संदेश

आखिर मतदाता सूची की खामियों को कौन और कैसे करेगा दूर?

चित्र
आखिर मतदाता सूची की खामियों को कौन और कैसे करेगा दूर? @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक किसी भी देश में लोकतंत्र की सफलता वहां के नेताओं की नेकनीयती पर ही निर्भर करती है, क्योंकि वहां के जम्बोजेट प्रशासनिक अधिकारियों की फौज पर नियंत्रण प्रायः सत्ताधारी नेताओं का ही होता है। हमारे चतुर राजनेतागण यदि दूरगामी सियासी हितों की पूर्ति के लिए विपक्ष को भी साध कर चलें तो सोने पर सुहागा। यानी चित्त भी उनकी और पट्ट भी उन्हीं जैसों की। क्योंकि सत्ता पक्ष और विपक्ष की कुर्सियां तो प्रायः उन्हीं के बीच बदलती रहती हैं। यही वजह है कि पूरे प्रशासन पर कभी प्रत्यक्ष रूप से तो कभी अप्रत्यक्ष/परोक्ष रूप से उन्हीं लोगों का पूरा नियंत्रण होता है।  हालांकि, चतुरसुजान नेताओं और दृढ़प्रतिज्ञ अधिकारियों के बीच व्यक्तिगत हितों की पूर्ति हेतु अनवरत धींगामुश्ती चलती रहती है, जिसमें कभी नेता तो कभी अधिकारी एक-दूसरे पर भारी पड़ते रहते हैं। सच कहूं तो इसी चक्कर में कभी-कभी दोनों को अपनी-अपनी कुर्सियां तक गंवानी पड़ती है। आपने देखा होगा कि चुनावी दिनों में चुनाव आचार संहिता लागू होते ही प्...

रंगपर्व होली के धार्मिक और वैज्ञानिक महत्व को ऐसे समझिए

चित्र
रंगपर्व होली के धार्मिक और वैज्ञानिक महत्व को ऐसे समझिए @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार पर्व-त्यौहारों के देश भारत वर्ष में रंग पर्व होली का त्यौहार प्रमुखता से मनाया जाता है। यह सामाजिक सद्भावना बढ़ाने का लोकपर्व है। इसे वसंतोत्सव भी कहा जाता है। इस त्यौहार का सांस्कृतिक और आर्थिक महत्व भी है। इसके देशज पहचान को समझने के लिए हमें विभिन्न राज्यों के प्रचलनों पर गौर करना होगा। उनके स्थानीय भावों को वहां प्रचलित गवनई के माध्यम से समझना होगा। शास्त्रों में इसे शूद्रों अर्थात सेवकों का त्यौहार भी कहा जाता है। इस दिन नए सफेद वस्त्र पहनने और तरह तरह के पकवान खाने का भी रिवाज है। यूँ तो ब्रज की होली पूरे देश में प्रसिद्ध है। बरसाना की लठमार  होली की बात ही कुछ और है। राधा-कृष्ण को भी इस पर्व से जोड़ दिया गया है ताकि सांसारिक प्राणियों को उनका सुख मिलता रहे। वहीं, खान-पान के नजरिए से मालपुआ इस पर्व का सुप्रसिद्ध पकवान है, जिसको पकाने के तौर तरीके क्षेत्र के हिसाब से बदल जाते हैं। ठंडई इस दिन का प्रचलित पेय है जो भांग से बनती है। इसमें मेवा और दूध भी डाले जाते हैं। इन सब...

विदेशी आक्रांताओं के शुभचिंतकों को 'सनातन भूमि' में रहने का हक नहीं, समझे सरकार!

चित्र
विदेशी आक्रांताओं के शुभचिंतकों को 'सनातन भूमि' में रहने का हक नहीं, समझे सरकार! करे कार्रवाई! @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक सनातन भूमि भारतवर्ष, जिसे जम्बूद्वीप, आर्यावर्त, आसेतु हिमालय आदि विभिन्न नामों से पुकारा गया है, में मुस्लिम आक्रमणकारियों और ब्रिटिश आतताई अधिकारियों के महिमामंडन का जो सियासी होड़ जब-तब मची रहती है, वह दुर्भाग्यपूर्ण है। सवाल है कि इनसे जुड़े विभिन्न प्रतीक चिन्हों-स्मारकों आदि, इनके नाम पर बसाए गए गांवों-शहरों, नामांकित सड़कों या विभिन्न संस्थानों को मिटा क्यों नहीं दिया जाता, क्योंकि ये सनातन भूमि पर रिसते घाव की मानिन्द हैं।  यक्ष प्रश्न यह भी है कि आज इनकी जरूरत क्या है, किनको है और क्यों है? और यदि है तो फिर ऐसे देशद्रोहियों की यहां जरूरत है? यदि बाबर, अकबर, औरंगजेब जैसे क्रूर मुस्लिम शासकों या जनरल डायर जैसे क्रूर ब्रिटिश अधिकारियों या फिर ओसामा बिन लादेन, कसाब जैसे क्रूर आतंकवादियों का, पाकिस्तान-बंगलादेश जैसे फिरकापरस्त ताकतों के शुभचिंतक यहां हैं तो भारतीय प्रशासन का यह पहला कर्तव्य है कि राष्ट्रहित में इनकी शिनाख्...

आखिर कब तक जारी रहेंगे रियल एस्टेट के गोरखधंधे?

चित्र
आखिर कब तक जारी रहेंगे रियल एस्टेट के गोरखधंधे? @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक चाहे भूमि हो या सोना, इनकी कीमत अमूमन इसलिए बढ़ती रहती है, क्योंकि इसमें देश-दुनिया के 'धनपशुओं' का निवेश होता है। यहां पर 'धनपशुओं' का अभिप्राय उन नेताओं, उद्यमियों, अधिकारियों, सफेदपोश अपराधियों और उन मध्यमवर्गीय पेशेवरों के समझदारी भरे गठजोड़ से है, जो अवैधानिक रूप से खूब सम्पत्ति जोड़ते हैं और अपने नेटवर्क को लाभान्वित करते हैं। ऐसे लोग दुनियावी लोकतंत्र और संवैधानिक कानूनों को अपने आर्थिक हितों के मुताबिक समय समय पर मोड़वाते रहते हैं।  मसलन, इस खेल में देशी-विदेशी पूंजीपतियों और इन जैसों की एक मजबूत लॉबी होती है, जिनकी लक्षित लॉबिंग से अक्सर आम आदमी के दूरगामी हितों को कुचला जाता है। देश-दुनिया में जारी नई आर्थिक नीतियों ने इन्हें बेलगाम कर दिया है। क्रिप्टो करेंसी जैसी समानांतर अंतरराष्ट्रीय मुद्रा का बढ़ता प्रचलन और अधिकतर कैश लेन-देन में चलने वाले इनके बड़े-बड़े धंधे बहुत कुछ बयां कर जाते हैं। कहीं टैरिफ वार और कभी तस्करी से इन्हीं जैसों को तो फायदा पहुंचता है।...

बिहार में हिंदुत्व की समां बंधने से गैर भाजपा सियासी दलों की बढ़ी बेचैनी

चित्र
बिहार में हिंदुत्व की समां बंधने से सियासी दलों की बेचैनी बढ़ी @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक बिहार में विधानसभा चुनाव इसी वर्ष अक्टूबर-नवम्बर महीने में होंगे। हालांकि, उससे महीनों पहले राज्य में धार्मिक और राजनीतिक सरगर्मियां तेज हो चुकी हैं। कहीं एनडीए और यूपीए एक दूसरे के खिलाफ ताल ठोकते प्रतीत हो रहे हैं तो कहीं उनके गठबंधन के अपने ही साथी एक-दूसरे को रणनीतिक मात देते हुए अपनी सीटें बढ़ाने को लेकर बेताब नजर आ रहे हैं। इस नजरिए से भाजपा-जदयू की धींगामुश्ती और राजद-कांग्रेस की अंदरूनी  कुश्ती के बीच चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी सबके बने बनाए खेल बिगाड़ रही है।  एक तरफ जहां धर्मनिरपेक्ष और सामाजिक न्याय के वोटों का बिखराव तय माना जा रहा है, वहीं हिंदुत्व का नया जनज्वार यहां भी पैदा होती दिखाई दे रही है। इससे जदयू के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कम, लेकिन पूर्व उपमुख्यमंत्री तजस्वी यादव और उनके समर्थक ज्यादा परेशान हैं। इस बीच बागेश्वर धाम के धीरेंद्र शास्त्री जब अपने हिंदू राष्ट्र के एजेंडे के साथ बिहार पहुंचे, तो रही सही कसर पूरी ...

आखिर कैसे रुकेगा निजी अस्पतालों में मरीजों का 'शोषण', जिम्मेदार कौन?

चित्र
आखिर कैसे रुकेगा निजी अस्पतालों में मरीजों का 'शोषण', जिम्मेदार कौन? @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक चिकित्सा पेशा या स्वास्थ्य व्यवसाय कोई सामान्य पेशा नहीं है, बल्कि यह व्यक्तिगत जीवन और जनस्वास्थ्य से जुड़ा एक अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य है, जिसमें थोड़ी-सी भी लापरवाही किसी के जीवन पर भारी पड़ सकती है। वहीं, अपना या अपने परिवार का इलाज करवाने के चक्कर में यदि कोई व्यक्ति या परिवार लूट-पिट जाए तो यह भी प्रशासनिक नजरिए से अनुचित है। और ऐसे ही जरूरतमंद लोगों के पक्ष में सरकार और समाजसेवी संस्थाओं दोनों को अवश्य खड़ा होना चाहिए।  यही वजह है कि जनस्वास्थ्य से जुड़े चिकित्सा पेशा या स्वास्थ्य व्यवसाय को सिर्फ कारोबारी लाभ के नजरिए से नहीं देखा जा सकता है, बल्कि यह एक सामाजिक और नैतिक उत्तरदायित्व से जुड़ा हुआ विषय (पेशा) है, जिसे जनसेवा की भावना से किया जाए तो सरकार और संस्था दोनों को यश मिलेगा। भारतीय सभ्यता व संस्कृति तो शुरू से ही 'सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे संतु निरामया' की पक्षधर रही है। लेकिन देश में लागू नई आर्थिक नीतियों से उपजी नैतिक व कानूनी म...

क्या वाकई अमेरिका बदल रहा है या फिर कोई नया स्वांग रच रहा है?

चित्र
क्या वाकई अमेरिका बदल रहा है या फिर अपनी कमजोरी छिपाने के लिए नया स्वांग रच रहा है? @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक दुनिया का थानेदार अमेरिका बदल रहा है! उसकी विदेश नीति बदल रही है! इससे दुनियाभर के देश प्रभावित हो रहे हैं! चूंकि अब वह 'चंद्रायण व्रत' कर चुका है! इसलिए युद्ध नहीं शांति की बात कर रहा है! वह तीसरा विश्व युद्ध टालना चाहता है, इसलिए अपने यूरोपीय सहयोगियों को सद्बुद्धि बांट रहा है! इससे नाटो के सदस्य देशों में खलबली मची हुई है! यूरोपीय संघ भी परेशान है! सवाल है कि क्या वाकई अमेरिका बदल रहा है या फिर अपनी कमजोरी छिपाने के लिए नया स्वांग रच रहा है? भारत में एक कहावत है कि नौ सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली। मतलब स्वभाव से हिंसक प्राणी, अहिंसक होने का नाटक रच रहा है। इसकी को चंद्रायण व्रत करार दिया जाता है। अमेरिका के संदर्भ में यही बात लागू होती है। हालांकि, आपको यह जानकर हैरत होगी कि यह सब कुछ अनायास नहीं हो रहा है बल्कि इसके पीछे चतुर अमेरिकी लोगों, उनके अमेरिकी प्रशासन और वहां के रिपब्लिकन नेताओं की एक सोची-समझी रणनीति काम कर रही है। दरअ...