूद इसके उन्होंने रूस, अमेरिका, जापान, इजरायल, फ्रांस आदि देशों से मजबूत सम्बन्ध स्थापित किए और भारत के पड़ोसियों की नकेल कसी। यही वजह है कि पहले अमेरिका और अब चीन के मार्फ़त पाकिस्तान को साधकर भारत के खिलाफ भड़काया गया।

एक तरफ रूस, अपने पड़ोसी यूक्रेन के साथ युद्ध में फंसा हुआ है, दूसरी तरफ इजरायल, अपने पड़ोसी फिलिस्तीन के साथ संघर्षरत है और तीसरा मोर्चा पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ खोल दिया है। वो भी ऐसे समय में जबकि भारत के दो मजबूत सहयोगी और शुभचिंतक अपनी अपनी सीमाओं पर युद्ध लड़ रहे हैं। यह अमेरिकी और चीनी पूंजीपतियों की आंतरिक चाल है, ताकि इनके हथियारों को नए-नए बाजार मिलते रहें। ऊपर से तो इनकी टैरिफ वार चलती रहती है, लेकिन अंदरखाने के दांवपेंच पूरी दुनिया के लिए शोध का विषय है। 

यही वजह है कि भारत को इससे ज्यादा सावधान रहना होगा। क्योंकि पहले हमारे खिलाफ कोरोना महामारी की साजिश रची गई, फिर लद्दाख पर चीनी दबाव बढ़ा। उस संकट से निकले हुए अभी 6 माह भी नए हुए हैं कि पाकिस्तान प्रेरित कश्मीर संकट पैदा कर दिया गया। अमेरिका और चीन के कारोबारी सम्बन्ध किसी से छुपे हुए नहीं हैं, वहीं दुनिया का नया थानेदार बनने की इनकी शतरंज की चाल पर भारत-रूस-इजरायल जैसे संघर्षरत अन्य देश सिर्फ मोहरा मात्र हैं, जिन्हें समझने की और एहतियाती रणनीति बनाने की जरूरत है।

जिस तरह से भारत ने शुक्रवार को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के उस प्रस्ताव का विरोध किया जिसमें पाकिस्तान को 2.3 अरब डॉलर का नया कर्ज देने की बात की गई थी। क्योंकि भारत का कहना है कि यह पैसा पाकिस्तान सरकार सीमापार आतंकवाद फैलाने में इस्तेमाल कर सकती है। इस बारे में वित्त मंत्रालय की ओर से जारी बयान में कहा गया कि भारत ने IMF बोर्ड की बैठक में हिस्सा तो लिया, लेकिन वोटिंग में भाग नहीं लिया। भारत ने कहा कि अगर ऐसे देश को बार-बार कर्ज दिया जाता है, तो इससे वैश्विक मूल्यों का मजाक बनता है और अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं भी जोखिम में आ जाती हैं।

बावजूद इसके, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने 09 मई 2025 दिन शुक्रवार को पाकिस्तान को मौजूदा एक्सटेंडेड फंड फैसिलिटी के तहत लगभग 1 अरब अमेरिकी डॉलर की तुरंत किस्त जारी करने की मंजूरी दे दी है। यह जानकारी पाकिस्तान के प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) ने दी।
प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने इस पर कहा कि 'आईएमएफ की ओर से पाकिस्तान के लिए 1 अरब डॉलर की किस्त को मंजूरी मिलना भारत की दबाव बनाने की रणनीति की असफलता है।' यह बयान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से जारी किया गया। 

इससे साफ है कि जिस अमेरिका और चीन ने पारस्परिक गुप्त सांठगांठ से पाकिस्तान को भारत के खिलाफ भड़काया है, वही लोग अब अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं से उसे धन भी दिलवा रहे हैं, ताकि 'चोर दरवाजे' से वह सैन्य साजोसामान खरीद सके और भारत के मुकाबले हथियारों की होड़ पैदा की जा सके।

....और चतुराई तो देखिए, युद्ध प्रेमी अमेरिका के अमेरिकी उपराष्ट्रपति जे. डी. वेन्स ने भारत-पाकिस्तान में जारी तनाव पर कहा है कि अमेरिका इस युद्ध में शामिल नहीं होने जा रहा है। हम दोनों देशों को तनाव कम करने के लिए प्रोत्साहित कर सकते हैं, लेकिन हम युद्ध के बीच में नहीं पड़ेंगे। यह हमारा काम नहीं है।' कहने का तातपर्य यह कि जैसे यूक्रेन और फिलिस्तीन संघर्ष से भारत चतुराई पूर्वक तटस्थ रहता था, अब वही रणनीति पश्चिमी राष्ट्र भारत के ऊपर लागू कर रहे हैं और उधर चीन-पाकिस्तान को उकसा भी रहे हैं कि भारत से मुकाबला करो। ताकि भारत-रूस सम्बन्ध टूटे और लाचारी में भारत पश्चिमी देशों के ग्रुप में शामिल हो जाए। इसी तरह चीन भी शांति का पक्षधर दिखाई दे रहा है, जैसा कि उसके बयानों से स्पष्ट हो रहा है।

वैश्विक मामलों के जानकार बताते हैं कि रूस और चीन मिलकर जिस तरह से अरब और इस्लामिक मुल्कों में अमेरिका को घेर रहे हैं और यूरोप से उसकी रणनीतिक दूरी बढ़वा रहे हैं, उसी तरह से अमेरिका भी उन्हें घेरने की चाल चल रहा है। इससे भारत के बजाय पाकिस्तान की ओर झुकाव रखना उसके लिए ज्यादा फायदेमंद रहेगा। क्योंकि वहीं से अफगानिस्तान, तुर्की और अरब देशों के अलावा चीन को संतुलित रखने में भी वह मददगार साबित होगा, पूर्व की तरह। क्योंकि भारत उसके बस में रहने वाला नहीं है। 

इसके अलावा, वह इस्लामिक देशों में चीन-रूस-भारत के प्रति नया वैचारिक जहर घोलने वाला है ताकि मुस्लिम देश इनकी आंतरिक नीतियों के चलते उनके खिलाफ हो जाएं और अमेरिका विरोध छोड़ दें, जो 9/11 से दिखाई पड़ा था। इससे अमेरिकी हथियार भी बरास्ता पाकिस्तान, काफी बिकने की संभावना है। इसी अमेरिकी रणनीति के तरह यूरोपीय देश इंग्लैंड के अलावा अब फ्रांस भी इस्लामिक देशों से सहानुभूति विकसित कर रहा है, जो इजरायल के भविष्य के मद्देनजर ठीक नहीं है। 

ऐसी परिस्थिति में भारत को फूंक फूंक कर चलना होगा, ताकि उसके राष्ट्रीय हित प्रभावित नहीं हों। क्योंकि 
सांप्रदायिक आतंकवाद भारत के लिए एक जटिल समस्या बन चुका है। दरअसल, यह उसक प्रतिस्पर्धी देशों के लिए भारत को कमजोर करने का एक माकूल हथियार साबित हो रहा है। समझा जा रहा है कि दुनिया का थानेदार अमेरिका की इस कुटिल रणनीति को अब चीन ने भी अख्तियार कर लिया है, ताकि अमेरिका को जैसे को तैसा की तर्ज पर जवाब दिया जा सके।

दरअसल, हथियार और सुरक्षा उपकरणों के कारोबार से जुड़े देशों के इस रणनीतिक षडयन्त्र से भारत की मुश्किलें बढ़ना लाजिमी है, क्योंकि ऐसे देश मुंह में राम बगल में छूरी वाली कहावत को चरितार्थ करते आए हैं। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि जातीय उन्माद आधारित समाजवादी या वामपंथी नक्सलवाद/उग्रवाद और अंडरवर्ल्ड प्रायोजित संगठित अपराध भी इसके जुड़वे भाई बन चुके हैं। जगह-जगह होने वाले जातीय, क्षेत्रीय और सांप्रदायिक दंगों के पीछे भी आतंकवाद को  प्रोत्साहन देने वाली आईएसआई और सीआईए जैसी ख़ुफ़िया एजेंसियों का ही हाथ रहता है। इसलिए इनके खात्मे के लिए एकीकृत प्रयास करने की जरूरत है।

आपने पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद से झुलसते हुए पंजाब प्रान्त के बारे में अवश्य सुना होगा| जहाँ के खालिस्तानियों आतंकवादियों को कनाडा, अमेरिका और ब्रिटेन आदि पश्चिमी देशों से नैतिक और आर्थिक मदद मिलती थी। बहरहाल कुछ ऐसा ही जम्मू-कश्मीर में भी हो रहा है। इस कड़ी में अब तुर्की और बांग्लादेश आदि ओआईसी से जुड़े देशों का नाम भी यदि जोड़ लिया जाए तो गलत नहीं होगा।

मसलन, बरास्ता कश्मीर इसे पूरे भारत में फ़ैलाने की योजना दशकों पहले बन चुकी हैं। अशांत उत्तरपूर्व, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, उत्तरप्रदेश, बिहार, झारखण्ड, पश्चिम बंगाल, गुजरात, राजस्थान, दिल्ली, हरियाणा, कर्नाटक, आंध्रप्रदेश आदि विभिन्न राज्यों में आतंकी, नक्सली या संगठित अपराधिक वारदातें हो चुकी हैं। यह बात मैं नहीं कह रहा हूँ बल्कि पहलगाम आतंकी हमले के बाद हुए ऑप्रेशन सिंदूर के पश्चात पैदा हुईं अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियां और बयानबाजियां इस बात की चुगली कर रहीं हैं।



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