सनातन विरोधी भारतीय संविधान में संशोधन की अपेक्षाएं
सनातन विरोधी भारतीय संविधान में संशोधन की अपेक्षाएं @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक भारतीय संविधान के कुछ प्रावधानों को यदि सनातन विरोधी षडयंत्र समझा जाता है तो यह अनायास नहीं है, क्योंकि इसके कई निर्माताओं का सार्वजनिक चरित्र संदिग्ध और हिंदुत्व विरोधी माना जाता रहा है। तत्कालीन नौकरशाहों, न्यायविदों, व उद्योगपतियों में भी ऐसे ही तत्वों की बहुतायत थी, जिससे आजादी के मौलिक उद्देश्य बता आजतक अधूरे हैं। खास बात यह कि भले ही सत्तागत स्वार्थपूर्ति की गरज से तत्कालीन नेताओं ने सांप्रदायिक आधार पर हिन्दुस्तान व पाकिस्तान के विभाजन को स्वीकार कर लिया, लेकिन बाद में वोट बैंक की दृष्टि से जो नीतिगत संवैधानिक शरारत की वह लोकतंत्र के मूलभूत सिद्धांत स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व को मुंह चिढ़ाने वाली प्रतीत हुई। इसके लिए संविधान निर्माता डॉ भीम राव अंबेडकर और आधुनिक भारत के निर्माता जवाहरलाल नेहरू गुट पूरी तरह से जिम्मेदार हैं। ऐसा इसलिए कि अंग्रेजों की फूट डालो और शासन करो वाली जातीय, क्षेत्रीय व धार्मिक नीतियों को स्वतंत्र भारत में हूबहू लागू कर दिया गया। ...