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संविधान की प्रस्तावना में शामिल 'समाजवादी' व 'धर्मनिरपेक्षता' शब्द पर जारी सियासत के मायने

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संविधान की प्रस्तावना में शामिल 'समाजवादी' व 'धर्मनिरपेक्षता' शब्द पर जारी सियासत के मायने @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी आरएसएस सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने संविधान की प्रस्तावना में बाद में शामिल किए गए दो शब्दों 'संविधान की प्रस्तावना में शामिल 'समाजवादी' व 'धर्मनिरपेक्षता' शब्द पर जारी सियासत के मायने' और 'धर्मनिरपेक्ष'  को 'संविधान हत्या दिवस' के दिन ही हटवाने की जो वकालत की है, उसके राष्ट्रीय, सामाजिक और धार्मिक मायने तो स्पष्ट हैं, लेकिन उनकी इस साफगोई ने एक बार से इन दोनों विवादास्पद शब्दों से जुड़े सियासी अंतर्विरोधों को उजागर कर दिया है।  ऐसा इसलिए कि उनके दिए गए बयान को लेकर जहां कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों के नेताओं के अलावा एनडीए की सहयोगी लोजपा ने भी होसबोले की टिप्पणी की आलोचना की, वहीं भाजपा ने होसबोले का बचाव किया है। एक सवाल कि, क्या आपातकाल के दौरान संविधान की प्रस्तावना में शामिल किए गए 'समाजवादी' और 'धर्मनिरपेक्ष' शब्द वहां बने रह...

एससीओ में आतंकवाद पर चले पारस्परिक दांवपेंच के मायने समझिए और इसका स्थायी हल ऐसे निकालिए

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एससीओ में आतंकवाद पर चले पारस्परिक दांवपेंच के मायने समझिए और इसका स्थायी हल ऐसे निकालिए @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक जब इजरायल जैसा छोटा-सा यहूदी देश अपने शौर्य, पराक्रम और कूटनीति जनित तकनीकी विकास के बल पर ईरान जैसे कट्टर शिया इस्लामिक देश का मुकाबला कर सकता है, तो भारत जैसा विशाल हिन्दू राष्ट्र अपने शौर्य, पराक्रम और कूटनीति जनित तकनीकी विकास के बल पर पाकिस्तानी/पूर्वी पाकिस्तान (बंगलादेश) जैसे कट्टर सुन्नी देश का मुकाबला कर सकता है। बस जरूरत सिर्फ इस बात की है कि जैसे अमेरिका के प्रति इजरायल समर्पित होकर उसका साथ लेता रहता है, वैसे ही हमें रूस के प्रति वफादारी निभाकर (क्योंकि वह हमारे दुःख का जांचा-परखा भरोसेमंद अंतरराष्ट्रीय साथी है) उसका पक्का साथ हासिल करने की कोशिश करनी चाहिए। ऐसा इसलिए कि रूस जब भारत के साथ रहेगा तो अमेरिका, यूरोप, चीन और इस्लामिक देश भी अपनी हद में रहेंगे। वहीं, जब रूस को भारत का खुला साथ मिलेगा तो अमेरिका, यूरोप, चीन और इस्लामिक देश रूस को आंख नहीं दिखा पाएंगे। सच कहूं तो रूस के तकनीकी विकास को यदि भारत की जनसंख्या का साथ और...

ओबीसी कथावाचकों के सामाजिक अपमान के मुद्दे पर छिड़ी सियासत से उभरते सवाल

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ओबीसी कथावाचकों के सामाजिक अपमान के मुद्दे पर छिड़ी सियासत से उभरते सवाल @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक उत्तर प्रदेश के इटावा में कथित 'यादव' कथावाचकों के साथ मारपीट के मामला लगातार सुर्खियों में बना हुआ है और कोढ़ में खाज यह कि अब इस पर सियासत भी तेज हो गई है, जो हमारी प्रशासनिक कमजोरी और सियासी विफलता दोनों का ही तकाजा है। इस मामले में यूपी के पूर्वमुख्यमंत्री और सपा नेता अखिलेश यादव के कूद पड़ने और इसे पीडीए विरोधी रंग देने के बाद उत्तर प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री और सुभासपा अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर ने भी मोर्चा संभाल लिया है और इस घटना की निंदा करते हुए स्पष्ट कहा है कि ऐसी घटनाएं नहीं होनी चाहिए। यही वजह है कि ओबीसी कथावाचकों के सामाजिक अपमान के मुद्दे पर छिड़ी सियासत से कतिपय तल्ख सवाल भी उभरकर सामने आ रहे हैं, जिनका समुचित जवाब भी ढूंढा जाना चाहिए। ऐसा इसलिए कि गत गुरुवार को इसे लेकर बड़ी संख्या में 'अहीर रेजिमेंट' के लोगों ने दादरपुर गांव में घुसने और ब्राह्मण परिवकी कोशिश की और इस दौरान पथराव होने पर पुलिस को बल प्रयोग करना पड़ा। यह...

चार राज्यों के 5 विधानसभा सीटों पर हुए विधानसभा उपचुनाव के मिले परिणामों के सियासी मायने

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चार राज्यों के 5 विधानसभा सीटों पर हुए विधानसभा उपचुनाव के मिले परिणामों के सियासी मायने @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक बिहार विधान सभा चुनावों से ठीक पहले देश के चार प्रमुख राज्यों- पंजाब, गुजरात, पश्चिम बंगाल व केरल के 5 सीटों पर हुए उपचुनाव के आए परिणामों में जहां आप व टीएमसी को खुशी मिली है, वहीं कांग्रेस-भाजपा को सुकून के साथ साथ रणनीतिक झटका भी लगा है, लेकिन माकपा को करारी मात मिली है। उपचुनाव परिणाम इस बात की चुगली करते हैं कि जहां आप को उम्मीदों के विपरीत पंजाब और गुजरात में एक-एक सीट पर जबर्दस्त पुनः वापसी जीत मिली है, वहीं केरल में कांग्रेस को एक सीट नई मिलने से वहां उसकी स्थिति मजबूत हुई है।  इधर, पश्चिम बंगाल में टीएमसी को भी एक जीती हुई सीट पुनः मिलने से जहां उसका सियासी दबदबा बरकरार है, वहीं गुजरात में बीजेपी को महज एक सीट पर जीत मिली, जो उसकी जीती हुई सीट है। लेकिन केंद्र व राज्य में भाजपा की सत्ता होने के बावजूद वह यहां की दूसरी सीट  आप से झटक नहीं सकी, जिससे उसका कब्जा बरकरार रहा है। इससे साफ है कि गुजरात में कांग्रेस की जगह आप भ...

यदि ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य बन्द किया तो उछलेंगे पेट्रोलियम पदार्थों के दाम और भारत-चीन-अमेरिका की अर्थव्यवस्थाएं होगी तबाह!

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यदि ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य बन्द किया तो उछलेंगे पेट्रोलियम पदार्थों के दाम और भारत-चीन-अमेरिका की अर्थव्यवस्थाएं होगी तबाह! @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक ईरान की संसद ने कथित तौर पर अपने तीन परमाणु स्थलों पर अमेरिकी हमलों के बाद रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य (होर्मुज स्ट्रेट) को बंद करने की मंजूरी दे दी है। अब यह प्रस्ताव ईरानी सुरक्षा संस्था के पास भेजा जाएगा, जहां यदि मंजूरी मिल गई तो ईरान होर्मुज  जलडमरूमध्य पर हमले करते हुए इसे बंद कर सकता है। और यदि ऐसा हुआ तो तीसरा विश्वयुद्ध भी सम्भाव्य है, जिससे अमेरिका-इजरायल की पेशानी पर बल पड़ेगा। क्योंकि ऐसा करके जहां एक ओर मुस्लिम देश एकजुट होंगे, वहीं दूसरी ओर अमेरिका-भारत जैसे परस्पर विरोधी परन्तु महत्वपूर्ण देश भी अपने पेट्रोलियम हितों की पूर्ति के लिए एक दूसरे के और अधिक करीब आएंगे।  जानकार बताते हैं कि इसी दरम्यान मुस्लिम देशों की एकजुटता की भी परीक्षा होगी और यह भी स्पष्ट हो जाएगा कि इस बेढंगे निर्णय पर रूस-चीन कितना ईरान का साथ देंगे। क्योंकि इससे न केवल अमेरिका बल्कि भारत औ...

आखिरकार ईरानी परमाणु ठिकानों पर अमेरिकी हमले भारत और उसके पास-पड़ोस के लिए चिंता की बात क्यों हैं?

आखिरकार ईरानी परमाणु ठिकानों पर अमेरिकी हमले  भारत और उसके पास-पड़ोस के लिए चिंता की बात क्यों हैं? @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक दुनिया की चौथी आर्थिक महाशक्ति भारत के इसराइल और ईरान दोनों के साथ गहरे और अलग-अलग स्तर पर महत्वपूर्ण रिश्ते हैं। यही वजह है कि जब पिछले हफ़्ते इसराइल ने ईरान पर अचानक हमला किया, तो एक ध्रुवीकृत वैश्विक माहौल में भारत के लिए किसी एक पक्ष का समर्थन करना आसान नहीं था। यह बात दीगर है कि, क़रीब एक महीने पहले जब भारत ने पाकिस्तान के कुछ इलाक़ों में सैन्य कार्रवाई की थी, तब इसराइल ने भारत का खुलकर समर्थन किया था।  लेकिन, देखा जाए तो एक ओर जहां इसराइल के लिए ऐसा करना एक सहज निर्णय था, क्योंकि पाकिस्तान अब तक इसराइल को एक राष्ट्र के रूप में मान्यता नहीं देता है। वहीं दूसरी ओर, भारत और ईरान के बीच लंबे समय से मज़बूत और सभ्यतागत स्तर के संबंध रहे हैं। इतना ही नहीं, दोनों देशों के बीच रणनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक जुड़ाव भी गहरे हैं। ऐसे में भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह बिना अपने दीर्घकालिक हितों को नुक़सान पहुंचाए इस संघर्ष मे...