हिंदुत्व, विकास और सामाजिक संतुलन के सहारे हिंदी पट्टी में भाजपा फिर से जमायेगी अपने राजनैतिक अंगद पांव

हिंदुत्व, विकास और सामाजिक संतुलन के सहारे हिंदी पट्टी में भाजपा फिर से जमायेगी अपने राजनैतिक अंगद पांव 

# यूपी में लगातार दूसरी बार गठित हुई योगी सरकार के मंत्रियों के चयन से इस बात के मिल रहे हैं संकेत

@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार

हिंदुत्व और विकास के एजेंडे पर देश-प्रदेश की राजनीति  में सियासी फर्राटे भरने वाली भारतीय जनता पार्टी ने उत्तरप्रदेश में दूसरी बार लगातार बनी योगी सरकार के मंत्रियों के चयन में जो सामाजिक संतुलन स्थापित करने की सकारात्मक पहल की है, यदि वही उसकी सियासी रोड मैप बन जाये तो निकट भविष्य में हिंदी पट्टी की राजनीति काफी हद तक उसके पक्ष में बदल सकती है। 

हिंदी पट्टी से हमारा तातपर्य यूपी, बिहार, दिल्ली, हरियाणा, मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, छत्तीसगढ़ समेत उन राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों से है, जहाँ हिंदी भाषी मतदाता बहुतायत में हैं। ये लोग सियासत को जातीय और साम्प्रदायिक चश्मे से देखने को आदी समझे जाते हैं। यही वजह है कि यहां मंडल और कमंडल की राजनीति न केवल जोर पकड़ी, बल्कि राष्ट्रवाद और विकास के मुद्दे पर वह हिंदुत्व की विश्व कल्याणकारी भावना को निरंतर मजबूत करती जा रही है। 

कहना न होगा कि हिंदी पट्टी में बीजेपी की पकड़ जैसे-जैसे मजबूत होती जा रही है, वैसे-वैसे जातीय और साम्प्रदायिक तुष्टीकरण की राजनीति करने वाली पार्टियां न केवल हतोत्साहित नजर आ रही हैं, बल्कि कांग्रेस और बसपा जैसी मजबूत जनाधार वाली पार्टियों का राजनैतिक भविष्य अब अंधकार मय नजर आ रहा है। 

आलम यह है कि लगभग 30 वर्षों तक यहां की राजनीति को प्रभावित करने वाला एमवाई यानी मुस्लिम-यादव समीकरण अब मोदी-योगी समीकरण करार दिया जा रहा है। क्योंकि इन दोनों नेताओं के जनकल्याणकारी कार्यों और अपराध व भ्रष्टाचार के प्रति जीरो टॉलरेंस की नीति ने समाज के सभी वर्गों के दिलों में भाजपा के लिए एक खास जगह बना दी है, जिसे खत्म करने की सियासी कुव्वत अब किसी भी राजनीतिक दल में फिलवक्त नजर नहीं आ रही है।

देखा जाए तो हिंदी पट्टी में राजनैतिक रूप से वो उर्वर प्रदेश हैं जहां जातीय स्वाभिमान की मंडल राजनीति को हिंदुत्व (कमंडल) की राजनीति में तब्दील करके मंडल की सियासत यानी आरक्षण को आत्मसात करने और अपने समर्थकों के बीच करवाने में बीजेपी सफल हुई है। उसने मंडल की राजनीति के उभार के समानांतर पैदा हुई दलित राजनीति को भी इतने सलीके से साधने की कोशिश की है कि बिहार की लोजपा और उत्तरप्रदेश की बसपा का लगभग सफाया हो चुका है। 

बीजेपी ने हिंदुत्व, विकास और सामाजिक संतुलन की राजनैतिक त्रिवेणी में सियासी स्नान करते हुए हाल के वर्षों में जिस तरह से यूपी-बिहार-एमपी-उत्तराखंड-हरियाणा-हिमाचल प्रदेश में अपने अंगद पांव आसानी से जमाने की सफल कोशिश की है, उससे इस बात का भरोसा कायम हो रहा है कि निकट भविष्य में वह दिल्ली, राजस्थान, झारखंड और छतीसगढ़ में भी अपनी खोई हुई सत्ता को प्राप्त कर सकती है, क्योंकि इन राज्यों में पहले भी उसकी स्थिति काफी मजबूत रही है। 

राजनीतिक विश्लेषक डॉ रमेश ठाकुर बताते हैं कि योगी मंत्रिमंडल में यूपी की जातियों को प्रतिनिधित्व दिए जाने के मामलों में बरते गए दिलचस्प सामाजिक संतुलन से भाजपा ने समाज के सभी तबके में एक नया आत्मविश्वास जगाने की पूरी कोशिश की है, ताकि हिंदुत्व और विकास को गति के साथ साथ मजबूती भी मिले। वहीं, राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी राजग गठबंधन जिसे एनडीए भी कहा जाता है, के सहयोगियों को मंत्रिमंडल में सम्मानजनक जगह देकर हमेशा साथ लेकर चलने की स्पष्ट सोच प्रदर्शित की है। 

वहीं, सामाजिक चिंतक गौरव पांडेय बताते हैं कि पार्टी ने आरएसएस के प्रति समर्पित और पार्टी संगठन के कर्मठ नेताओं काे तरजीह देकर कार्यकर्ताओं को भी अपने साथ मजबूती से जोड़ने की कोशिश की है। वहीं, वरिष्ठ पत्रकार अशोक कौशिक बताते हैं कि भाजपा ने प्रशासनिक रूप से अनुभवी चेहरों यानी पूर्व ब्यूरोक्रैट्स को पहले पार्टी और अब मंत्रिमंडल में जगह देकर एक परिपक्व व दूरदर्शी सरकार देने का संदेश दिया है, ताकि प्रबुद्ध जनमानस पर भी उसका सकारात्मक असर पड़े। 

वहीं, जीएचबी फाउंडेशन के अध्यक्ष नरेंद्र भारद्वाज ने कहा कि यूपी में बीजेपी ने योगी मंत्रिमंडल में नए और युवा चेहरों को जिसे तरह से तरजीह देकर पार्टी में लोकतंत्र की भावना का प्रसार किया है, वह उसकी प्रतिस्पर्द्धी पार्टियों के लिए भी एक सबक है और देर सबेर सबको इसका अनुकरण करना पड़ेगा, यदि सियासत में प्रासंगिक बने रहना है तो।

बता दें कि योगी मंत्रिमंडल में एक योगी के 52 उपयोगी सहयोगी मंत्रीगण शामिल किए गए हैं, जिनमें 21 सवर्ण, 20 ओबीसी, 9 दलित-आदिवासी, 1 मुस्लिम और 1 सिख  राजनेता शामिल किए गए हैं। इस नवगठित मंत्रिमंडल से जिस सधे हुए सामाजिक समीकरण का बोध हो रहा है, उससे योगी के नेतृत्व में 15 साल वाले फ्यूचर कैबिनेट की झलक मिलती है, यानी 2027 में भी आएगी तो योगी सरकार ही, यदि इस बीच बीजेपी-संघ ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर कोई नई जिम्मेदारी नहीं दी तो। और यदि देगी भी तो बीजेपी सरकार को तीसरी पारी खेलने से रोकना लगभग नामुमकिन होगा,क्योंकि पार्टी की रणनीति ही वैसी है।

आपको पता होना चाहिए कि वर्ष 2025 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी आरएसएस, जो देश-दुनिया का सबसे बड़ा सामाजिक स्वयंसेवी संगठन है, अपने स्थापना का स्वर्ण जयंती समारोह साल 2025 में मनाएगा। इस लिहाज से वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव को बीजेपी के लिए तीसरी बार जीतना बहुत जरूरी है और यह चुनाव जीतकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश के सभी प्रधानमंत्रियों यानी नेहरू-इंदिरा-मनमोहन के सबसे लंबे समय तक पीएम बने रहने के रिकॉर्ड को भी तोड़ देंगे। 

लेकिन आपको यह भी ज्ञात होना चाहिए कि 2024 में होने वाले संसदीय आम चुनाव से पहले वर्ष 2022 में दो राज्यों यानी गुजरात और हिमाचल प्रदेश और उसके बाद वर्ष 2023 में नौ राज्यों यानी मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, कर्नाटक, तेलंगाना, त्रिपुरा, मेघालय, नागालैंड और मिजोरम में विधानसभा चुनाव होने हैं। यही वजह है कि बीजेपी अब 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले 11 राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव में अपनी फतह हासिल करने की गरज से पूरी मजबूती और सकारात्मक संदेश के साथ मैदान में उतरना चाहती है, ताकि उसके समक्ष किसी भी सूरत में दिल्ली, पश्चिम बंगाल, केरल, पंजाब, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र जैसी प्रतिकूल सियासी नौबत नहीं आये। यही वजह है कि बीजेपी आलाकमान ने भी अभी से ही अपनी सरजमीनी तैयारी शुरू कर दी है। 

कहा भी जाता है कि अग्रसोची सदा सुखी। यानी कि भूतकाल से सबक लेकर वर्तमान को सुधारते हुए भविष्य के लिहाज से जो राजनैतिक दल अहम निर्णय लेते हैं, वही लोकतांत्रिक रूप से सदैव प्रासंगिक बने रहते हैं। यही वजह से कि देश के सबसे बड़े प्रान्त उत्तरप्रदेश में अपनी यादगार राजनीतिक जीत हासिल करने के बाद योगी सरकार के शपथ ग्रहण समारोह में बीजेपी ने तमाम चुनावी राज्यों के सीएम व अन्य महत्वपूर्ण नेताओं को शिरकत करवाकर अपने मजबूत मंसूबों का परिचय दे दिया है। वहीं, अगले
अप्रैल के महीने में बीजेपी में बड़े संगठनात्मक बदलाव भी हो सकते हैं, क्योंकि पार्टी का स्थापना दिवस भी 6 अप्रैल को ही मनाया जाता है।

गौरतलब है कि इस साल के अंत में गुजरात और हिमाचल प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने हैं। ऐसे में यह भी कोई संयोग नहीं बल्कि एक प्रयोग है कि पीएम मोदी 10 मार्च को 5 राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणाम आने और 4 राज्यों यानी यूपी, उत्तराखंड, मणिपुर और गोवा में अपनी सरकार बचाने में सफल रहने यानी कि अच्छी राजनीतिक सफलता पाने के अगले ही दिन गुजरात दौरे पर थे। जहां उन्होंने चुनावी मोड में आते हुए अहमदाबाद में अप्रत्याशित कदम उठाते हुए एक बड़ा रोड शो कर डाला। क्योंकि फिलवक्त गुजरात और हिमाचल प्रदेश में बीजेपी या एनडीए की सरकारें हैं। 

इसलिए बीजेपी आलाकमान अब यह मन बना चुका है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में उतरने से पहले 11 राज्यों के विधानसभा चुनाव में फतह हासिल करने के लिए मजबूती और सकारात्मक संदेश के साथ उतरा जाए। यही वजह है कि योगी सरकार के शपथ ग्रहण समारोह में बीजेपी या एनडीए शासित राज्यों के सीएम-डिप्टी सीएम भी बतौर अतिथि शामिल हुए। यानी कि इसके जरिए ही आसन्न विधानसभा चुनावों के प्रचार मोड में भी बीजेपी आती हुई दिखाई दे रही है।

गौरतलब है कि योगी आदित्यनाथ के दूसरे शपथ ग्रहण समारोह में गुजरात के सीएम भूपेंद्र पटेल, हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर, हरियाणा के सीएम मनोहर लाल खट्‌टर, मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, कर्नाटक के सीएम बासवराज बोम्मई, असम के सीएम हिमंता विस्वा सरमा, अरुणाचल प्रदेश के सीएम पेमा खांडू, त्रिपुरा के सीएम बिप्लब कुमार देब, उत्तराखंड के सीएम पुष्कर सिंह धामी, मणिपुर के सीएम एन. बीरेन सिंह और गोवा के सीएम प्रमोद सावंत, बिहार के डिप्टी सीएम तारकिशोर प्रसाद और डिप्टी सीएम रेणु देवी और  झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास आदि शामिल हुए।

योगी आदित्यनाथ ने लखनऊ के अटल बिहारी वाजपेयी स्टेडियम में आयोजित एक मेगा कार्यक्रम में दूसरी बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। इस मौके पर भाजपा और एनडीए नेताओं का उत्साह देखते ही बन रहा था। क्योंकि गत 37 वर्षों में ऐसा पहली बार हुआ है कि जब किसी मुख्यमंत्री ने लगातार दूसरी बार यूपी की सियासी बागडोर को अपने हाथों में लिया है। ऐसा इसलिए कि जातीय व साम्प्रदायिक रूप से सजग और महत्वाकांक्षी उत्तर प्रदेश की राजनीति में दोबारा सत्ता हासिल करना कभी भी इतना आसान नहीं रहा है। लेकिन प्रदेश में पूर्ण बहुमत वाली सरकार बनाने का कीर्तिमान भी सीएम योगी ने जनता के अटूट विश्वास और प्रेम से ही स्थापित किया है।

# जातीय, क्षेत्रीय और शैक्षणिक संतुलन का भी रखा गया है पूरा ध्यान

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सम्मिलित रणनीति से हासिल हुई इस सियासी सफलता के बाद सीएम योगी की टीम में दो उपमुख्यमंत्रियों यानी केशव प्रसाद मौर्य और ब्रजेश पाठक के अलावा अन्य 16 कैबिनेट मंत्रियों, 14 स्वतंत्र प्रभार वाले राज्यमंत्रियों और 20  राज्यमंत्रियों यानी कि कुल 52 नेताओं ने भी मंत्री के रूप में शपथ ली, जिसमें एक मुस्लिम चेहरे ने भी मंत्रिपरिषद में जगह बनाई है। 

खास बात यह कि नई कैबिनेट में तकरीबन 24 पूर्व मंत्रियों को हटा दिया गया है, जिनमें से 11 पूर्व मंत्री विधानसभा चुनाव हार गए थे। डिप्टी सीएम दिनेश शर्मा, ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा, खादी ग्रामोद्योग मंत्री सिद्धार्थ नाथ सिंह व उद्योग मंत्री सतीश महाना व मंत्री महेंद्र सिंह जैसे बड़े नेताओं को टीम योगी में जगह न दिए जाने की वजह यह है कि पार्टी इनका संगठन में उपयोग करेगी। वहीं, 49 वर्षीय सीएम योगी आदित्यनाथ के नए मंत्रिमंडल में मोदी-शाह की स्पष्ट छाप भी दिखी। इसलिए यहां यह कहना गलत नहीं होगा कि योगी कैबिनेट में पीएम मोदी के गुजरात मॉडल के साथ साथ सीएम योगी की यूपी मॉडल की स्पष्ट झलक दिख रही है। 

बताया जाता है कि पीएम नरेंद्र मोदी ने इस बार के मंत्रिमंडल को 2024 लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए बनाने के सुझाव दिए और यह कहा कि ये यूपी की फ्यूचर कैबिनेट हो, जो अगले 15 साल तक यहां निर्विघ्नता पूर्वक काम कर सके। शायद इसलिए उन्होंने यूपी में जातीय समीकरण के संतुलन पर जोर देते हुए पूर्व सिविल सेवकों, युवा चेहरों और एक संतुलित जाति मिश्रण को मजबूत करने वाले नेताओं को योगी मंत्रिमंडल में शामिल करवाया है। 

नवगठित योगी कैबिनट में सीएम-डिप्टी सीएम सहित 22 सवर्ण जातियों के नेताओं को जगह मिली है तो उपमुख्यमंत्री के पी मौर्य समेत 21 ओबीसी जातियों के नेताओं को भी मंत्री बनाया गया है। इसके अलावा, दलित-आदिवासी समाज के 9 मंत्री बनाए गए हैं। वहीं, एक मुस्लिम, एक सिख और एक पंजाबी समाज के राजनेता को भी जगह मिली है। 

बारीकी पूर्वक गौर फरमाया जाए तो योगी सरकार के 22 सवर्ण मंत्रियों, जिनमें मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री और अन्य मंत्रीगण शामिल हैं, इनमें 8 ब्राह्मण, 7 ठाकुर, 4 वैश्य, 2 भूमिहार और 1 कायस्थ जाति का प्रतिनिधित्व करते हैं। वहीं, उपमुख्यमंत्री के पी मौर्य समेत 21 ओबीसी मंत्रियों में 5 जाट, 2 कुर्मी, 2 गुर्जर, 2 मौर्य, 2 निषाद, 2 यादव, 1 पंजाबी, 1 प्रजापति, 1 चौहान, 1 गड़रिया, 1 राजभर जाति का प्रतिनिधित्व करते हैं। वहीं, 9 दलितों में 3 जाटव, 1 बाल्मीकि, 1 खटीक, 1 सैनी, 1 मौर्य, 1 कोरी और 1 अनुसूचित जनजाति को प्रतिनिधित्व मिला है। वहीं अल्पसंख्यकों में 1 मुस्लिम और 1 सिख को भी प्रतिनिधित्व मिला है।

गौरतलब है कि यूपी में बीजेपी के कुल 46 ब्राह्मण विधायक है, जबकि मंत्रिपरिषद में इस समाज को उपमुख्यमंत्री सहित 8 मंत्री पद मिला है। इसी तरह बीजेपी के 43 विधायक क्षत्रिय यानी राजपूत हैं, जबकि मंत्रिपरिषद में इस समाज को मुख्यमंत्री सहित 7 मंत्री पद मिला है। बीजेपी के पास भूमिहार समाज से सिर्फ 4 विधायक हैं,  जबकि मंत्रिपरिषद में इस समाज को 2 मंत्रीपद मिला है। वहीं, कायस्थ जाति से भी बीजेपी के पास तीन विधायक हैं, जबकि मंत्रिपरिषद में इस समाज को  मात्र एक मंत्री पद मिला है। वहीं, जाट समाज से बीजेपी गठबंधन के सिर्फ 8 विधायक हैं, लेकिन इस समाज को 5 मंत्री पद मिला है। अनुसूचित जाति और जनजाति से बीजेपी की झोली में 65 विधायक हैं। इस समाज से योगी मंत्रिमंडल में 8 मंत्री बनाए गए हैं। वहीं, एससी और एसटी समाज से बीजेपी के पास 65 विधायक हैं, जबकि मंत्रिपरिषद में इस समाज को 9 मंत्रीपद मिला है, जिसमें 8 दलित और 1 आदिवासी नेता को मंत्रीपद मिला है। 
देखा जाए तो मंत्रियों का चयन करते समय परंपरागत, क्षेत्रीय और जातीय समीकरणों का भी अच्छा खासा खयाल रखा गया है। इस बार किसान आंदोलन के चलते वेस्ट यूपी भाजपा के लिए सबसे मुश्किल माना जा रहा था। लेकिन, वहां से आये नतीजे शानदार रहे। इसलिए, वेस्ट यूपी से सबसे ज्यादा 16 मंत्री बनाए गए हैं। वहीं, पूर्वांचल से योगी समेत 14 चेहरों को जगह मिली है। वहीं, मध्य यूपी से 5, रुहेलखंड से 6, अवध से 8 और बुंदेलखंड से 3 मंत्री बनाए गए हैं।

योगी आदित्‍यनाथ के मंत्रिमंडल में भाजपा ने जातीय और क्षेत्रीय समीकरण के साथ साथ व्यक्तित्व के पैमाने पर भी अपने लक्ष्य साधे हैं। योगी कैबिनेट में सरकार की 'परफॉर्मेंस' सही रखने के लिए पढ़े-लिखे मंत्रियों के साथ साथ कार्यकुशलता रखने वाले प्रफेशनल चेहरों पर भी भरोसा किया गया है। तभी तो मंत्रिमंडल के 52 चेहरों में तीन पीएचडी धारक, 22 ग्रैजुएट और 21 पोस्टग्रैजुएट हैं। रिटायर्ड आईपीएस असीम अरुण, रिटायर्ड आईएएस एके शर्मा को मंत्रियों में जगह दी गई है। 

बता दें कि असीम आईपीएस रहने के साथ ब्रिटिश कोलंबिया यूनिवर्सिटी से पॉलिसी में मास्टर्स हैं। डॉ. एके शर्मा गुजरात कैडर के 1988 बैच के आईएएस रहे और पीएचडी भी हैं। गुजरात में भी वह मोदी के साथ सीएम दफ्तर में रहे, फिर उन्हीं के साथ दिल्ली के पीएम दफ्तर में। उसके बाद उन्हें पीएम के निर्देश पर यूपी भेजा गया। समझा जाता है कि इन अफसर रहे राजनेताओं का उपयोग अब सरकार चलाने में बेहतर ढंग से किया जाएगा। वहीं संगठन से आए जेपीएस राठौर आईआईटी, बीएचयू से एमटेक हैं। चुनाव प्रबंधन में उन्हें महारथ हासिल है और पर्दे के पीछे से वह संगठन के लिए योजनाएं तैयार करते रहे हैं।

वहीं, अपना दल से आए आशीष पटेल भी बीटेक डिग्री धारक हैं तो मंत्री अजीत पाल ने भी यूक्रेन के खारकीव से एमटेक किया है। समझा जाता है कि इन टेक्नोक्रेट्स का इस्तेमाल योजनाओं को लागू करने और तकनीक के उपयोग में किया जा सकेगा। वहीं, राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) दया शंकर दयालु वाराणसी के डीएवी कॉलेज में प्रिंसिपल हैं, तो बेबीरानी मौर्य उत्तराखंड की गवर्नर रही हैं। बताया जाता है कि इन सबका चयन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भविष्य की रणनीति के हिसाब से किया गया है। ऐसे में  2024 के लोकसभा चुनाव के हिसाब से 'परफॉर्मेस' देने में इन सबकी भूमिका काफी महत्वपूर्ण होगी।

यह भी कहा जा रहा है कि योगी मंत्रिमंडल के लिए मंत्री चुनने में संगठन से बेहतर तालमेल रखने वाले चेहरों को वरीयता दी गई है। भारतीय जनता पार्टी ने इस बार मंत्रियों के चयन में अतिरिक्त सतर्कता बरती है, ताकि अपनी मुख्य प्रतिद्वंद्वी सपा की जहरीली सियासत को अप्रासंगिक साबित कर सके। इस लिहाज से नई टीम में उसने पुराने चेहरों के साथ साथ नए चेहरों, उनके कार्य अनुभव, जातिगत संतुलन और नई ऊर्जा का भी विशेष ख्याल रखा है। मंत्रिमंडल में पुराने दिग्गजों के साथ साथ नए चेहरों को भी मौका मिला है। वहीं, पूर्व ब्यूरोक्रैट को तो जगह मिली ही है, महिलाओं को भी बेहतर मौका मिला है। 

इस तरह से देखा जाए तो जातीय संतुलन स्थापित करते हुए जनाधार रखने वाले अनुभवी नेताओं, कार्यकुशलता रखने वाले प्रशासकीय नेताओं और युवा नेताओं के बीच अद्भुत तालमेल बनाने की एक सफल कोशिश योगी सरकार द्वारा की गई है। वहीं, प्रशासनिक स्तर पर लोहा मनवा चुके नेताओं को जोड़ते हुए फायरब्रांड नेताओं का भी तड़का लगाने की पुरजोर कोशिश की गई है।

यदि योगी मंत्रिमंडल के नए मंत्रियों की बात करें तो सबसे बड़ा नाम बेबी रानी मौर्य का है। उनके अलावा दो पूर्व नौकरशाह भी योगी की टीम का हिस्सा बनाए गए हैं। इनमें गुजरात कैडर के आईएएस रहे एके शर्मा (एमएलसी) और यूपी कैडर के आईपीएस अधिकारी रहे और वीआरएस लेकर कन्नौज से चुनाव जीते असीम अरुण का नाम शामिल है। वहीं, इनके अलावा नए मंत्रियों में बीजेपी गठबंधन के सदस्य निषाद पार्टी के प्रमुख संजय निषाद (एमएलसी) और अपना दल सोनेलाल के आशीष पटेल (एमएलसी) को शपथ दिलाई गई। इनके अलावा बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्रदेव सिंह (एमएलसी), सरिता भदौरिया, प्रमिला पांडेय, विजय लक्ष्मी गौतम, अनूप वाल्मीकि, ब्रजेश सिंह, राजेश्वर सिंह, जेपीएस राठौर और शामिल हैं। वहीं, योगी सरकार में पुराने नेताओं को भी अच्छी खासी तवज्जो दी गई है। इनमें करीब तीन दशकों से अजेय रहे सुरेश खन्ना, सूर्य प्रताप शाही, जयवीर सिंह, बलदेव औलख, भूपेंद्र चौधरी, गिरीश यादव, सतीश शर्मा, चौधरी लक्ष्मी नारायण जैसे वरिष्ठ नेताओं के नाम शामिल हैं।

# योगी मंत्रिमंडल के विभिन्न नेताओं की है अपनी अपनी अलग पहचान, जिसने फूंक दिया मंत्रिमंडल में जान

योगी मंत्रिमंडल में डिप्टी सीएम दिनेश शर्मा की जगह पर जनप्रिय ब्राह्मण चेहरा ब्रजेश पाठक को नया उपमुख्यमंत्री बनाया गया है। वहीं, पिछली बार इकलौते मुस्लिम मंत्री रहे मोहसिन रजा की जगह बलिया के तेजतर्रार युवा नेता दानिश आजाद अंसारी राज्यमंत्री बनाए गए हैं। वहीं, कायस्थ नेता सिद्धार्थनाथ सिंह की जगह अरुण कुमार सक्सेना को कायस्थ चेहरे के रूप में एंट्री दी गई है। 

कहना न होगा कि सुश्री मायावती के नेतृत्व वाली बहुजन समाज पार्टी (बसपा) से मजबूत दलित मतदाता जाटव के अलगाव और भाजपा को समर्थन को देखते हुए, इसी बिरादरी की बेबी रानी मौर्य को कैबिनेट मंत्री के रूप में शामिल करना केंद्रीय नेतृत्व का एक स्पष्ट निर्णय था। क्योंकि इस बार भाजपा गठबंधन में 19 जाटव विधायक जीते हैं। बता दें कि चुनाव से पहले पीएम मोदी के सुझाव पर ही श्रीमती मौर्य को उत्तर प्रदेश की दलित राजधानी आगरा से विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए उत्तराखंड के राज्यपाल पद से इस्तीफा देने के लिए कहा गया था।

वहीं, सिराथू से विधानसभा चुनाव में अप्रत्याशित हार के बावजूद, भाजपा आलाकमान ने केशव प्रसाद मौर्य को डिप्टी सीएम के रूप में ही इसलिए समायोजित किया है, क्योंकि वह पार्टी का एक मजबूत ओबीसी चेहरा हैं। पार्टी का यह कदम भाजपा के तत्कालीन अध्यक्ष अमित शाह के द्वारा अपने 2014-20 के कार्यकाल के दौरान बनाए गए नए सामाजिक गठबंधन के संतुलन को कायम रखने का एक सोचा समझा प्रयास है। क्योंकि पीएम मोदी चुनावी हार को नैतिक हार से ज्यादा अहम मानते हैं। 

समझा जाता है कि अपनी इसी रणनीति के चलते उन्होंने 2014 में चंडीगढ़ से संसदीय चुनाव हार जाने के बावजूद अरुण जेटली (अब स्वर्गीय) को केंद्रीय वित्तमंत्री के रूप में तवज्जो दी थी। इसके अलावा, अभी हाल ही में उत्तराखंड में मुख्यमंत्री के रूप में चुनावी पराजय के बावजूद पुष्कर सिंह धामी को भी उत्तराखंड में फिर से मुख्यमंत्री बनाया गया। इसी लिहाज से केशव प्रसाद मौर्य को चुनावी पराजय के बावजूद उत्तर प्रदेश का उपमुख्यमंत्री बनाया गया, क्योंकि यूपी की राजनीति में मौर्यों की काफी (लगभग 5-6 फीसदी) आबादी है और इस चुनाव में भी इस समाज के 12 विधायक बीजेपी गठबंधन से जीते हैं। 

बताया जाता है कि मौर्य-सैनी बहुल पूर्वी यूपी में जहां अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी (सपा) ने बेहतर प्रदर्शन किया है, वहां बीजेपी का नया दांव डिप्टी सीएम के पी मौर्य को अपनी बिरादरी की राजनीति में पुनः अपनी पैठ बनाने का मौका देगा, जिसका लाभ 2024 के लोक सभा चुनावों में मिल सकता है। क्योंकि जिस तरह से सपा नेता अखिलेश यादव ने राज्य में अधिक विपक्षी भूमिका पर ध्यान केंद्रित करने के लिए अपनी लोकसभा सीट तक छोड़ दी है, उसी रणनीति के मुकाबले मजबूती से पलटवार करवाने के लिए भाजपा आलाकमान ने अपने ही स्थापित ओबीसी चेहरों को और भी सक्रिय व मुख्य भूमिका में रखना चाहती है, ताकि बीजेपी कहीं से भी कमजोर नहीं दिखे। 

वहीं, उत्तर प्रदेश में भाजपा की जीत के पीछे महिला मतदाताओं की एकजुटता भी एक महत्वपूर्ण कारक थीं। इसलिए पार्टी ने कैबिनेट में पांच महिला मंत्रियों यथा- बेबी रानी मौर्य, गुलाब देवी, विजय लक्ष्मी गौतम, प्रतिभा शुक्ला और रजनी तिवारी को शामिल किया है। वहीं, अल्पसंख्यक वर्ग को लुभाने के लिए दानिश आजाद अंसारी राज्य में अकेले मुस्लिम मंत्री के रूप में योगी आदित्यनाथ सरकार का हिस्सा बना लिए गए हैं। 

आपको याद होगा कि केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने गत दिनों विधायकों से कहा था कि यूपी के विकास की नींव डालने का काम पिछले पांच वर्ष में हुआ है, उस पर भव्य इमारत बनाने का काम अगले पांच साल में करना होगा। यही वजह है कि मंत्रिमंडल के गठन में सीएम योगी आदित्यनाथ ने ऐसे ऐसे निष्णात 'कारीगरों' का चयन मंत्री के तौर पर किया है, जो मोदी-शाह की नीति-रणनीति पर 24 कैरेट गोल्ड की तरह खरे उतर सकें। ऐसा करते समय जातीय संतुलन और असरकारक व्यक्तित्व का पूरा ख्याल रखा गया है। क्योंकि चुनावी राजनीति में जाति की काफी  अहमियत है। अक्सर यह सवाल सत्ता के गलियारों से लेकर हरेक चौक चौराहे पर मौजूद रहता है कि कौन सी जाति किस पार्टी का समर्थन कर रही है और उस जाति के कितने विधायक जीते हैं। इसी तरह से कैबिनेट गठन के बाद यह चर्चा गर्म रहती है कि किस जाति के कितने विधायक मंत्री बने हैं। लेकिन योगी सरकार ने अपने सटीक चयन से इन सभी सवालों का उत्तर एक बार में ही दे दिया है जो सबके मनमाफिक है। इसलिए अब बहुत सारे आलोचक भी निरुत्तर नजर आ रहे हैं।

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