# ममता व करुणा की प्रतिमूर्ति मां और मातृभूमि
# ममता व करुणा की प्रतिमूर्ति मां और मातृभूमि @ डॉ दिनेश चंद्र सिंह, जिलाधिकारी, बहराइच मां और मातृभूमि की महिमा शब्दों में बयां नहीं की जा सकती। क्योंकि वह अपरंपार होती है। मां के पालन-पोषण से ही हर तरह का व्यक्तित्व सजता-सँवरता-निखरता है। सारा संसार जनता और मानता आया है कि व्यक्तित्व निर्माण की पहली पाठशाला मां है, उसकी ममतामयी गोद है और उसकी बाल्यकालीन छत्रछाया ही होती है। इसलिए हर सफल व्यक्तित्व अपनी मां के प्रति आजीवन श्रद्धावनत रहते हैं। मैं भी अपवाद नहीं हूं। मुझे भी अपनी मां और मातृभूमि से गहरा लगाव था, है और रहेगा। लोकप्रिय फ़िल्म 'तारे जमीं पर' में सुप्रसिद्ध गीतकार शंकर महादेवन ने अपनी गीत की पंक्तियों में मां के ममत्व और महत्व को एक हद तक अभिव्यक्ति प्रदान करने की कोशिश की है। इसलिए आज यहां पर उन्हें मैं उद्धृत करना जरूरी समझता हूं, ताकि सहजता पूर्वक आप सबकुछ समझ सकें। गीत है- "मैं कभी बतलता नहीं, पर अंधेरे से डरता हूँ मैं माँ। यूँ तो मैं दिखलता नहीं, तेरी परवाह करता हूँ मैं माँ।। तुझे सब है पता, है ना माँ, तुझे सब है पता...मेरी माँ।।। भीड़ में यूँ ना छोड़ो मुझे...