साजिशकर्ता मीडिया इकाइयों पर अविलम्ब कार्रवाई कीजिए

साजिशकर्ता मीडिया इकाइयों पर अविलम्ब कार्रवाई कीजिए

@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार

दुनिया के कतिपय देशों के मुकाबले भारत, जिसे इंडिया या हिन्दुस्तान भी कहा जाता है, में प्रेस अपेक्षाकृत ज्यादा स्वतंत्र है। इसे लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहा जाता है। कहने का तातपर्य यह कि लोकतंत्र के तीन स्तम्भों यथा-विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के समान ही खबरपालिका, प्रेस-मीडिया को प्रमुखता देते हुए एक मजबूत चतुर्थ स्तम्भ की संज्ञा दी गई है। क्योंकि लोकतंत्र में जनता अपने शासकों के बारे में क्या राय रखती है, क्या सोचती है, क्या कहती है, ये बातें लोगों के बीच मीडिया रपटों से ही स्पष्ट होती हैं। 

वैसे तो राजनीतिक कार्यकर्ता, प्रशासनिक कर्मचारी और अधिवक्तागण भी अपने-अपने संस्थानों में स्थापित तौर तरीकों के माध्यम से जनता की बात रखते आए हैं जिनपर कार्रवाई भी हुई है। हालांकि सत्ता यानी शासन-प्रशासन का स्थायी अंग होने के कारण आमलोग उनकी बातों पर हमेशा पूर्ण विश्वास नहीं करते हैं। लेकिन उन्हीं की बात जब उनकी भाषा में ही आकाशवाणी, दूरदर्शन, समाचार पत्र और पत्रिकाओं, निजी टीवी व रेडियो चैनल्स, वेबसाइट, यूट्यूब चैनल्स, जिनमें सरकारी और निजी क्षेत्र, दोनों की कमोबेश भागीदारी है, में प्रकाशित या प्रसारित होती हैं तो लोग उनपर आंख मूंद कर भरोसा करते हैं। यह बात अलग है कि कभी कभार जब इनमें भी पक्षपात की बू आती है तो जनता इन्हें नजरअंदाज करना शुरू कर देती है, जिससे इनकी पाठक संख्या या दर्शक संख्या धड़ाम से गिर जाती है।

वहीं, कुछेक मीडिया प्रतिष्ठानों द्वारा जब भी उन्हें प्राप्त स्वनियमन की स्वतंत्रता का अतिक्रमण करके सुनियोजित तरीकों से दुरुपयोग करने की कोशिश की जाती है तो सरकार भी राष्ट्रहित में, प्रान्त हित में और सुचारू सिस्टम के हित में उनकी नकेल कसने में गुरेज नहीं करती है। ऐसे समय में भले ही कुछ मीडिया संगठन या पत्रकारगण या मीडिया व्यवसायी सरकार यानी नेताओं-अधिकारियों पर मिलीभगत करके पक्षपात करने का आरोप लगाएं और सरकार भी अपनी सफाई दर सफाई पेश करे। लेकिन यह बात सभी जानते हैं कि बिना आग के कहीं धुंआ नहीं उठता। कहने का तातपर्य यह कि कोई भी सरकार या उसका मातहत प्रशासन अपनी खुफिया या शिकायती जानकारियों के आधार पर ही किसी मीडिया इकाई या पत्रकार विशेष की नकेल कसती है। यह बात दीगर है कि कभी कभी व्यवस्था के खिलाफ जरूरत से ज्यादा मुखर हो चुके समाचार प्रतिष्ठानों या उससे जुड़े पत्रकारों या अन्य व्यक्तियों के खिलाफ फेब्रिकेटेड डॉक्युमेंट्स भी तैयार करवा लिए जाते हैं, जो निंदनीय समझा जाता है।

ताजा मामला यह है कि केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर ने एक बार फिर से दो टूक लहजे में चेताया है कि देश के खिलाफ साजिश रचने वाले किसी भी यूट्यूब चैनल और वेबसाइट को ब्लॉक कर दिया जाएगा। जिससे इनके संचालकों में खलबली मचना स्वाभाविक है। पता चला है कि गत वर्ष दिसम्बर में भारत विरोधी दुष्प्रचार और फर्जी खबरें फैलाने के लिए 20 यूट्यूब चैनल और दो वेबसाइट को केंद्रीय प्रतिष्ठानों और उनकी सहयोगी इकाइयों द्वारा अवरुद्ध (ब्लॉक) कर दिया गया। ऐसा किए जाने के कुछ दिनों बाद जब सूचना और प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर से पत्रकारों ने सवाल-जवाब किया तो उन्होंने सख्त लहजे में चेतावनी देते हुए कहा कि सरकार देश के खिलाफ साजिश रचने वालों के विरूद्ध इस तरह की कार्रवाई जारी रखेगी। उन्होंने स्पष्ट कहा कि मैंने उनके खिलाफ कार्रवाई का आदेश दिया था। मुझे खुशी है कि दुनियाभर के कई बड़े देशों ने इसका संज्ञान लिया। यूट्यूब भी आगे आया और उन्हें ब्लॉक करने के लिए कार्रवाई की।

गौरतलब है कि सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने पिछले साल दिसंबर में खुफिया एजेंसियों के साथ एक समन्वित प्रयास में 20 यूट्यूब चैनल और दो वेबसाइट को अवरुद्ध (ब्लॉक) करने का आदेश दिया था, क्योंकि वे भारत विरोधी दुष्प्रचार और फर्जी खबरें फैला रहे थे। इसी से जुड़े एक सवाल के जवाब में मंत्री श्री ठाकुर ने कहा कि....और भविष्य में भी, भारत के खिलाफ साजिश रचने, झूठ फैलाने और समाज को विभाजित करने वाले ऐसे किसी भी अकाउंट को ब्लॉक करने के लिए कार्रवाई की जाएगी। क्योंकि मंत्रालय ने दिसंबर में ही जारी एक बयान में कहा था कि ये 20 यूट्यूब चैनल और वेबसाइट पाकिस्तान से संचालित एक समन्वित दुष्प्रचार नेटवर्क से संबंधित हैं, जो भारत से संबंधित विभिन्न संवेदनशील विषयों के बारे में फर्जी खबरें फैला रहे थे। इस बयान में साफ कहा गया था कि इन प्रतिबंधित चैनल का इस्तेमाल कश्मीर, भारतीय सेना, भारत में अल्पसंख्यक समुदायों, राम मंदिर, जनरल बिपिन रावत आदि जैसे विषयों पर समन्वित तरीके से विभाजनकारी सामग्री पोस्ट करने के लिए किया जा रहा था। 

सच कहा जाए तो सरकार ने सही समय पर सही निर्णय लिए हैं, जिससे देश को कई प्रकार की अतिरिक्त क्षति अब नहीं हो पाएगी। इसलिए यह उसकी सराहनीय पहल है और प्रशंसनीय कदम भी। ऐसा कोई पहली बार नहीं हुआ है, बल्कि पिछले 7 दशकों में इसके कई उदाहरण समय समय पर सामने आते रहे हैं। इससे पहले भी ऐसे चिन्हित संस्थानों के कभी विज्ञापन बन्द कर दिए गए, तो कभी उनकी मान्यता/अधिमान्यता ही रद्द कर दी गई। चूंकि जिनके खिलाफ ऐसी कार्रवाई की गई, उनमें से कई न्यायालय भी नहीं गए। क्योंकि उन्होंने भी भारी मन से यह मान लिया कि उनसे गलती हुई है और प्रायश्चित के अलावा अब और कोई रास्ता उनके लिए नहीं बचा है। वहीं, कुछ लोग उत्साहवश न्यायालय तो पहुंचे, लेकिन पर्याप्त सबूतों के अभाव में सरकारी कार्रवाई में कोई कमियां नहीं गिना पाए, जबकि सरकारी पक्ष ने उनका सारा कच्चा चिट्ठा खोल दिया, जिससे अपने पक्ष में वो फैसला भी नहीं करवा सके और मन मसोस कर रह गए।

लिहाजा मेरी स्पष्ट राय है कि यदि आपको ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाना है तो कोई और काम करें, पर मीडिया को बख्श दें। यदि आपको जाति, धर्म, क्षेत्र भाषा या देश के आधार पर विभाजनकारी एजेंडा चलाना है या विषाक्त बयानबाजी करनी-करवानी हो तो भी मीडिया को बख्श दें और वैकल्पिक रास्तों का उपयोग करें। क्योंकि मीडिया के लिए कुछ स्थाई नैतिक व विधिक मानदंड तय किये गए हैं, जो भले ही स्वनियमन पर आधारित हैं, लेकिन जब आप उनका उल्लंघन करेंगे तो अपनी पात्रता और मान्यता दोनों गंवाएंगे। कहने का आशय यह कि जब आप उपरोक्त गलत प्रवृति से ग्रस्त हो जाएंगे तो स्वनियमन की अवहेलना करने के चलते सरकार आपकी 'गर्दन दबाने' से कदापि गुरेज नहीं करेगी, क्योंकि वह ऐसा देश-प्रान्त के व्यापक हित में कर रही है। 

हमें यहां पर यह कहने में कोई हिचक नहीं है कि हमारे राजनीतिक और प्रशासनिक निर्णयों में कई बार उपरोक्त बू नजर आती हैं या चर्चाएं आम होती हैं। लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि न्याय और विवेक की कसौटी पर जनहित साधने के लिए जिम्मेदार न्यायपालिका और खबरपालिका भी वही गलतियां करें, जो बहुमत के चक्कर में राजनेता और उनके इशारे पर नौकरशाह आये दिन कर बैठते हैं।

इसलिए मीडिया के पेशे में सम्पादकीय संस्थाओं का मजबूत रहना आवश्यक है, अन्यथा अनुभवहीन मीडिया प्रबंधक भी देर सबेर विफल ही हो जाएंगे। सरकार को भी चाहिए कि वह कार्यपालिका और न्यायपालिका की तरह  विधायिका और खबरपालिका के विभिन्न जिम्मेदारी भरे पदों के लिए शैक्षणिक योग्यता और अनुभव तय करे, जिसका सर्वथा अभाव देखा जा रहा है। इनके प्रबन्धन और संचालन में भी पारदर्शिता लाए। इससे इनमें भी भूल वश या कमियों की अनदेखी करके आगे बढ़ने की होड़ नहीं मचेगी। 

इनकी मोनिटरिंग के लिए गांव से लेकर महानगरों तक  मीडिया कर्मियों का एक खुला पोर्टल बने, जिसमें उनसे सम्बन्धित समस्त जानकारियां न केवल फीड हों, बल्कि उसे देखकर कोई भी उसकी कमियों को गिना सके। क्योंकि धनपशुओं, बाहुबलियों, अपराधी प्रवृत्ति के लोगों और अल्प शिक्षित लोगों में भी पत्रकार कहलाने या मीडिया प्रोफेशनल कहलाने और स्थानीय प्रशासन पर रुतबा झाड़ने का प्रचलन बढ़ा है, क्योंकि ये सहजता पूर्वक प्रेस कार्ड हासिल कर ले रहे हैं। 

इसलिए मीडिया में ऐसे लोगों के प्रवेश पर पाबंदी लगनी चाहिए। क्योंकि जब तक ऐसा नहीं किया जाएगा, पेशेवर सुचिता बहाल करना मुश्किल तो नहीं, पर कठिन अवश्य है। इसलिए इस अहम मुद्दे पर सोचिए, विचारिए और राष्ट्रहित में बहस कीजिए, जिसके लिए मैं इन बातों को यहां छेड़ रहा हूं। आप सभी सजग और सावधान होइए, क्योंकि यह देश हम सबका है, यह व्यवस्था हम सबके लिए है, इसे सुचारू रूप से चलने देने में ही हम सबकी भलाई है, सामूहिक हित निहित है!

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