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रक्षाबंधन के उदात्त सनातनी भाव में अंतर्निहित शाश्वत सांसारिक मायने को ऐसे समझिए

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रक्षाबंधन के उदात्त सनातनी भाव में अंतर्निहित शाश्वत सांसारिक मायने को ऐसे समझिए @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक ब्राह्मण पर्व 'रक्षाबंधन' न केवल भाई-बहनों, बल्कि पंडित-यजमान के पारस्परिक प्रेम, विश्वास और आपसी सौहार्द का एक अनोखा अवसर है, जहां बहन अपने भाई की कलाई पर और ब्राह्मण अपने यजमान के हाथ, शस्त्र और कारोबारी प्रतिष्ठान पर रक्षा सूत्र बांधकर उनकी शाश्वत सुरक्षा की प्रार्थना करते हैं।  यह एक ऐसा मंगलकामना पर्व है जो सनातनी दूरदर्शिता, पारस्परिक उदारता और रिश्तों के शाश्वत गौरव भाव को अभिव्यक्त करता है। इसके शाश्वत मायने समूची दुनिया के लिए सकारात्मक हैं और इसे समझते ही सनातनी गौरव भाव का बोध होता है। कहा गया है कि यदि आपके विचार अच्छे होंगे तो जीवन-जगत में सबकुछ अच्छा यानी अनुकूल होगा। इसलिए पारस्परिक मानवीय सम्बन्धों, कारोबारी प्रतिस्पर्धा और दो देशों की सीमाओं पर फैलते जा रहे खूनी संघर्ष के परिप्रेक्ष्य में रक्षाबंधन के मायने को समझने और समझाने की जरूरत है।  सच कहूं तो यह पर्व सशक्त लोगों द्वारा निर्बलों की रक्षा करने की प्रेरणा सकल विश्व...

आखिरकार दगाबाज चीन पर भरोसा करके फिर चोट खाने के रिस्क क्यों उठा रहे हैं भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी?

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आखिरकार दगाबाज चीन पर भरोसा करके फिर चोट खाने के रिस्क क्यों उठा रहे हैं भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी? @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक जब भी हमारे देश का कोई प्रधानमंत्री चीन, पाकिस्तान और बंगलादेश जैसे शत्रु देशों से वैश्विक कूटनीति के नाम पर प्रेम और भरोसे के पींगे बढ़ाना चाहता है, या फिर नेपाल, श्रीलंका, मालदीव, म्यांमार या तिब्बतियों पर भारतीयों की गाढ़ी कमाई लुटाता है तो मेरे मन में एक ही सवाल पैदा होता है कि हमारे इन नेताओं को इतिहास का ज्ञान नहीं है, या फिर भौगोलिक सच्चाई से ये नादान हैं। क्या इन्हें उन वीर जवानों और साम्प्रदायिक दंगा, आतंकवाद, नक्सलवाद, संगठित अपराध की भेंट चढ़े आमलोगों व सुरक्षा कर्मियों के चेहरे याद नहीं आते, उनकी विधवाओं और बच्चों, वृद्ध माता पिता आदि की याद नहीं आती, जिनकी असमय मौत का एकमात्र कारण चीन, पाकिस्तान, बंगलादेश या इनका रिंग मास्टर अमेरिका की  विध्वंसक नीतियां रही हैं।  मसलन, यहां पर सवाल भूमि के किसी कब्जाए हुए टुकड़े या सांप्रदायिक मिजाज पर वर्चस्व की मानसिकता का नहीं है, बल्कि उन दुर्भाग्यपूर्ण राजनीतिक-प...

उत्तरकाशी के धराली गांव में आई प्राकृतिक आपदा से धधकते सवाल?

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उत्तरकाशी के धराली गांव में आई प्राकृतिक आपदा से धधकते सवाल? @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक भारत वर्ष में विज्ञान और अध्यात्म का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। बावजूद इसके ब्रेक के बाद यहां आने वाली प्राकृतिक आपदाओं के बारे में सटीक अनुमान लगा पाना अब भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। एआई के अप्रत्याशित विकास के बावजूद शोधकर्ताओं की उदासीनता और  लापरवाही से विषयगत सफलता अभी तक हासिल नहीं की जा सकी है। इसलिए सरकार, निजी उद्यमियों और शोधार्थियों को इस ओर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है। खासकर मौसम विज्ञान और पर्यावरण ज्योतिष के अनुसंधान कर्ताओं को इस ओर ज्यादा फोकस करने की जरूरत है। इससे समय रहते ही हमें सटीक भविष्यवाणी करने में मदद मिलेगी और ऐसी आपदाओं के बाद होने वाली भारी धन-जन की हानि भी रोकने में मदद मिलेगी। और यदि ऐसा संभव हुआ तो यह भारत के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि भी होगी। बताते चलें कि उत्तराखंड राज्य के उत्तरकाशी जनपद के धराली गांव में आई अकस्मात बादल फटने जैसी आपदा प्रकृति और आये दिन बिगड़ते पारिस्थितिकी संतुलन की एक और गंभीर चेतावनी है। चूंकि पर्वतीय प्र...

यक्ष प्रश्न: आखिर देशवासियों के अंदर कैसे जगाया जाएगा स्वदेशी के संकल्प का भाव?

यक्ष प्रश्न:  आखिर देशवासियों के अंदर कैसे जगाया जाएगा स्वदेशी के संकल्प का भाव? @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक भारतवासियों के लिए, खासकर यहां के सत्ता प्रतिष्ठान के लिए, स्वदेशी या विदेशी वस्तुओं को उपयोग में लाए जाने या फिर उसका बहिष्कार किये जाने का सियासी आह्वान कोई नई बात नहीं है, क्योंकि सर्वप्रथम राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने ही आजादी की लड़ाई को धार देने के लिए और अंग्रेजों की आर्थिक कमर तोड़ने के लिए ऐसा प्रासंगिक आह्वान किये जाने की शुरुआत की थी। बाद में यह आह्वान भी एक सियासी हथकंडा बन गया। वहीं, 1990 के दशक में भारतीय अर्थव्यवस्था के उदारीकरण और भूमंडलीकरण के बाद आरएसएस-भाजपा के स्वदेशी आंदोलन का जो हश्र हुआ और इनकी ही बाजपेयी-मोदी सरकारों के द्वारा बहुराष्ट्रीय कम्पनियों से जो प्रेम दिखाया गया, वह भी कोई पुरानी बात नहीं है। लेकिन मौजूदा दौर में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब बार-बार 'लोकल फ़ॉर वोकल' की बात करते हैं तो थोड़ा गम्भीर होना स्वाभाविक है।  इसलिए सवाल उठता है कि आखिर देशवासियों के अंदर कैसे स्वदेशी के संकल्प का भाव जगाया जाएगा, यक्ष प...