जब महिलाओं को संपत्ति में समान अधिकार चाहिए, तो उनके पुत्रों को क्यों नहीं? जरा सोचिए

जब महिलाओं को संपत्ति में समान अधिकार चाहिए, तो उनके पुत्रों को क्यों नहीं? जरा सोचिए 

@ राजपथ/अशोक कौशिक, संपादक, हिन्द आत्मा दैनिक

किसी भी प्रकार की पैतृक संपत्ति में महिलाओं को समान अधिकार प्रदान करने की बात तो सभी करते हैं, लेकिन जब महिलाओं को प्राप्त ऐसी ही संपत्ति में उनके उत्तराधिकारियों के बीच उनके जीते-जी बंटवारे की बात होती है तो कानून इसकी इजाजत नहीं देता। आखिर ऐसा क्यों? 

स्वाभाविक सवाल है कि जब पिता की संपत्ति को बंटवारा में महिला समान रूप से प्राप्त करने का अधिकार रखती है, तो फिर महिला की संपत्ति को बंटवारा में पुरूष समान रूप से प्राप्त करने का अधिकार क्यों नहीं रखता है। यहां पुरुष का तातपर्य उनकी सन्तानों से है। 

यहां पर एक सवाल यह उठता है कि जब भी हमारी कानून निर्मात्री संस्था कोई कानून बनाती है तो उसमें कुछ खामियां या विसंगतियां कैसे छूट जाती हैं, यह बात आम भारतीयों की समझ से परे है। हालांकि, सर्वोच्च न्यायालय भी जब ऐसे महत्वपूर्ण विषयों पर जब कोई व्यवस्था देता है तो वह भी इसके समस्त पहलुओं पर विचार करना जरूरी नहीं समझता, जिससे भारतीय समाज में विवाद बढ़ता है। इसे रोका जाना जरूरी है।

इसलिए आज मैं इस सवाल को प्रमुखता से उठा रहा हूँ और सर्वोच्च न्यायालय से जनहित में यह अपील करता हूँ कि जिस प्रकार पिता की संपत्ति को उनके पुत्र जीते-जी बांट लेते हैं अपने पिता का हिस्सा निकाल कर, उसी प्रकार से माता की संपत्ति, जो उन्हें उनके माता-पिता की ओर से प्राप्त होती है, में भी उनके पुत्रों को उनके जीते-जी अधिकार मिलना चाहिए। जो कि अभी नहीं है।

बिहार के मुंगेर जिले के असरगंज अंचल स्थित रहमतपुर बासा ग्राम से ऐसी एक शिकायत हिन्द आत्मा को प्राप्त हुई है, जिसमें ननिहाल से मिले धन में माता और उनके पुत्रों के बीच वैधानिक पंचनामा बंटवारा हो चुका है, लेकिन अंचलाधिकारी उसके आधार पर नाम दाखिल खारिज करने को तैयार नहीं हैं, जिससे उनके पुत्रों का हकहकूक मारा जा रहा है। यह तो एक बानगी हुई। 

भारतीय समाज में नानी के धन यानी हिब्बा को लेकर नातियों को परेशान करने की परंपरा सदियों पुरानी है। ऐसी सम्पत्ति में विवाद होने के चलते ही एक कहावत बन चुकी है कि नानी का धन, पानी का धन और बेईमानी का धन नहीं टिकता है। भाई विहीन महिला, साला विहीन पुरुष और मामा विहीन युवक को जब ऐसी संपत्ति क्रमशः मां-पिता, सास-श्वसुर या नाना-नानी से उनकी सेवा सुश्रुषा के बाद प्राप्त होती है, तो उसके लिए वसीयतनामा, केवाला, दानपत्र को जरूरी करार दिया गया है। इससे उसे हासिल करने वाले व्यक्ति पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ता है। इसके बाद भी जब उसे प्राप्त करने वाले बच्चे, अपनी मां से समान बंटवारे की उम्मीद करते हैं तो कतिपय कानूनी पेंचीदगी सामने आती है, जिसे दूर करने की जरूरत है। इससे भूमि विवाद कम होंगे।

बताया जाता है कि यह एक सार्वदेशिक समस्या है, जिसपर एक समान कानून बनाने की दरकार है। खासकर पैतृक अथवा वंशानुगत संपत्ति के मामले में। सर्वोच्च न्यायालय के बाद अब उपराष्ट्रपति एम वेंकैया नायडु ने भी महिलाओं को संपत्ति में समान अधिकार प्रदान करने का आह्वान किया है ताकि देश की प्रगति के लिए उन्हें पूरी तरह से सशक्त बनाया जा सके। ऐसे में महिलाओं के बच्चों के अधिकार को भी स्पष्ट कर दिया जाना अतिआवश्यक है।

बता दें कि उपराष्ट्रपति ने गत दिनों नेल्लोर के वेंकटचलम में स्वर्ण भारत ट्रस्ट की 20वीं वर्षगांठ समारोह में भाग लेते हुए बताया कि देश की आबादी का लगभग 50 प्रतिशत महिलाएं हैं, जिन्हें पुरुषों के समान विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय होने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। उन्होंने महिलाओं के खिलाफ अत्याचार की निंदा करते हुए विभिन्न व्यवसायों में कौशल प्रदान करने के अलावा, संसद में महिलाओं को आरक्षण प्रदान करने की आवश्यकता को भी दोहराया। 

उन्होंने इस बात पर संतोष जाहिर किया कि स्वर्ण भारत ट्रस्ट पिछले 20 वर्षों से जरूरतमंद और हाशिए पर खड़े लोगों, विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में सशक्तिकरण के उनके सपने को पूरा कर रहा है। इसलिए हिन्द आत्मा की राय है कि समानता की बात एकपक्षीय नहीं होनी चाहिए। सदैव इसे बहुपक्षीय बनाया जाना चाहिए। भारतीय संविधान व उसके कानूनी संरक्षक की जिम्मेदारी इस नजरिए से और बढ़ जाती है। नए भारत के निर्माण में उनसे भी नए नजरिये को स्थापित करने की उम्मीद देशवासियों को है।

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