इंडिया गठबंधन की बैठक के राजनीतिक मायने समझिए

इंडिया गठबंधन की बैठक के राजनीतिक मायने समझिए
@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

विगत दो-तीन वर्षों में कांग्रेस की सियासी विसात पर अपना अपना-सबकुछ लुटा-पिटा देने के बाद इंडिया (INDIA) गठबंधन के सहयोगियों की जो "नई दिल्ली बैठक" हुई, उसके राजनीतिक मायने कांग्रेस के लिए बेहद फायदेमंद साबित हुए। क्योंकि इस बैठक में पहली बार नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी की आवाज ध्यान से सुनी गई और उनके नेतृत्व को तथा उनकी पार्टी को गाहे-बगाहे चुनौती देने वाले क्षेत्रीय दलों के सुरमा भोपाली नेता दबी जुबान में अपनी भावना प्रकट करने को अभिशप्त हुए। खासकर नेशनल कांफ्रेंस के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला, सपा प्रमुख अखिलेश यादव को छोड़कर।
इसलिए यह बैठक केवल एक नियमित विपक्षी बैठक तक सीमित नहीं रही, क्योंकि यह बैठक ऐसे समय हुई, जब कई सहयोगी दलों और कांग्रेस के बीच मतभेदों की बढ़ती-घटती खबरें सामने आई थीं, इसलिए इसके संदेश पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। मिली जानकारी के अनुसार, 8 जून को इंडिया (INDIA) गठबंधन की बैठक में लगभग 23 दलों के राजनेता शामिल हुए। बैठक में विपक्षी दलों ने अपनी एकजुटता दिखाने और आगे की राजनीतिक रणनीति पर चर्चा की। प्राप्त रिपोर्टों के अनुसार, बैठक में लगभग 23 विपक्षी दलों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया।जिनमें मल्लिकार्जुन खरगे, राहुल गांधी, सोनिया गांधी, ममता बनर्जी, अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव, उमर अब्दुल्ला, महबूबा मुफ्ती, सुप्रिया सुले के अलावा प्रमुख वामपंथी दलों के अनेक नेता उपस्थित रहे। 

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने केंद्र सरकार की नीतियों, विदेश नीति और मतदाता सूची पुनरीक्षण (SIR) से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाया। जबकि विपक्षी दलों ने संसद और सड़क दोनों स्तरों पर समन्वित आंदोलन चलाने तथा राष्ट्रीय मुद्दों पर साझा रुख अपनाने पर चर्चा की। साथ ही, 2029 लोकसभा चुनाव की तैयारी, विपक्षी एकता और गठबंधन के भविष्य की दिशा भी बैठक के एजेंडे में शामिल रही। 

बैठक के दौरान मतदाता सूची पुनरीक्षण और चुनावी प्रक्रिया से जुड़े सवाल पर मंथन हुआ। फिर केंद्र सरकार की नीतियों के खिलाफ संयुक्त रणनीति बनाई गई और संसद में विपक्षी दलों के बेहतर समन्वय की आवश्यकता पर बल दिया गया। इसके अलावा, विभिन्न राज्यों में विपक्षी दलों के बीच तालमेल और राजनीतिक सहयोग होने की पुष्टि की गई। 

वहीं, इस बैठक की कतिपय चुनौतियां भी सामने आईं, क्योंकि जहां तमिलनाडु में सत्ता से बेदखल हुई DMK ने कांग्रेस से नाराजगी होने के चलते इस बैठक से दूरी बनाई, जिससे गठबंधन के भीतर मतभेदों की चर्चा तेज रही। वहीं, आप के सुप्रीमो अरबिंद केजरीवाल की अनुपस्थिति भी चर्चा में रही। जबकि कुछ अन्य सहयोगी दलों की भूमिका और भागीदारी को लेकर भी सवाल बने रहे।

जहां तक इंडिया गठबंधन की इस बहुप्रतीक्षित बैठक के राजनीतिक मायने की बात है तो यह बैठक लोकसभा चुनाव 2024 के बाद विपक्ष की सबसे महत्वपूर्ण गैर-संसदीय बैठकों में से एक मानी जा रही है। जिसके माध्यम से विपक्ष ने संदेश देने की कोशिश की कि मतभेदों के बावजूद भाजपा के खिलाफ साझा मंच अभी कायम है। वहीं, भाजपा ने DMK की अनुपस्थिति और अन्य अंतर्विरोधों को लेकर गठबंधन की एकता पर सवाल उठाए हैं। इस बैठक के सबसे बड़े राजनीतिक निष्कर्ष निम्नलिखित हैं:- 

पहला, INDIA गठबंधन अभी समाप्त नहीं हुआ है: सबसे बड़ा संदेश यही रहा कि तमाम मतभेदों, चुनावी झटकों और सहयोगी दलों की नाराज़गी के बावजूद विपक्षी दलों ने एक साझा मंच बनाए रखने का निर्णय लिया। 23 दलों की भागीदारी ने कांग्रेस को यह कहने का अवसर दिया कि गठबंधन अभी भी प्रासंगिक है। दूसरा, 2029 की तैयारी अभी से शुरू हो गई: बैठक का प्रमुख उद्देश्य केवल वर्तमान राजनीतिक मुद्दों पर प्रतिक्रिया देना नहीं था, बल्कि 2029 लोकसभा चुनाव के लिए दीर्घकालिक रणनीति तैयार करना भी था। विपक्ष भाजपा के विरुद्ध एक व्यापक राष्ट्रीय नैरेटिव गढ़ने की कोशिश में दिखा। 

तीसरा, कांग्रेस फिर से समन्वयक की भूमिका में: बैठक से यह संकेत मिला कि कांग्रेस गठबंधन की धुरी बनी रहना चाहती है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने विपक्षी एकता पर जोर दिया और केंद्र सरकार के विरुद्ध साझा संघर्ष का आह्वान किया। चौथा, गठबंधन की कमजोरी भी उजागर हुई: M. K. Stalin की DMK और Arvind Kejriwal की AAP का बैठक से दूर रहना बताता है कि विपक्षी एकता अभी भी कई अंतर्विरोधों से घिरी हुई है। 

राजनीतिक विश्लेषक बताते हैं कि इस बैठक का बिहार की राजनीति पर प्रभाव पड़ेगा, क्योंकि राजद नेता तेजस्वी यादव को राष्ट्रीय मंच मिला। बैठक में Tejashwi Yadav की मौजूदगी ने यह संदेश दिया कि वे केवल बिहार तक सीमित नेता नहीं, बल्कि राष्ट्रीय विपक्ष के प्रमुख चेहरों में शामिल हैं। वहीं, बिहार चुनाव में विपक्षी एकता का संदेशभी गया। ऐसे में यदि कांग्रेस, राजद और वाम दल तालमेल बनाए रखते हैं तो बिहार में NDA के खिलाफ विपक्षी चुनौती अपेक्षाकृत मजबूत रह सकती है।

वहीं, जाति और सामाजिक न्याय की राजनीति को भी बल मिला। क्योंकि राहुल गांधी और तेजस्वी यादव पिछले कुछ समय से सामाजिक न्याय, जातीय गणना और प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दों को साथ उठाते रहे हैं। बैठक से संकेत मिला कि यह विपक्ष का प्रमुख राजनीतिक एजेंडा बना रह सकता है। जहां तक 2029 के लोकसभा चुनाव पर संभावित प्रभाव की बात है तो इसका सकारात्मक पक्ष यह रहा कि भाजपा के विरुद्ध एक साझा राष्ट्रीय मंच बना रहता है। वहीं, संसदीय मुद्दों पर समन्वय बढ़ सकता है। साथ ही क्षेत्रीय दलों और कांग्रेस के बीच संवाद कायम रहने की संभावना बनी रहती है। वहीं, जहां तक चुनौतियों की बात है तो सीट बंटवारा सबसे बड़ी समस्या रहेगा। क्योंकि कई राज्यों में सहयोगी दल एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी हैं। वहीं, DMK और AAP जैसी पार्टियों की दूरी गठबंधन की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगाती है। 

निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि इस बैठक का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक संदेश यह रहा कि INDIA गठबंधन ने अपने अस्तित्व और प्रासंगिकता का प्रदर्शन करने की कोशिश की। लेकिन यह भी स्पष्ट हुआ कि विपक्ष की सबसे बड़ी चुनौती भाजपा नहीं, बल्कि अपने भीतर की एकता बनाए रखना है। बिहार में इसका तात्कालिक लाभ महागठबंधन को मिल सकता है, जबकि 2029 के लिए यह बैठक विपक्षी पुनर्गठन की शुरुआत मानी जा सकती है—हालांकि सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि सहयोगी दल भविष्य में अपने मतभेद कितनी प्रभावी ढंग से सुलझा पाते हैं।

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