भारत की सर्वाधिक आबादी एक वरदान, इसके मायने को ऐसे समझिए


# यदि सरकार समझदारी दिखाए तो दुनिया के सर्वाधिक आबादी वाले मुल्क भारत और हिंदुओं दोनों की चमक सकती है तकदीर

@ कमलेश पांडेय/ राजनैतिक दुनिया

चलिए, आबादी के मामले में भारत ने चीन को पीछे धकेल दिया है, और यदि सबकुछ ठीक ठाक रहा तो निकट भविष्य में अर्थव्यवस्था के मामले में भी भारत यह करिश्मा दोहरा सकता है, बशर्ते कि वह ठंडे दिमाग से अपनी बढ़ती हुई जनसंख्या का सदुपयोग करना सीखे और उनकी समुचित परवरिश का ख्याल रखे। यह संभव है, बस हमारी व्यवस्था को सिर्फ रणनीतिक दूरदर्शिता दिखाने की जरूरत है। इससे हमारे काम-धंधे में भी गति आएगी और भारतीय सेना के विकास व विस्तार में भी मदद मिलेगी, जो बहुत आवश्यक बात है समसामयिक परिस्थितियों में।

बता दें कि जनगणना पर केंद्रित एक स्वतंत्र संगठन वर्ल्ड पॉपुलेशन रिव्यु (डब्ल्यूपीआर) की एक ताजा रिपोर्ट से जाहिर हो चुका है कि भारत की आबादी चीन से ज्यादा हो चुकी है, जिससे वह दुनिया का सर्वाधिक जनसंख्या वाला देश बन चुका है। भारत की आबादी साल 2022 तक 1.417 अरब तक पहुंच चुकी है, जबकि चीन की आबादी महज 1.412 अरब है। इस आधार पर भारत की जनसंख्या चीन से 50 लाख ज्यादा हो चुकी है। 

जानकारों की मानें तो भले ही पहले के मुकाबले भारत की जनसंख्या वृद्धि धीमी हो चुकी है, फिर भी यहां की जनसंख्या कम से कम 2050 तक तेजी से बढ़ती रहेगी।जबकि चीन में सख्त जनसंख्या नियंत्रण सम्बन्धी नीतियों के चलते उसकी आबादी घटेगी, या फिर भारत के मुकाबले ज्यादा नहीं हो पाएगी। इससे स्पष्ट है कि निकट भविष्य में भारत की जनसंख्या और ज्यादा बढ़ेगी! इसलिए वह दिन दूर नहीं, जब हिंदुओं की तादाद भी दुनिया में काफी हो जाए। समसामयिक राष्ट्रीय और वैश्विक परिवेश में अपनी आबादी बढ़ाना हिंदुओं के अस्तित्व रक्षा के लिए भी बेहद जरूरी हो चुका है।

देखा जाए तो भारत की बढ़ती आबादी खुशी की बात भी है और चिंता बढ़ाने वाली भी! खुशी इसलिए कि ईसाइयों और मुस्लिमों के मुकाबले हिंदुओं की संख्या में भी बढ़ोतरी होगी, जिससे सत्ता संघर्ष में हिन्दू पिछड़ेंगे नहीं! और चिंता इस बात की कि बढ़ती आबादी का भरण-पोषण कैसे सम्भव होगा। उनके लिए छत की व्यवस्था कहाँ हो पाएगी।उन्हें किस काम-धंधे में लगाया जाएगा। इसलिए अब यह हमारी व्यवस्था के ऊपर निर्भर है कि वह इस अकूत मानव संसाधन का उपयोग करके भविष्यगत दूरदर्शिता दिखाती है या फिर आबादी पर लगाम कसने के लिए वह पूर्ववर्ती सरकारों की तरह अपना सिर धुनती है! और फिर इसे नियंत्रित करने के लिए तरह-तरह के उपाय करती है। 

हमारी राय है कि मोदी सरकार इस बढ़ती आबादी का सदुपयोग करे और सुनियोजित रूप से भारतीयों को दुनिया के उन हिस्सों में बसाने का यत्न करे, जहां श्रम की डिमांड है, जहां हिन्दू अल्पसंख्यक हैं या फिर न के बराबर हैं। ईसाई और मुस्लिम मुल्कों में भारत का यह प्रयोग कारगर साबित हो सकता है। इससे भारत को भविष्य में रणनीतिक लाभ मिल सकेगा। उदाहरण के तौर पर ऑस्ट्रेलिया और रूस के पास जितनी भूमि है, उतनी आबादी वहां नहीं है। वहां हम अपनी आबादी को प्रतिरोपित करवा सकते हैं। वहां की सरकारें इसे प्रोत्साहित भी कर रही हैं। यह स्थिति हिन्दू और हिंदुत्व के विकास के लिए एक दूरदर्शिता भरी रणनीति होगी। उम्मीद है कि मोदी सरकार इसे समझेगी।

वैसे तो मौजूदा मोदी सरकार में भी ऐसे लोग शामिल हैं जो अल्पसंख्यकों की बढ़ती आबादी पर लगाम लगाने के हिमायती हैं, या फिर उसी हिसाब से हिंदुओं की जनसंख्या बढ़ने देने के पक्षधर भी। क्योंकि यदि ऐसा न किया गया तो अपने ही देश में हिन्दू अल्पसंख्यक हो जाएंगे। कई भारतीय राज्यों में अब वो अल्पसंख्यक हो भी चुके हैं। क्योंकि हिन्दू लोग परिवार नियोजन के 'हम दो हमारे दो' जैसे आदर्शवादी सरकारी नारे से अभिप्रेरित होकर अपनी जनसंख्या पर खुद ब खुद लगाम लगा चुके हैं। 

हालांकि, हमारे जैसे लोग इस उदारवादी सोच से ज्यादा इत्तेफाक नहीं रखते, क्योंकि सनातन धर्मावलंबियों यानी हिंदुओं को वैश्विक स्तर पर दबाने के लिए जिस तरह के हथकंडे चर्च और मस्जिदों की आड़ लेकर अपनाए जा रहे हैं और विभिन्न प्रकार के षड्यंत्र हो रहे हैं, जिनमें धर्मांतरण भी शामिल है, उनसे मुकाबिल होने के लिए हिंदुओं की जनसंख्या को बढ़ाने व उसके समुचित पोषण व प्रतिरोपण के उपाय किये जाने की जरूरत है। इस हेतु यहां पर मौजूद मंदिरों के विशाल संसाधनों का भी सदुपयोग किया जाए तो किसी को आपत्ति नहीं होगी। क्योंकि उनका अधिग्रहण करके उससे होने वाली अकूत आय का गैर हिंदुओं के हित में प्रयोग कर रही है, जिस पर हिन्दू आपत्ति कर रहे हैं और मामले न्यायालय की दहलीज तक पहुँच चुके हैं।

वहीं, देखा जाए तो समकालीन विश्व बहुमत के लोकतंत्र को मान्यता प्रदान करता है। इस नजरिए से पूरी दुनिया में हिन्दूओं को भी अपना बहुमत बढ़ाने के यत्न उसी तरह से करने चाहिए, जिस तरह से जनसेवा की आड़ में ईसाई और बल प्रयोग करके इस्लाम धर्मावलम्बी कर रहे हैं! पूरी दुनिया में हिन्दू अभी जनसंख्या के मामले में सिर्फ तीसरी बड़ी ताकत समझे जाते हैं। इस नजरिए से हम पहले दूसरे पायदान पर और फिर पहले पायदान पर कैसे पहुंचें, इसके लिए समवेत कोशिशें करनी होगी। उन कोशिशों को जारी रखनी होगी। इस आलेख को लिखने का हमारा आशय भी यही है।

हमें मालूम है कि भारत के पास भूमि सम्पदा, जल सम्पदा, वन संपदा व खनिज संपदा जैसे प्राकृतिक संसाधनों की कमी नहीं है। अब हमारे पास दुनिया की सबसे बड़ी आबादी भी हो चली है। इसलिए हमें सबको रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा, स्वास्थ्य, सम्मान, परिवहन, तकनीकी गैजेट्स व अन्य नागरिक सुविधाओं आदि को प्रदान करने के लिए सजग होकर रणनीति बनानी चाहिए और दुनियावी भेड़चाल से बचने की कोशिश करनी चाहिए। यदि भारत अपनी बढ़ती आबादी को समुचित शिक्षा और तकनीकी प्रशिक्षण देकर शेष दुनिया की श्रम जरूरतों की पूर्ति करने की ठान ले और हिन्दुत्व की भविष्यगत रणनीति के लिए उनका सदुपयोग करे तो यह सदी भारत वर्ष की होगी, इसमें कोई दो राय नहीं है। बस, समयानुरूप नीतिगत पहल करने की जरूरत है।
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