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क्या टीएमसी-ईडी विवाद का पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव पर प्रभाव पड़ेगा? समझिए सियासी मायने

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क्या टीएमसी-ईडी विवाद का पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव पर प्रभाव पड़ेगा? समझिए इसके सियासी मायने  @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के दृष्टिगत राज्य में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) और प्रमुख विपक्षी पार्टी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) जो केंद्र में सत्तारूढ़ है, के बीच जिस तरह की सियासी जंग छिड़ी हुई है; केंद्र व राज्य की प्रशासनिक मिशनरियों के दुरूपयोग की बातें सुनी जा रही हैं, उससे साफ है कि दिल्ली की तत्कालीन सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी (आप) के मुखिया अरविंद केजरीवाल की ही तरह पश्चिम बंगाल की मौजूदा मुखिया ममता बनर्जी को उनके पद से हटाकर ही भाजपा रहेगी।  यही वजह है कि भाजपा ने मशहूर चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर को शह प्रदान करने वाली कंपनी आई-पैक की नकेल कसने का निश्चय किया है और अपनी प्रशासनिक प्रभाव वाली मिशनरी ईडी को उसके पीछे लगा दिया है, जैसा कि आरोपी लगते आये हैं। तभी तो टीएमसी और ईडी के बीच कोयला तस्करी से जुड़े आई-पैक छापों पर विवाद तेज हो गया है, जहां ममता बनर्जी ने केंद्रीय एजेंसी पर चुनावी डेटा चोरी का आर...

तीखी बात: अमेरिका के इशारे पर न थिरकने वाले देश कीमत चुकाने के लिए तैयार रहें!

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तीखी बात: अमेरिका के इशारे पर न थिरकने वाले देश कीमत चुकाने के लिए तैयार रहें! @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक अंतर्राष्ट्रीय जगत में आर्थिक और तकनीकी दृष्टिकोण से संपन्न अमेरिका अपनी 'डीप स्टेट खलनीति' के बल पर दुनिया का दादा बन चुका है। चूंकि जी-7 के देश उसके मजबूत हाथ हैं, इसलिए ब्रिक्स देशों की औकात उससे खुलेआम उलझने की आजतक नहीं बन पाई है। आखिर पहले भारत के पास-पड़ोस में, फिर ईरान में और अब बेनेज़ुएला के दास्तान जो चुगली कर रही हैं, उसके वैश्विक मायने तो यही हैं। अब अगला नम्बर शायद कम्बोडिया का आएगा, जिसे ट्रंफ ने ताजा धमकी दी है। देखा जाए तो मेक अमेरिका ग्रेट अगेन के स्वप्नद्रष्टा डॉनल्ड ट्रंफ उनकी मुद्रा को चुनौती दिलवाने वाले, यदा कदा उनको आंखें दिखाने वाले रूस-चीन के मजबूत समर्थकों के एक एक कर रीढ़ तोड़ने और इसी झांसे में जांबाज भारत को धमकाकर अपने खेमे में मिलाने के लिए सधी चालें चलना शुरू कर चुके हैं। डीप स्टेट से जुड़े लोगों की मानें तो आगे अमेरिका अभी बहुत कुछ करने वाला है। इस बात का संकेत कभी न्यूयॉर्क के महापौर ममदानी और भारतीय-अमेरिकी आश...

दुनियादारी: अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की कथनी व करनी में अंतर के वैश्विक मायने

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अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की कथनी व करनी से बचकर रहें विकासशील देश @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की कथनी और करनी में वैश्विक स्तर पर कतिपय महत्वपूर्ण अंतर दिखता है, जो खुद अमेरिका फर्स्ट नीति को ही प्रभावित करता है। उनकी आक्रामक बयानबाजी अक्सर प्रत्यक्ष सैन्य या आर्थिक कार्रवाइयों से मेल खाती है, लेकिन यह वैश्विक स्थिरता को भी चुनौती देती है। इससे सहयोगी देशों में अनिश्चितता बढ़ती है और प्रतिद्वंद्वी शक्तियां मजबूत होती हैं। इसलिए उनकी कथनी और करनी के अंतर को समझकर ही अपने अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा विभिन्न देश कर सकते हैं, अन्यथा अमेरिकी लाभ के शिकार बनते देर नहीं लगेगी। अचरज की बात तो यह है कि दुनिया को शांति का संदेश देने वाले ट्रंफ ही अब 'युद्ध' की अटकलों के सबसे बड़े पर्याय बनते प्रतीत होने लगे हैं। ट्रंफ की कथनी और करनी के कुछ प्रमुख उदाहरण इस प्रकार हैं- पहला, ट्रंप ने वेनेजुएला पर बड़े पैमाने पर हमले का दावा किया और राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को पकड़ने की बात कही, जो सोशल मीडिया पर साझा की गई। दूसरा,...

यक्ष प्रश्न: आखिरकार अमेरिका की हस्तक्षेपवादी राजनीति से कैसे सुरक्षित रहेंगे उसके प्रतिद्वंद्वी देश?

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आखिरकार अमेरिका की हस्तक्षेपवादी राजनीति से कैसे सुरक्षित रहेंगे उसके प्रतिद्वंद्वी देश? यक्ष प्रश्न! @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक समकालीन रमणीक जनतांत्रिक दुनिया अमेरिकी वर्चस्व और उसकी समर्थित हिंसक हस्तक्षेपवादी राजनीति से तभी ज्यादा महफूज़ हो सकती है, जब शक्ति-संतुलन बहुध्रुवीय होगा, अंतरराष्ट्रीय क़ानून को वास्तविक दाँत मिलेंगे, और वैश्विक दक्षिण यानी ग्लोबल साउथ के देश परस्पर मिलकर वैकल्पिक संस्थागत ढांचे खड़े करेंगे। ऐसा इसलिए कि केवल नैतिक अपील या यूएनओ की प्रतीकात्मक निंदा से, जैसा कि यूक्रेन, गाजा और वेनेज़ुएला पर हालिया हमले में उसका गैरजिम्मेदाराना रोल दिखा, स्थितियाँ नहीं बदलेंगी। इसलिए यक्ष प्रश्न है कि आखिरकार अमेरिका की हस्तक्षेपवादी राजनीति से कैसे सुरक्षित रहेंगे उसके प्रतिद्वंद्वी देश? इसलिए खतरे की असल प्रकृति को समझना पड़ेगा, फिर रूस, चीन, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, ईरान, उत्तर कोरिया, कम्बोडिया, क्यूबा, मेक्सिको आदि देशों को परस्पर मिलकर अमेरिकी आपराधिक प्रवृति को हतोत्साहित करना होगा। इस निमित्त चीन को भी अपनी विस्तारवादी नीति और ईरा...

जनहितैषी सुझाव को शिकायत समझने की भूल न करें, अपेक्षित बदलाव के वाहक बनें

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* जनहितैषी सुझाव को शिकायत समझने की भूल न करें, अपेक्षित बदलाव के वाहक बनें * नववर्ष की सचेष्ट मंगलकामनाएं, अहर्निश शुभकामनाएं! @ अनुभव की बात/आईएएस डॉ दिनेश चंद्र सिंह, जिलाधिकारी, जौनपुर, उत्तरप्रदेश स्वार्थपरक महाभारत के दौरान कुरुक्षेत्र के मैदान में जीवन जगत के सारथी भगवान श्रीकृष्ण, महान धनुर्धर अर्जुन के मोहपाश को तोड़ने के लिए कर्मयोग का उपदेश देते हुए एक बार कहते हैं कि "कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन" अर्थात आपका अधिकार केवल कर्म Sang में है, उसके फल में कभी नहीं। पुनः स्पष्ट करते हैं कि "मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि:" यानी कर्म के फल के लिए कभी प्रेरित मत हो, और न ही अकर्म (निष्क्रियता) में तुम्हारी आसक्ति हो। इस। प्रकार भारत ही नहीं बल्कि देश दुनिया के कर्मयोगियों के लिए यह आदर्श व अनुकरणीय उक्ति बन गई है। सर्वप्रथम, ॐ नमः शिवाय। जनपद जौनपुर, उत्तरप्रदेश के सभी अधिकारियों एवं कर्मचारियों के लिए नववर्ष 2026 की हार्दिक शुभकामनाएं। इस ऊर्जान्वित अवसर पर परम पिता परमेश्वर आप सभी को सुख, शांति, समृद्धि युक्त सम्पत्ति, ...

बंगलादेश में हिंदुओं के उत्पीड़न पर आखिर खामोश क्यों हैं दुनिया के लोग?

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बंगलादेश में हिंदुओं के उत्पीड़न पर आखिर खामोश क्यों हैं दुनिया के लोग? @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक भारत के पड़ोसी बांग्लादेश में हिंदुओं पर उत्पीड़न एक लंबे अरसे से चली आ रही समस्या है, जबकि उसके उदय में भारत सरकार की परोक्ष भूमिका रही है। कभी पूर्वी पाकिस्तान कहे जाने वाले बंगलादेश में अक्सर इस्लामिक कट्टरता ब्रेक के बाद मुखर हो जाती है, जो राजनीतिक अस्थिरता के दौरान अमूमन तेज हो जाती है। यह भारत सहित अंतर्राष्ट्रीय चिंता का विषय है और दुनियाभर में अल्पसंख्यक समूह के उत्पीड़न पर संयुक्त राष्ट्र संघ की विफलता का द्योतक है। हाल के दिनों में भारत और बंगलादेश के कूटनीतिक सम्बन्धों पर भी इन बातों का साफ असर महसूस किया जा सकता है। यदि पुरानी बातें छोड़ भी दीं जाएं तो गत वर्ष यानी 2024 में शेख हसीना की सरकार गिरने के बाद से बंगलादेश में हिंदू विरोधी हिंसा में पुनः उछाल आया है, जिसमें मंदिरों पर हमले, घरों में लूटपाट और हत्याएं शामिल हैं। इस पर भारत सरकार और अंतरराष्ट्रीय समुदाय की महज खानापूर्ति वाली प्रतिक्रिया से वहां हिंदुओं पर संकट गहराता जा रहा है। इससे भा...

नया कोल्ड वार क्या है? किनके बीच चल रहा है? इसमें भारत किस भूमिका में है?

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नया कोल्ड वार क्या है? किनके बीच चल रहा है? इसमें भारत किस भूमिका में है? @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार द्वितीय विश्व युद्ध की विजय के बाद अमेरिका और सोवियत संघ के बीच छिड़े शीत युद्ध और इसके वार-पलटवार जैसे युद्धगत प्रभावों से हमलोग वाकिफ हैं। इस दौरान यूएसए और यूएसएसआर की खेमेबाजी भी जगजाहिर रही, जिससे दुनिया के कमजोर देशों के कुछ कुछ हित भी सधे। हालांकि 1990 के दशक में सोवियत संघ के बिखराव के बाद यह खत्म हो गया। लेकिन अमेरिका की बढ़ती वैश्विक चौधराहट के बाद 2010 के दशक में अमेरिका-चीन के बीच फिर से एक 'नया शीत युद्ध' शुरू हो गया, जो अब तलक जारी है।  चूंकि यूएसएसआर के पतन में अमेरिकी भूमिका रही, इसलिए उसके अवशेष पर खड़े हुए रूस ने चीन को शह देकर अमेरिका से अपना पुराना हिसाब-किताब चुकता कर लिया। इस प्रकार दुनिया के थानेदार अमेरिका के सामने एक नई सामरिक-आर्थिक चुनौती खड़ी हो गई, लेकिन पारस्परिक होड़ का स्वरूप कुछ कुछ बदल गया। कुलमिलाकर चीन अब अमेरिका के लिए भस्मासुर साबित हो रहा है। इससे अमेरिका भारत की ओर मुड़ा, लेकिन भारतीय नेतृत्व की सतर्कता की वजह से 2025 ...