बैंकिंग प्रणाली के रेपो रेट, रिवर्स रेपो रेट, एसएलआर, सीआरआर व एमएसएफ के बारे में जानिए

बैंकिंग प्रणाली के रेपो रेट, रिवर्स रेपो रेट, एसएलआर, सीआरआर व एमएसएफ के बारे में जानिए, किसी पर इसका क्या पड़ेगा प्रभाव, इसे भी समझिए

@ कमलेश पांडेय, वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार

जैसे-जैसे बैंकिंग प्रणाली का विस्तार हो रहा है, इसके बहुप्रचलित शब्दों के बारे में जानने की जिज्ञासा हर किसी के मन में पैदा हो रही है। रेपो रेट, रिवर्स रेपो रेट, सीआरआर, एसएलआर, एमएसएफ आदि कुछ महत्वपूर्ण टर्म्स हैं, जिनके बारे में सबको जानना चाहिए। भारत के केंद्रीय बैंक के रूप में काम करने वाले रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के द्वारा ही जब बैंकों की नीतिगत दरों में बदलाव किया जाता है, या फिर बदलाव नहीं करके यथास्थिति बनाये रखने का फैसला किया जाता है, तब इन शब्दों का प्रयोग ज्यादा देखने-सुनने को मिलता है।

दरअसल, यह फैसला इतना महत्वपूर्ण होता है कि इसी पर कारोबारियों के साथ-साथ आम आदमी की निगाहें भी टिकी रहती हैं। इसलिए आरबीआई क्रेडिट पॉलिसी की घोषणा के दौरान रेपो रेट, रिवर्स रेपो रेट और सीआरआर जैसे शब्द जरूर सुनने को मिलते हैं, तो मन में सवाल पैदा होता है कि आखिर इन शब्दों के मायने क्या हैं? इसलिए,  मैं यहां पर आपको बता रहा हूँ कि इन शब्दों का मतलब  क्या होता है और इसका आप पर क्या प्रभाव पड़ता है। अर्थशास्त्र के विद्यार्थी तो इसे आसानी से समझ जाते हैं, लेकिन अन्य लोगों को इसे समझने में थोड़ी माथापच्ची करनी पड़ती है।

आपको पता होगा कि रेपो रेट घटने या बढ़ने के बाद बैंक ब्याज दरें क्रमशः घटा या बढ़ा देते हैं। यहां पर ब्याज दरें घटाने का मतलब होता है कि अब बैंक जब भी आरबीआई से फंड (रुपये-पैसे) लेंगे, तो उन्हें नई दर पर फंड मिलेगा। स्वाभाविक है कि जब सस्ते दरों पर बैंकों को फंड मिलेगा तो इसका फायदा बैंक अपने ग्राहकों को भी देंगे। लेकिन जब यह दर अचानक से बढ़ती है तो फिर ग्राहकों के लिए बैंक से मिलने वाला लोन भी महंगा हो जाता है। कतिपय मामलों में पहले से लिये हुये लोन की किश्त भी प्रभावित होती है। इसलिए आइए विस्तारपूर्वक जानते हैं कि  नीतिगत दरों से जुड़े टर्म क्या हैं और इसका कितना प्रभाव आम आदमी के रुझान पर पड़ता है।

# जानिए कि रेपो रेट क्या होता है?

आर्थिक मामलों के जानकार बताते हैं कि रेपो रेट वह दर होता है, जिस दर यानी रेट पर आरबीआई वाणिज्यिक (कमर्शियल) बैंकों एवं दूसरे बैंकों को कर्ज (लोन) देता है। इसे ही रिप्रोडक्शन रेट या रेपो रेट भी कहते हैं। दरअसल, रेपो रेट के कम होने का मतलब है कि बैंक से मिलने वाले सभी प्रकार के लोन सस्ते हो जाएंगे। कहने का तातपर्य यह कि रेपो रेट कम हाेने से होम लोन, व्हीकल लोन, पर्सनल लोन आदि सभी तरह के लोन सस्ते हो जाते हैं। लेकिन इससे आपकी जमा पर ब्याज दर में भी कमी हो जाती है, जिससे कि आपको भी आपकी जमा धनराशि पर कम ब्याज प्राप्त होती है।

# समझिए कि रिवर्स रेपो रेट क्या होता है?

बैंकिंग मामलों के जानकारों के मुताबिक, जिस रेट पर बैंकों को उनकी ओर से आरबीआई में जमा धन पर ब्याज मिलता है, उसे रिवर्स रेपो रेट कहते हैं। कहने का तातपर्य यह कि बैंकों के पास जो अतिरिक्त नकदी होती है, उसे रिजर्व बैंक के पास जमा करा दिया जाता है, जिस पर बैंकों को भी ब्याज मिलता है। आमतौर पर रिवर्स रेपो रेट बाजारों में नकदी को नियंत्रित करने में काम आता है। समझा जाता है कि बहुत ज्यादा नकदी होने पर आरबीआई रिवर्स रेपो रेट बढ़ा देती है, ताकि बैंक उस नकदी को रिजर्व बैंक के पास जमा करा दें। वहीं, यदि रिजर्व बैंक बाजार में नकदी का प्रवाह बढ़ाना चाहता है तो वह रिवर्स रेपो रेट घटा देता है। इस प्रकार रिजर्व बैंक प्रत्येक तीन माह के अंतराल पर इन दरों की समीक्षा करता रहता है। कभी वह इनमें कटौती करता है तो कभी इन्हें बढ़ा देता है। कभी कभार वह इसे यथावत भी रखता है।

# जानिए कि एसएलआर क्या है?

आपको पता होना चाहिए कि स्टेचुटरी लिक्विडिटी रेशियो या एसएलआर एक सरकारी टर्म है, जिसे सभी वाणिज्यिक बैंकों को पूरा करना होता है। वास्तव में, इसके जरिए ही रिजर्व बैंक यह सुनिश्चित करता है कि कोई भी बैंक आम जनता या कारपोरेट जगत को क्रेडिट देने से पहले कैश, गोल्ड रिजर्व, पीएसयू बांड्स एवं रिजर्व बैंक से अप्रूव्ड सिक्योरिटी में कितनी धनराशि रखेंगे। दरअसल, इससे ही बाजार में मुद्रा के प्रवाह पर नियंत्रण रखा जाता है। इसलिए रिजर्व बैंक भी इसका अनुपालन कड़ाई से करवाता है।

# समझिए कि सीआरआर क्या है?

आपको पता होना चाहिए कि कैश रिजर्व रेशियो या सीआरआर को मेंटेन करना सभी वाणिज्यिक (कामर्शियल) बैंकों का वैधानिक दायित्व होता है। यही वजह है कि सभी बैंकों को अपनी कुल जमा धनराशि का एक निश्चित हिस्सा रिजर्व बैंक के पास जमा रखना पड़ता है। वास्तव में, यह धनराशि बैंकों के स्थायित्व और उनकी जरूरतों को पूरा करने के लिए जरूरी है। सरल शब्दों में कहें तो यह भी बाजार में नकदी के प्रवाह पर नियंत्रण रखने का ही एक टूल है, जिस पर रिजर्व बैंक कड़ी नजर रखता है।

# जानिए कि एमएसएफ क्या है?

बैंक विशेषज्ञ बताते हैं कि मार्जिनल स्टैंडिंग फेसिलिटी या एमएसएफ वाणिज्यिक (कामर्शियल) बैंकों के लिए एक तरह से सहायक है। रिजर्व बैंक इस टूल का उपयोग सिर्फ इसलिए ही करता है ताकि बाजार में पर्याप्त लिक्विडिटी बनी रहे। वैसे तो रिजर्व बैंक ने इसकी शुरुआत वर्ष 2011-12 की मोनेटरी पालिसी की घोषणा करते वक्त की थी, और तभी से इस पर अमल जारी है। बता दें कि एमएसएफ के तहत कोई भी वाणिज्यिक (कामर्शियल) बैंक एक रात के लिए अपने कुल जमा का 1 फीसदी राशि तक का कर्ज (लोन) ले सकते हैं। इससे वे अपनी आकस्मिक जरूरतों को भी पूरा कर सकते हैं।

अब आप समझ गए होंगे कि बैंकिंग व्यवस्था के ये कितने महत्वपूर्ण टर्म्स हैं, जिन्हें जानकर आपको इस व्यवस्था को समझने में आसानी होगी। आगे पुनः कुछ ऐसे ही अन्य महत्वपूर्ण टर्म्स के बारे में भी बताएंगे, जिन्हें जानकर आपको अच्छा लगेगा।

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