अनुकरणीय व्यक्तित्व: स्व. श्रीभगवान पांडेय बनने की कोशिश कीजिए, समृद्ध बनेगा सकल समाज

जी हां, संस्कार बोलता है! पढ़िए, समझिए और गुनिये, ताकि बदले यह परिवेश

अनुकरणीय व्यक्तित्व: स्व. श्रीभगवान पांडेय बनने की कोशिश कीजिए, समृद्ध बनेगा सकल समाज
@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार

कहते हैं कि शरीर नश्वर है लेकिन आत्मा अजर-अमर। आत्मा ही परमात्मा है। तो फिर सवाल है कि परमात्मा क्या है, कैसा है, किसमें हैं! यदि इसे समझना है तो देवाधिदेव महादेव के समतापूर्ण आचरण पर गौर कीजिए। वाकई भोलेनाथ का गूढ़ मतलब होता है लोककल्याणकारी, जनकल्याणकारी, सर्वहितकारी। जब कोई व्यक्ति आत्मकल्याण, निजकल्याण के साथ साथ परहित की बात सोचने लगता है तो वह इस धरा पर शिवत्व का अंश समझा जाता है। इनका संसर्ग अच्छा महसूस किया जाता है। ऐसे  लोग विरले मिलते हैं, लेकिन मिलते जरूर हैं, यदि आप पहचानने में पारंगत हैं। इनकी पहचान के लिए आपका विवेक पारंगत होना चाहिए। मैंने भाव प्रणव आध्यात्मिक जगत में इसे महसूस किया और भौतिक जगत में स्पष्ट दीदार भी किया। देश-प्रदेश में जब भी ऐसी शख्सियत मुझसे टकराई तो श्रद्धावनत हुए बिना नहीं रहा। ऐसे लोगों के बारे में लिखना तब सार्थक होता है, जब उनकी इहलीला संपन्न हो जाये। ऐसे ही एक निश्छल व्यक्तित्व पर आज प्रकाश डाल रहे हैं।

तो चलिए बिहार प्रान्त के भागलपुर जनपद अंतर्गत कहलगांव अनुमंडल के पीरपैंती अंचल, ईशीपुर बाराहाट थानांतर्गत गोकुल मथुरा ग्राम निवासी वैकुंठ वासी श्रीभगवान पांडेय, पिता स्व. नन्दकिशोर पांडेय, माता स्व. अजोरा पांडेय की चर्चा करते हैं। वह कुल कितना धन्य होता है, जहां ऐसे विराट व्यक्तित्व की छाया मिलती है। वह बगिया, उसकी चहचहाहट और उस अनुपम पारिवारिक सौंदर्य सब कुछ बयां करता है, जिसे मैं यहां पर इसलिए अभिव्यक्त कर रहा हूँ, ताकि आप भी इससे सीख ग्रहण करें। जब व्यक्ति व्यक्ति सुंदर, सरल और सहज होगा तो आप समझ सकते हैं कि यह देश कितना सुंदर हो जाएगा।

सच कहूं तो श्रीभगवान पांडेय होने का अर्थ ही विशेष होता है। पेशे से वह भले ही किसान थे, लेकिन वस्त्र, विचार और व्यवहार किसी राजा सदृश था। मतलब सदैव देने की कोशिश करने वाला हाथ, बात में-विचार में-लोकाचार में। पठन-पाठन और लोक-परलोक चर्चा में मग्न होने वाला शख्सियत। खेती-बाड़ी, बाजार-व्यवहार, शहरी सरोकार का एक ऐसा संतुलन इनके जीवन में दिखाई दिया, जो अलौकिक है। इसका प्रतिबिम्ब उनके हर जड़ चेतन कार्यों में दृष्टिगोचर होता है। 

कहना न होगा कि जब खेती-बाड़ी देश-दुनिया में घाटे का सौदा समझी जाने लगी, तब उसी खेती बाड़ी में उन्होंने वह दूरदर्शिता दिखाई कि न केवल अपने बड़े पुत्र श्री अनिमेष पांडेय (अब अवकाश प्राप्त) को बिहार सरकार की शिक्षा सेवा का अंग बनवा दिया, बल्कि भागलपुर की हृदय स्थली में अपना मकान भी बना लिया। सन 1984 में पहली बार मैं इस मकान पर पहुंचा था, और वह दृश्य मुझे आज भी याद है। 

देखा जाए तो खेती करते, करवाते हुए अपने खेत को आम बागान में तब्दील करके उन्होंने जो दूरदर्शिता दिखाई, उसका पूरा आनंद अपने बुढ़ापे में लिया। जबतक सामर्थ्य रहा, पशुपालन भी किया। चना-चबेना व फल-सब्जी उनकी प्रिय खाद्य वस्तुएं थी। पाक कला में भी वो निष्णात थे। जब भी मेरी मुलाकात होती तो घण्टों बात होती। तीन पुत्र, एक पुत्री और नाती-पोतों का भरा-पूरा संसार छोड़कर गए हैं, जो दिल्ली से कोलकाता तक फैली हुई है। 

सच कहूं तो यह सब उपलब्धि उस किसान की है, जिस तबके के बारे में भारत क्या क्या नहीं सोचता व कहता है! इसलिए यदि कुछ सीखना है तो श्री भगवान पांडेय से वह संस्कार और जनसरोकार सीखिए, जिससे विकास की गंगा प्रस्फुटित होती है। तीन बजे भोर में उठ जाना उनकी आदत थी। पड़ोसियों के दु:ख-दर्द पूछना और निदान बताना उनकी आदतों में शुमार था। कई ऐसे गुणों की खान थे वे, जिसका अकाल अब परवर्ती पीढ़ी में पूरे देश में महसूस किया जाता है। उनके व्यक्तित्व में ऐसा चुम्बकीय आकर्षण था कि गलत व्यक्ति भी सही कार्य करने को सोचने लगता। 

मेरी राय में शख्सियत सिर्फ उन लोगों की नहीं होती जो कि विशेष पदधारी हैं, बल्कि उनलोगों की भी होती है, जहां तक मीडिया की दृष्टि चाह कर भी नहीं पहुंच पाती। हालांकि सोशल मीडिया के जमाने में अब हर घर में चिंतक, विचारक प्रकट हो रहे हैं, इसलिए उनलोगों की भी व्यक्तिगत गाथा सामने आनी चाहिए, जो इसके काबिल समझे जाते हैं। जहां तक इतिहासकार और पत्रकार की पहुंच इस पंचायती राज व्यवस्था में भी किसी कारण वश नहीं पहुंच पाई है।

मेरा मानना है कि यह सबकुछ पब्लिक डोमेन में इसलिए जाना चाहिए, ताकि समकालीन व परवर्ती पीढ़ी कुछ सीख सके। यदि आप इसे किसी की प्रशंसा समझ रहे हैं तो यह आपकी मूर्खता है। क्योंकि देश व समाज के प्रति एक सम्वेदनशील पत्रकार व स्तम्भकार का वह नजरिया है, जिसे उसने करीब से देखा है। सच को चाहे आप जिस नजरिए से भी देखें, लेकिन उसे दिखाते रहना हमारा पेशेवर धर्म भी है।

(अगली कड़ी में उनसे जुड़ी कुछ और स्मृतियों व सद्गुणों की चर्चा करूंगा, तब तक प्रतीक्षा कीजिए)

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