सफाई की संस्कृति को अपनाइए, बेतुके बहाने मत बनाइए
सफाई की संस्कृति को अपनाइए, बहाने मत बनाइए
@ राजपथ/अशोक कौशिक, संपादक
लोक आस्था का महापर्व चार दिवसीय छठ पूजा पूरे देश में धूमधाम से मनाया जा रहा है। बिहार में इसे बड़का पर्व कहा जाता है। देश-विदेश में फैले बिहार मूल के लोग इसे बड़े ही श्रद्धा भाव से मनाते हैं। इस पर्व में व्याप्त अद्भुत कष्ट निवारण क्षमता के कारण बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के निवासियों की देखा देखी इसके स्वरूप का लगातार विस्तार हो रहा है।
शास्त्रों में सूर्य पूजा का बहुत महत्व है। नक्षत्र मंडल में सूर्य जब अपनी नीच राशि तुला का होता है तो उसके नकारात्मक प्रभाव से बचने के लिए सूर्य षष्ठी ब्रत का विधान सनातन संस्कृति में है। कार्तिक शुक्ल चतुर्थी से लेकर शुक्ल सप्तमी तक यह पूजा पूरी नियम निष्ठा से प्रतिपादित की जाती है। यह पर्व राजकृपा प्राप्त करने और वर्ष पर्यंत आरोग्यता लाभ के लिए मनाया जाता है। इसमें सामाजिक स्वच्छता का संदेश निहित है। यह पर्व समाज से ऊंच-नीच के भेदभाव को मिटाता है।
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी से लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सामाजिक और व्यक्तिगत स्वच्छता की जो वकालत की है, उसके बीज इस महापर्व में निहित हैं। घर से लेकर तालाब या नदी तट तक जो सार्वजनिक सफाई और जल छिड़काव इस पर्व के बहाने किया, करवाया जाता है, वह एक दिवसीय विधान नहीं, बल्कि वर्ष पर्यंत अनुकरणीय सामाजिक संस्कार हैं, जो अब राजनीतिक आवरण ओढ़ कर हमारे बीच तो समुपस्थित हैं, लेकिन वह पतित पावन सामूहिक भावना नदारत है, जो कभी इस पर्व के माध्यम से समाज में प्रतिरोपित करने की कोशिश की गई थी।
यदि हम आप यह मानते हैं कि सार्वजनिक सफाई नगर निगम, नगरपालिका, नगर पंचायत या ग्राम पंचायत का उत्तरदायित्व है तो यह हमारी भूल है। इस बार दशहरा से छठ पर्व तक गाजियाबाद में जगह जगह जो गन्दगी दिखी, कूड़े का अंबार पाया गया, वह हमारी सांस्कृतिक सोच के बिल्कुल विपरीत है। यूपी विधानसभा चुनाव से ठीक पहले के पर्व त्यौहार के मौसम में जगह जगह जो गंदगी दिखी, उसका कारण चाहे जो भी रहा हो। लेकिन गाजियाबाद जैसे महानगर में व्याप्त यह स्थिति पीएम मोदी और सीएम योगी के लुंज पुंज प्रशासन और स्थानीय नेतृत्व की वह कलई खोलता है, जो शायद उन्हें भी पसंद न हो।
हिन्द आत्मा को जो भनक लगी है, उसका सार यह है कि बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी को चुनावी सफलता दिलाने के लिए कतिपय नेताओं और अफसरों ने अकर्मण्यता और अदूरदर्शिता का वह खेल खेला, जिसकी सच्चाई यदि योगी समझ लेंगे तो ऐसी विकृत मानसिकता के लोगों पर कार्रवाई करने में थोड़ा सा भी विलम्ब नहीं लगाएंगे। आखिर यह कैसा मिजाज है कि जिस देश का प्रधानमंत्री 7 साल पहले अक्टूबर महीने में झाड़ू लेकर खुद सड़क पर उतर गया हो, उसकी पार्टी की पूरी पलटन स्वच्छ भारत मिशन को घर घर पहुंचाने पर आमादा है, उसके ठीक सात राउंड बीतने के बाद गाजियाबाद जैसा महानगर कूड़े कचरे से सना नजर आएंगे तो हिन्द की आत्मा व्यथित होगी ही!
क्योंकि यह समस्या नहीं एक षड्यंत्र है जिसमें सत्तागत समीकरण के विपरीत ध्रुव वाले समीकरण से जुड़े लोग शामिल हैं। प्रशासन यदि इस चक्रब्युह को समझ नहीं पाया या भेद नहीं पाया तो उसकी निष्ठा पर सवाल उठेंगे ही। क्योंकि गाजियाबाद को यूपी का प्रवेश द्वार कहा जाता है। पर्व त्यौहार के मौके पर यहां दिखाई दी गन्दगी से सरकार की विफलता का संदेश पूरे सूबे में गया है। अब भी यदि धृतराष्ट्र बना प्रशासन संभल जाइए तो सरकार की सेहत के लिए अच्छा होगा, अन्यथा जब जनप्रतिक्रिया सामने आएगी तो सरकार की चूलें भी हिलेंगी ही।
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