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आखिर 12 वर्षों में राष्ट्रवादी सपनों के शहंशाह कैसे बने पीएम नरेंद्र मोदी? जानिए

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आखिर 12 वर्षों में राष्ट्रवादी सपनों के शहंशाह कैसे बने पीएम नरेंद्र मोदी? समझते हैं विस्तार से @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक यशस्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का 12 वर्षीय शासनकाल (2014-2026) कई मायने में महत्वपूर्ण है। यह स्वतंत्र भारत के सबसे प्रभावशाली और बहसयोग्य राजनीतिक दौरों में से एक माना जाता है, जिसका बहुआयामी प्रभाव आने वाले दशकों तक भारतीय राजनीति, शासन और चुनावी संस्कृति पर दिखाई दे सकता है।  पीएम मोदी के इस शासनकाल का भारतीय राजनीति पर गहरा प्रभाव पड़ा है। इसलिए जहां समर्थक इसे निर्णायक नेतृत्व, विकास और वैश्विक प्रतिष्ठा का काल बताते हैं। वहीं, आलोचक लोकतांत्रिक संस्थाओं, सामाजिक ध्रुवीकरण और आर्थिक चुनौतियों पर प्रश्न उठाते हैं।  राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो मोदी काल ने भारतीय राजनीति को गठबंधन-प्रधान युग से व्यक्तित्व-केंद्रित और राष्ट्रव्यापी चुनावी राजनीति की ओर मोड़ा। लिहाजा, आने वाले वर्षों में यह आकलन होगा कि यह परिवर्तन स्थायी राजनीतिक पुनर्गठन सिद्ध होता है या...

इंडिया गठबंधन की बैठक के राजनीतिक मायने समझिए

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इंडिया गठबंधन की बैठक के राजनीतिक मायने समझिए @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक विगत दो-तीन वर्षों में कांग्रेस की सियासी विसात पर अपना अपना-सबकुछ लुटा-पिटा देने के बाद इंडिया (INDIA) गठबंधन के सहयोगियों की जो "नई दिल्ली बैठक" हुई, उसके राजनीतिक मायने कांग्रेस के लिए बेहद फायदेमंद साबित हुए। क्योंकि इस बैठक में पहली बार नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी की आवाज ध्यान से सुनी गई और उनके नेतृत्व को तथा उनकी पार्टी को गाहे-बगाहे चुनौती देने वाले क्षेत्रीय दलों के सुरमा भोपाली नेता दबी जुबान में अपनी भावना प्रकट करने को अभिशप्त हुए। खासकर नेशनल कांफ्रेंस के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला, सपा प्रमुख अखिलेश यादव को छोड़कर। इसलिए यह बैठक केवल एक नियमित विपक्षी बैठक तक सीमित नहीं रही, क्योंकि यह बैठक ऐसे समय हुई, जब कई सहयोगी दलों और कांग्रेस के बीच मतभेदों की बढ़ती-घटती खबरें सामने आई थीं, इसलिए इसके संदेश पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। मिली जानकारी के अनुसार, 8 जून को इंडिया (INDIA) गठबंधन की बैठक में लगभग 23 दलों के राजनेत...

बदलते बिहार की सकारात्मक छवि गढ़कर निवेश प्रवाह को आकर्षित करेगा "ब्रांड बिहार"

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बदलते बिहार की पहचान, रमणीक छवि और निवेश परिस्थिति को गढ़कर मजबूत करेगा "ब्रांड बिहार"  @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक “ब्रांड बिहार नीति” का अर्थ केवल किसी सरकारी विज्ञापन अभियान से नहीं है, बल्कि बिहार की एक ऐसी व्यापक रणनीति से है जिसके जरिए राज्य की सकारात्मक पहचान बनाई जाए, ताकि बिहार को निवेश, पर्यटन, शिक्षा, संस्कृति, उद्योग, कृषि और मानव संसाधन के एक बड़े केंद्र के रूप में प्रस्तुत किया जा सके।  माननीय मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के कुशल नेतृत्व में आगे बढ़ रहे "ब्रांड बिहार" की इस आकर्षक पहल को रणनीतिक दिशा प्रदान करने के लिए बिहार के मुख्य सचिव प्रत्यय अमृत के नेतृत्व में प्रशासनिक टीम कार्य करेगा। जबकि इस पहल को श्रद्धा शर्मा द्वारा सहयोग प्रदान किया जाएगा। बता दें कि हाल के वर्षों में बिहार सरकार ने विशेष रूप से “पर्यटन ब्रांडिंग एवं मार्केटिंग नीति 2024” जैसी पहलें शुरू की हैं, जिनका उद्देश्य बिहार की छवि को राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर मजबूत करना है।  बिहार सरकार ने "ब्रांड बिहार" की शुरुआत की...

बिहार की राजनीति के वर्तमान व भविष्य की 'सियासी धुरी' बन चुके हैं सीएम सम्राट चौधरी

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बिहार की राजनीति के वर्तमान व भविष्य की 'सियासी धुरी' बन चुके हैं सीएम सम्राट चौधरी  @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक बिहार की राजनीति में जुझारू युवा मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को केवल सुलझते हुए वर्तमान का एक नेता ही नहीं, बल्कि “भविष्य की राजनीतिक धुरी” के रूप में देखने वालों की संख्या पिछले 5 वर्षों में तेजी से बढ़ती ही जा रही है और यह सिलसिला निरंतर आगे भी चलता रहेगा। ऐसा इसलिए कि उनके पीछे कई राजनीतिक, सामाजिक और संगठनात्मक कारण सक्रिय हैं, जो उन्हें राजनीतिक रूप से अजेय बनाते हैं। आइए इन्हें समझते हैं विस्तार से-  पहला, बिहार में भाजपा के भीष्म पितामह कैलाशपति मिश्रा के संजोए हुए सपनों को पूरा करते हुए पार्टी के  पहले मुख्यमंत्री बनने का ऐतिहासिक महत्व है। निःसन्देह साल 2026 में सम्राट चौधरी का बिहार का मुख्यमंत्री बनना भाजपा के लिए ऐतिहासिक मोड़ माना गया, क्योंकि पहली बार बिहार में भाजपा ने मुख्यमंत्री पद अपने हाथ में लिया। इससे प्रदेशवासियों में  यह संदेश गया कि भाजपा अब बिहार में “जूनियर पार्टनर” नहीं रहना ...

क्या अमेरिका-चीन के 'वैश्विक चक्रब्यूह' में घिर चुके भारत को रूस व अन्य मित्र देशों की मदद मिलेगी?

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क्या अमेरिका-चीन के 'वैश्विक चक्रब्यूह' में घिर चुके भारत को रूस व अन्य मित्र देशों की मदद मिलेगी? @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक गुटनिरपेक्ष देश भारत आज एक जटिल वैश्विक शक्ति-संघर्ष में फँसा दिखाई देता है, जहाँ एक तरफ अमेरिका भारत को इंडो-पैसिफिक रणनीति के तहत चीन के विरुद्ध अपने प्रमुख साझेदार के रूप में देखना चाहता है, तो वहीं दूसरी तरफ चीन एशिया में अपनी सर्वोच्चता स्थापित करने के लिए भारत पर सामरिक, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक दबाव बनाए हुए है। जबकि, भारत इन सबसे बेपरवाह रहते हुए अपने पुराने सदाबहार मित्र रूस के साथ अपने संतुलित रिश्ते प्रगाढ़ बनाए हुए है। साथ ही, फ्रांस, जर्मनी, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, जापान और इजरायल आदि से द्विपक्षीय रिश्ते मजबूत कर चुका है। ऐसे में स्वाभाविक रूप से एक प्रश्न उठता है कि क्या रूस और फ्रांस, जर्मनी, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, जापान और इजरायल आदि जैसे मजबूत अन्य मित्र देश भारत को इस “अमेरिका-चीन के वैश्विक चक्रब्यूह” से बचाने हेतु  निर्णायक भूमिका निभा पाएंगे? दो टूक उत्तर होगा कि वैश्विक परिस्थितियां ही...

राजनैतिकदुनिया डॉट ब्लॉग्स्पॉट डॉट कॉम के लिंक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर करें साझा और दें आर्थिक सहयोग

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बृहत्तर भारत, शांतिप्रिय विश्व की अवधारणा को मजबूत करने की मुहिम को समर्पित "राजनैतिकदुनिया डॉट ब्लॉग्स्पॉट डॉट कॉम" वैचारिक क्रांति का अग्रदूत है। विश्व व्यापी जनजागृति के निमित्त इसका लिंक फेसबुक, एक्स (ट्वीटर), लिंक्डइन, थ्रेड्स, इंस्टाग्राम, यूट्यूब, व्हाट्सएप आदि पर भी साझा किया जाता है, जो हर वक्त उपलब्ध है।  जबतक अखंड भारत नया आकार नहीं लेगा और पूर्वी एशिया एवं पश्चिमी एशिया में भारत का वसुधैव कुटुंब कम वाला भाव मजबूत नहीं होगा, तबतक विश्वव्यापी संकट हमें प्रभावित/प्रताड़ित करते रहेंगे। लिहाजा, मजबूत और विस्तृत भारत का निर्माण हमारा भी लक्ष्य होना चाहिए। बिल्कुल पड़ोसी  चीन की तरह। तिब्बत के बिना भी भारत असुरक्षित ही रहेगा।  इसलिए वर्तमान और भावी पीढ़ी में जनजागृति पैदा करना मीडिया का परम कर्तव्य है। जनमत निर्माण की सामूहिक जिम्मेदारी है। इसलिए अपने हिस्से का वैचारिक योगदान अपने आसपास अवश्य दीजिए। यहां प्रसारित आलेख देश प्रदेश के विभिन्न अखबारों में भी प्रकाशित होते रहते हैं।जिसकी कटिंग्स सम्बन्धित आलेख के साथ साझा किया हुआ रहता हूँ। यदि आप राज...

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पांच देशों की विदेश यात्रा के कूटनीतिक निहितार्थ

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पांच देशों की विदेश यात्रा के कूटनीतिक निहितार्थ भारत के लिए महत्वपूर्ण @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पांच देशों के हालिया विदेश दौरे के कई बड़े कूटनीतिक, आर्थिक, सामरिक और राजनीतिक मायने हैं। क्योंकि मई 2026 में उनका यूएई, नीदरलैंड, स्वीडन, नॉर्वे और इटली का दौरा ऐसे समय हो रहा है, जब दुनिया ऊर्जा संकट, ईरान युद्ध, सप्लाई चेन अस्थिरता और नए वैश्विक ध्रुवीकरण से गुजर रही है। लिहाजा, पीएम मोदी का यह विदेश दौरा केवल औपचारिक यात्रा नहीं, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा, वैश्विक शक्ति संतुलन, निवेश आकर्षण, तकनीकी साझेदारी, और भारत की उभरती महाशक्ति छवि को मजबूत करने की बहुस्तरीय रणनीतिक कवायद माना जा रहा है।  पहला, ऊर्जा सुरक्षा सबसे बड़ा लक्ष्य है, क्योंकि भारत दुनिया का बड़ा तेल आयातक देश है। ईरान संकट और पश्चिम एशिया में तनाव के कारण तेल कीमतें बढ़ रही हैं। ऐसे समय में यूएई दौरा भारत की ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने का प्रयास माना जा रहा है। लिहाजा भारत और यूएई के बीच रणनीतिक पेट्रोलियम भंडारण, एलपी...