तिब्बत की आजादी के यक्ष प्रश्न का आखिर कब तक मिलेगा जवाब या फिर रहने दिया जाएगा अनुत्तरित
तिब्बत की आजादी के यक्ष प्रश्न का आखिर कब तक मिलेगा जवाब या फिर रहने दिया जाएगा अनुत्तरित @ तीखी बात/कमलेश पांडेय, वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार तिब्बत की आजादी 20 वीं शताब्दी का यक्ष प्रश्न है और 21 वीं शताब्दी के प्रथम चौथाई वर्ष तक भी इसका उत्तर न मिलना सभ्य समाज के लिए एक बड़ी चुनौती है। जैसे हमलोग छोटे-छोटे राज्यों के गठन को विकास के लिए जरूरी अवधारणा करार देते हैं, वैसी ही बात छोटे-छोटे देशों के गठन पर लागू की जा सकती है। खासकर दशकों से संघर्षरत उन क्षेत्र विशेष के लोगों के लिए, जो कभी आजाद थे, लेकिन 20 वीं सदी के नवसाम्राज्यवादी साम्यवादी महत्वाकांक्षाओं की भेंट चढ़ गए। खासकर तिब्बतियों का सवाल उसमें सबसे महत्वपूर्ण है। इसलिए भारत सरकार को चाहिए कि वह नेहरुयुगीन वन चाइना पालिसी पर पुनर्विचार करे, क्योंकि वह हमारा विनम्र पड़ोसी देश रहा है। उससे हमारे गहरे आर्थिक और सांस्कृतिक सम्बन्ध रहे हैं। 1950 के दशक के अंतिम वर्षों से अबतक तिब्बत और उससे सटे भारतीय भूभाग के प्रति चीन का जो झपटमार रवैया रहा है, उसके मुत्तालिक यह और भी जरूरी हो जाता है कि आजाद तिब्बत ही अंतरराष्ट्रीय भारत...