सनातन धर्म की लंका लगाने वाले 'सन्त' से बचिए!

सनातन धर्म की लंका लगाने वाले 'सन्त' से बचिए!

@ राजपथ/अशोक कौशिक, समूह सम्पादक

एक पंथनिरपेक्ष या धर्मनिरपेक्ष देश में धर्म और राजनीति में जुड़ाव व बिलगाव की क्या सीमाएं होनी चाहिए, इसे स्पष्ट न करते हुए हमारे संविधान निर्माताओं ने बहुत बड़ी भूल की है। इस सम्बन्ध में उनके द्वारा बनाये गए विधान और  उनके बाद उनके राजनैतिक उत्तराधिकारियों द्वारा किये गए संशोधनों ने इन जटिलताओं को और अधिक बढ़ा दिया है। 

सच कहा जाए तो भारतीय संविधान ने हिन्दू धर्मावलंबियों की कीमत पर विभिन्न धर्मावलंबियों खासकर अल्पसंख्यकों को जो कतिपय सहूलियतें दी हैं, वह हिंदुओं को क्यों नहीं मिलनी चाहिए, इस सवाल का जवाब आजादी का 75वां वर्ष भी ढूंढ रहा है! वो भी तब जबकि भारत हिंदुओं के हिस्से वाला देश है। यह हकीकत है कि मुस्लिमों के हिस्से वाला देश पाकिस्तान और बाद में बना बंगलादेश है। इसलिए भारत में मुसलमानों को उतनी ही सुविधाएं मिलनी चाहिए, जितनी वो पाकिस्तान व बंगलादेश में हिंदुओं को देते हैं!

कोढ़ में खाज यह कि संविधान का रखवाला हमारा सर्वोच्च न्यायालय भी इस प्रायोजित भेदभाव को अबतक नहीं बदल पाया है। इससे सत्ता व न्यायिक प्रतिष्ठानों में वकीलों तो जनमानस में साधुओं की बल्ले-बल्ले है। सब इस स्थिति को अपने अपने मन से परिभाषित कर रहे हैं और जनसमर्थन जुटा रहे हैं। साम्प्रदायिक दंगे इसकी ही परिणति हैं। तुष्टिकरण की सियासत से स्थिति और विद्रूप हो चली है। कांग्रेस के बाद समाजवादी दल और अब भाजपा भी कमोबेश उसी राह पर अग्रसर है। कोई कम, कोई ज्यादा! गौर कीजिए, केंद्र में पिछले 7 वर्षों से हिंदूवादी पार्टी भाजपा व उसके राजग गठबंधन का शासन है, लेकिन वह भी इस हालात में ज्यादा बदलाव नहीं ला पाई है।

जब से उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने धर्म और राजनीति के तालमेल से प्राप्त हुई सत्ता का सकारात्मक और जनहित में दृढ़तापूर्वक उपयोग किया है, तब से धर्म और राजनीति एक दूसरे के पूरक समझे जाने लगे हैं। जो इन्हें परस्पर दूर करके विकृत मानसिकता में ढालना चाहते थे, यूपी की नजीर देखकर उनके होश ठिकाने लग चुके हैं। इसलिए उनकी नकल करने या उनके खिलाफ तरह तरह के षड्यंत्र रचने में बहुतेरे हिन्दू सन्त भी शामिल हो चुके हैं, जिससे योगी के शुभचिंतक सतर्क भी हैं।

दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है कि उसी उत्तर प्रदेश में कुछ ऐसे भी सन्त हैं, जो बात बात में हिन्दू-मुस्लिम का वितंडा खड़ा करके अपना क्षुद्र मकसद साधने के आदि हो चुके हैं। वो अपने ही बनाये सख्त नियमों को खुद तोड़ते हुए शर्मिंदा भी नहीं हो रहे। जी हां, मैं बात डासना देवी मंदिर के महंत स्वामी नरसिंहानंद जी महाराज की कर रहा हूँ, जो अपने उटपटांग निर्णयों से राष्ट्रीय सुर्खियों में छाए रहते हैं। अब वो जूनागढ़ अखाड़े के महामंडलेश्वर भी बन चुके हैं।

जिस तरह से गत दिनों महामंडलेश्वर स्वामी नरसिंहानन्द जी महाराज ने अपने ही बनाये कानून का उल्लंघन किया है, वह हैरतअंगेज है! पहले उन्होंने मंदिर के मुख्य द्वार पर लिखवाया कि इस मंदिर में मुसलमानों का प्रवेश वर्जित है। उनके इस दृष्टिकोण के खिलाफ देश-विदेश में बावेला तक मचा। अब जिस तरह से उन्होंने वसीम रिजवी को डासना देवी मंदिर में बुलाकर उसकी किताब का विमोचन किया, वह फिर सवालों में है। पहला सवाल यह कि क्या वसीम रिजवी मुसलमान नहीं है? दूसरा सवाल यह कि क्या यह कार्य मंदिर परिसर के बाहर कहीं अन्यत्र आयोजित नहीं हो सकता था? तीसरा सवाल यह कि क्या यह मुस्लिम समुदाय को मरहम लगाने का क्षुद्र प्रयास तो नहीं है? चौथा, कहीं बाबा राजनीतिक लाभ तो नहीं लेना चाह रहे हैं, क्योंकि यूपी विधानसभा 2022 का चुनाव सिर पर है?

कहा भी जाता है कि जब कोई संत धर्म को लेकर तरह तरह के वितंडा खड़ा करता है तो वह सदैव सवालों के घेरे में रहता है! यदि आप इतिहास पढ़े हैं तो धर्मयुद्ध के बारे में भी जानते-समझते होंगे। आधुनिक युग में भी कुछ लोग हैं जो छद्म धर्मयुद्ध लड़ रहे हैं। धार्मिक बनकर धर्म से परे आचरण कर रहे हैं। ऐसा करने वालों में अब डासना देवी मंदिर के महंत स्वामी नरसिंहानंद जी महाराज का नाम भी जुड़ गया है। हिंदुओं के मांस भक्षण, स्त्री लोक मर्यादा और मंदिर में सम्प्रदाय विशेष के प्रवेश पर प्रतिबंध जैसे गूढ़ विषयों के सम्बंध में उनके जो सार्वजनिक विचार आये हैं, वह भले ही व्यवहारिक प्रतीत हों, लेकिन सर्वस्वीकार्य कदापि नहीं हो सकते! 

सवाल है कि आखिर ऐसा क्यों, आइए इसे समझते हैं कुछ दृष्टांतों से....सर्वविदित है कि डासना देवी मंदिर मुस्लिम बहुल इलाकों में है। यों समझ लीजिए 32 दांतों के बीच इकलौती जिह्वा समान। स्थानीय विधर्मियों और मंदिर प्रबंधन की परस्पर विरोधी कुछ शिकायतें जायज हो सकती हैं। लेकिन इससे निपटने के लिए सनातन धर्म के मूल्यों से कदापि समझौता नहीं किया जा सकता है। कभी मंदिर परिसर में पानी पीने गए मुस्लिम बच्चे की पिटाई तो कभी मंदिर परिसर में सोए एक बिहारी महंत पर 'विधर्मियों' द्वारा कातिलाना हमला किये जाने जैसे महत्वपूर्ण वाकये से डासना देवी मंदिर राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में छा चुका है। 

इसके अलावा, मंदिर में चोरी, सर्जिकल ब्लेड व अन्य जानलेवा सामग्री लेकर मंदिर परिसर में घुसने की कोशिश और उसमें पकड़े जाने जैसे कई वाकये के सामने आने के बाद गाजियाबाद पुलिस ने मंदिर परिसर की सुरक्षा बढ़ा दी है। लेकिन बाबा पुलिस अधिकारियों को भी भला-बुरा कहने से गुरेज नहीं करते। चिंताजनक पहलू यह है कि बाबा बुलेट प्रूफ गाड़ी में चलते हैं और 24 घण्टे सुरक्षा कर्मियों से लैस रहते हैं। अब उनसे हर कोई नहीं मिल सकता। समझा जाता है कि किसी भी विधर्मी षड्यंत्र से अपने और अपने चेलों के बचाव के लिए महंत नरसिंहानंद जी महाराज ने जब मंदिर के मुख्य द्वार पर यह बोर्ड लगवाया कि "इस मंदिर में मुसलमानों का प्रवेश वर्जित है" तो उन्हें हिंदुओं की ओर से जहां विश्वव्यापी जनसमर्थन मिला, वहीं अन्तर्राष्ट्रीय मुस्लिम विरादरी भी उनके खिलाफ हो गई। बाबा के खिलाफ जगह जगह से फतवे तक जारी हो गए। इससे हिंदुओं की गोलबंदी उनके पक्ष में होती गई, क्योंकि बाबा की जान पर खतरा हो गया। 

उधर बाबा भी मुस्लिमों व इस्लाम के खिलाफ आग उगलने लगे। उन्होंने उनके पैगम्बर मोहम्मद को भी नहीं छोड़ा। वो खुद कहते हैं कि जैसे ही कट्टर मुसलमानों को मौका मिलेगा, वो उन्हें मार देंगे। ऐसे में उनकी कथनी व करनी में जो अंतर दिखाई दे रही है, उससे उनका कभी भला नहीं होने वाला! ये बातें किसी राजनीतिज्ञ को तो शोभा देती हैं, पर सनातन सन्त को कतई है। क्योंकि वह तो वसुधैव कुटुम्बकम और सर्वे भवन्तु सुखिनः की बात करते हैं, अन्य ऊलजलूल बात कतई नहीं!

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