क्या साहिबाबाद विधायक अपना सियासी किला महफूज रख पाएंगे या लगेगी सेंध!

क्या साहिबाबाद विधायक अपना सियासी किला महफूज रख पाएंगे या लगेगी सेंध!

# जिन स्थानीय व क्षेत्रीय समीकरणों को साधकर भाजपा केन्द्र व राज्य में मजबूत हुई, उसमें मिल रही परिवर्तन की आहट 

कमलेश पांडेय/राजनीतिक विश्लेषक
गाजियाबाद। आगामी यूपी विधानसभा चुनाव 2022 के मद्देनजर जनपद अंतर्गत साहिबाबाद विधानसभा सीट पर अधिकांश भाजपा नेताओं की नजर अपनी अपनी उम्मीदवारी के हिसाब से गड़ी हुई है। यह जानते हुए भी कि यहां से लगातार दो बार जीतने वाले भाजपा विधायक सुनील कुमार शर्मा के रहते हुए यहां किसी तीसरे नेता की दाल नहीं गलने वाली है। पार्टी ने सत्ता पाते ही उनका प्रोमोशन भी कर दिया है और राज्यमंत्री का दर्जा देने हेतु यूपी पंचायती राज समिति का अध्यक्ष बनवा दिया। हालांकि, कार्यकर्ताओं की पार्टी समझी जाने वाली भाजपा में अदना सा कार्यकर्ता भी यह सोचकर टिकट मांगते हैं कि वह मिले या न मिले, लेकिन अपना दावा जरूर ठोकना है। 

पार्टी सूत्रों की मानें तो इस प्रतिष्ठित सीट पर केंद्रीय राज्यमंत्री और गाजियाबाद सांसद जनरल वी के सिंह की पुत्री मृणालिनी सिंह, केंद्रीय रक्षा मंत्री और गाजियाबाद के पूर्व सांसद राजनाथ सिंह के पुत्र नीरज सिंह, साहिबाबाद विधायक सुनील शर्मा के विधानसभा चुनाव कार्यालय प्रभारी रह चुके वरिष्ठ भाजपा नेता, निगम पार्षद व पूर्व नगर निगम कार्यकारिणी सदस्य मनोज गोयल, भाजपा महानगर अध्यक्ष संजीव शर्मा, प्रदेश श्रम प्रकोष्ठ के सह संयोजक योगेश त्रिपाठी, निगम पार्षद सरदार सिंह भाटी, मीना भंडारी सरीखे पार्टी कार्यकर्ता चाह रहे हैं कि पार्टी उन्हें टिकट देकर जनसेवा का एक मौका दे।

संघ सूत्र बताते हैं कि उत्तर प्रदेश की सबसे बड़ी विधानसभा सीट साहिबाबाद पर मजबूत हिंदुत्व के चेहरे के अलावा पूर्वांचल और उत्तरांचल समाज के लोग भी टिकट मांग रहे हैं, जिससे टिकट वितरण करने वाली टीम के समक्ष धर्मसंकट वाली स्थिति होगी। भाजपा के कोर वोटर समझे जाने वाले ब्राह्मण, त्यागी, क्षत्रिय, कायस्थ और वैश्य बिरादरी के दर्जनाधिक नेता हैं, जो पर्दे के पीछे से अपनी अपनी गोटियां सेंक रहे हैं। भाजपा अपने नए समर्थक वर्ग जाट, गुजर के अलावा लव-कुश और यादव विरादरी के दावेदारों के दावों की भी उपेक्षा करने के मूड में नहीं दिख रही है। 

वह गाजियाबाद जनपद की पांच विधानसभा सीटों में अभी तक साहिबाबाद को ब्राह्मण नेता, गाजियाबाद को बनिया नेता, मुरादनगर को त्यागी नेता, मोदीनगर को जाट नेता और लोनी को गुर्जर नेता के हवाले कर चुकी है और अपनी इसी सोशल इंजीनियरिंग की वजह से जनपद की पांचों विधानसभा सीटों पर वह काबिज है। हां, पार्टी यह अवश्य करेगी कि अलग अलग जातियों के कब्जे वाले विधानसभा क्षेत्रों में दूसरी मजबूत जातियों से अदला बदली कर दे। सपा, बसपा और कांग्रेस यदि सवर्ण जातियों पर दांव लगाएगी तो भाजपा पिछड़ी और दलित जातियों पर भी अपने कैडर के बूते दांव लगा सकती है।

वहीं, केंद्रीय भाजपा के एक महत्वपूर्ण रणनीतिकार के कार्यालय सूत्रों ने प्रदेश से क्षणकर आ रही जानकारियों के मद्देनजर बताया कि उत्तरप्रदेश पार्टी की भावी रणनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण प्रदेश है और गाजियाबाद-गौतमबुद्धनगर की सीटों पर सभी जातियों को प्रतिनिधित्व दिए जाने की योजना है, क्योंकि यहां देश-प्रदेश के बहुत सारे लोग रहते हैं और कैडर बेस पार्टी यदि यहां सोशल इंजीनियरिंग करने में कामयाब हो जाती है तो हिंदी पट्टी में वह अपना सियासी दबदबा कायम करने में सफल रहेगी।

बताया जाता है कि देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वैश्य हैं और उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ क्षत्रिय हैं। गाजियाबाद के सांसद जनरल वी के सिंह क्षत्रिय हैं और नोएडा के सांसद ब्राह्मण हैं। गाजियाबाद के राज्यसभा सांसद अनिल अग्रवाल वैश्य हैं। यूपी के राज्यमंत्री अतुल अग्रवाल वैश्य हैं। इसलिये पार्टी गाजियाबाद और गौतमबुद्धनगर के विभिन्न विधानसभा सीटों पर हल्का सा बदलाव करने के मूड में है। लोनी में गुर्जर विधायक, मोदीनगर में जाट विधायक, मुरादनगर में त्यागी विधायक, गाजियाबाद में बनिया विधायक और साहिबाबाद में ब्राह्मण विधायक ही रहेंगे। हां, कार्यकर्ताओं की गुप्त रिपोर्ट के आधार पर चेहरा बदल जाये तो आपको हैरत नहीं होना चाहिए। 

बताया जाता है कि गौतमबुद्ध नगर की विधानसभा सीटों पर क्षत्रिय एवं गुर्जर विधायकों का दबदबा है। इसलिए पार्टी जाटों, यादवों, लव-कुश जातियों, दलितों व किसी अल्पसंख्यक नेताओं को या तो बागपत, बुलंदशहर और मेरठ में ज्यादा महत्व देगी, या फिर इन जातियों के नेताओं को विधान परिषद सदस्य बनाकर संतुष्ट करने की कोशिश करेगी। क्योंकि मुख्यमंत्री का चेहरा सवर्ण नेता का होने की वजह से ओबीसी और दलित जातियों के सक्रिय नेताओं के लिए पार्टी कुछ न कुछ करने की सोच रही है। 

इसी रणनीति के तहत पीएम मोदी के हालिया मंत्रिमंडल के विस्तार में ओबीसी जातियों को पूरी तवज्जो दी गई है। अब देखना यह है कि पार्टी यथास्थिति कायम रखती है या फिर किसी वैसे स्थानीय समीकरण का ईजाद करती है जो सपा, बसपा व कांग्रेस समर्थक कुनबे की पैरों में सियासी बेड़ियां डालकर दोबारा यूपी का मैदान मार ले जाये और यूपी के सबसे सफल मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को दूसरी बार भी सूबे का नेतृत्व देने का निश्चय करे।

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