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विदेशी आक्रांताओं के शुभचिंतकों को 'सनातन भूमि' में रहने का हक नहीं, समझे सरकार!

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विदेशी आक्रांताओं के शुभचिंतकों को 'सनातन भूमि' में रहने का हक नहीं, समझे सरकार! करे कार्रवाई! @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक सनातन भूमि भारतवर्ष, जिसे जम्बूद्वीप, आर्यावर्त, आसेतु हिमालय आदि विभिन्न नामों से पुकारा गया है, में मुस्लिम आक्रमणकारियों और ब्रिटिश आतताई अधिकारियों के महिमामंडन का जो सियासी होड़ जब-तब मची रहती है, वह दुर्भाग्यपूर्ण है। सवाल है कि इनसे जुड़े विभिन्न प्रतीक चिन्हों-स्मारकों आदि, इनके नाम पर बसाए गए गांवों-शहरों, नामांकित सड़कों या विभिन्न संस्थानों को मिटा क्यों नहीं दिया जाता, क्योंकि ये सनातन भूमि पर रिसते घाव की मानिन्द हैं।  यक्ष प्रश्न यह भी है कि आज इनकी जरूरत क्या है, किनको है और क्यों है? और यदि है तो फिर ऐसे देशद्रोहियों की यहां जरूरत है? यदि बाबर, अकबर, औरंगजेब जैसे क्रूर मुस्लिम शासकों या जनरल डायर जैसे क्रूर ब्रिटिश अधिकारियों या फिर ओसामा बिन लादेन, कसाब जैसे क्रूर आतंकवादियों का, पाकिस्तान-बंगलादेश जैसे फिरकापरस्त ताकतों के शुभचिंतक यहां हैं तो भारतीय प्रशासन का यह पहला कर्तव्य है कि राष्ट्रहित में इनकी शिनाख्...

आखिर कब तक जारी रहेंगे रियल एस्टेट के गोरखधंधे?

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आखिर कब तक जारी रहेंगे रियल एस्टेट के गोरखधंधे? @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक चाहे भूमि हो या सोना, इनकी कीमत अमूमन इसलिए बढ़ती रहती है, क्योंकि इसमें देश-दुनिया के 'धनपशुओं' का निवेश होता है। यहां पर 'धनपशुओं' का अभिप्राय उन नेताओं, उद्यमियों, अधिकारियों, सफेदपोश अपराधियों और उन मध्यमवर्गीय पेशेवरों के समझदारी भरे गठजोड़ से है, जो अवैधानिक रूप से खूब सम्पत्ति जोड़ते हैं और अपने नेटवर्क को लाभान्वित करते हैं। ऐसे लोग दुनियावी लोकतंत्र और संवैधानिक कानूनों को अपने आर्थिक हितों के मुताबिक समय समय पर मोड़वाते रहते हैं।  मसलन, इस खेल में देशी-विदेशी पूंजीपतियों और इन जैसों की एक मजबूत लॉबी होती है, जिनकी लक्षित लॉबिंग से अक्सर आम आदमी के दूरगामी हितों को कुचला जाता है। देश-दुनिया में जारी नई आर्थिक नीतियों ने इन्हें बेलगाम कर दिया है। क्रिप्टो करेंसी जैसी समानांतर अंतरराष्ट्रीय मुद्रा का बढ़ता प्रचलन और अधिकतर कैश लेन-देन में चलने वाले इनके बड़े-बड़े धंधे बहुत कुछ बयां कर जाते हैं। कहीं टैरिफ वार और कभी तस्करी से इन्हीं जैसों को तो फायदा पहुंचता है।...

बिहार में हिंदुत्व की समां बंधने से गैर भाजपा सियासी दलों की बढ़ी बेचैनी

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बिहार में हिंदुत्व की समां बंधने से सियासी दलों की बेचैनी बढ़ी @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक बिहार में विधानसभा चुनाव इसी वर्ष अक्टूबर-नवम्बर महीने में होंगे। हालांकि, उससे महीनों पहले राज्य में धार्मिक और राजनीतिक सरगर्मियां तेज हो चुकी हैं। कहीं एनडीए और यूपीए एक दूसरे के खिलाफ ताल ठोकते प्रतीत हो रहे हैं तो कहीं उनके गठबंधन के अपने ही साथी एक-दूसरे को रणनीतिक मात देते हुए अपनी सीटें बढ़ाने को लेकर बेताब नजर आ रहे हैं। इस नजरिए से भाजपा-जदयू की धींगामुश्ती और राजद-कांग्रेस की अंदरूनी  कुश्ती के बीच चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी सबके बने बनाए खेल बिगाड़ रही है।  एक तरफ जहां धर्मनिरपेक्ष और सामाजिक न्याय के वोटों का बिखराव तय माना जा रहा है, वहीं हिंदुत्व का नया जनज्वार यहां भी पैदा होती दिखाई दे रही है। इससे जदयू के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कम, लेकिन पूर्व उपमुख्यमंत्री तजस्वी यादव और उनके समर्थक ज्यादा परेशान हैं। इस बीच बागेश्वर धाम के धीरेंद्र शास्त्री जब अपने हिंदू राष्ट्र के एजेंडे के साथ बिहार पहुंचे, तो रही सही कसर पूरी ...

आखिर कैसे रुकेगा निजी अस्पतालों में मरीजों का 'शोषण', जिम्मेदार कौन?

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आखिर कैसे रुकेगा निजी अस्पतालों में मरीजों का 'शोषण', जिम्मेदार कौन? @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक चिकित्सा पेशा या स्वास्थ्य व्यवसाय कोई सामान्य पेशा नहीं है, बल्कि यह व्यक्तिगत जीवन और जनस्वास्थ्य से जुड़ा एक अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य है, जिसमें थोड़ी-सी भी लापरवाही किसी के जीवन पर भारी पड़ सकती है। वहीं, अपना या अपने परिवार का इलाज करवाने के चक्कर में यदि कोई व्यक्ति या परिवार लूट-पिट जाए तो यह भी प्रशासनिक नजरिए से अनुचित है। और ऐसे ही जरूरतमंद लोगों के पक्ष में सरकार और समाजसेवी संस्थाओं दोनों को अवश्य खड़ा होना चाहिए।  यही वजह है कि जनस्वास्थ्य से जुड़े चिकित्सा पेशा या स्वास्थ्य व्यवसाय को सिर्फ कारोबारी लाभ के नजरिए से नहीं देखा जा सकता है, बल्कि यह एक सामाजिक और नैतिक उत्तरदायित्व से जुड़ा हुआ विषय (पेशा) है, जिसे जनसेवा की भावना से किया जाए तो सरकार और संस्था दोनों को यश मिलेगा। भारतीय सभ्यता व संस्कृति तो शुरू से ही 'सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे संतु निरामया' की पक्षधर रही है। लेकिन देश में लागू नई आर्थिक नीतियों से उपजी नैतिक व कानूनी म...

क्या वाकई अमेरिका बदल रहा है या फिर कोई नया स्वांग रच रहा है?

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क्या वाकई अमेरिका बदल रहा है या फिर अपनी कमजोरी छिपाने के लिए नया स्वांग रच रहा है? @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक दुनिया का थानेदार अमेरिका बदल रहा है! उसकी विदेश नीति बदल रही है! इससे दुनियाभर के देश प्रभावित हो रहे हैं! चूंकि अब वह 'चंद्रायण व्रत' कर चुका है! इसलिए युद्ध नहीं शांति की बात कर रहा है! वह तीसरा विश्व युद्ध टालना चाहता है, इसलिए अपने यूरोपीय सहयोगियों को सद्बुद्धि बांट रहा है! इससे नाटो के सदस्य देशों में खलबली मची हुई है! यूरोपीय संघ भी परेशान है! सवाल है कि क्या वाकई अमेरिका बदल रहा है या फिर अपनी कमजोरी छिपाने के लिए नया स्वांग रच रहा है? भारत में एक कहावत है कि नौ सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली। मतलब स्वभाव से हिंसक प्राणी, अहिंसक होने का नाटक रच रहा है। इसकी को चंद्रायण व्रत करार दिया जाता है। अमेरिका के संदर्भ में यही बात लागू होती है। हालांकि, आपको यह जानकर हैरत होगी कि यह सब कुछ अनायास नहीं हो रहा है बल्कि इसके पीछे चतुर अमेरिकी लोगों, उनके अमेरिकी प्रशासन और वहां के रिपब्लिकन नेताओं की एक सोची-समझी रणनीति काम कर रही है। दरअ...

क्या जेलेन्सकी, इंदिरा गांधी की तरह अमेरिकी राष्ट्रपति को करारा जवाब दे पाएंगे?

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तो क्या जेलेन्सकी, इंदिरा गांधी की तरह अमेरिकी राष्ट्रपति को करारा जवाब दे पाएंगे?  @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप और यूक्रेनी राष्ट्रपति जेलेंस्की में जो हालिया तीखी बहस देखी गई है, वह पहली बार नहीं है जब कोई देश अपने हितों के लिए अमेरिका से लड़ा है और अपमानित महसूस किया है। क्योंकि अपने वक्त में यानी 1970 के दशक में भारत की लौह महिला प्रधानमंत्री  इंदिरा गांधी ने भी जाने-अनजाने अमेरिका से सीधी टक्कर ली थी। उन्होंने तब अमेरिकी राष्ट्रपति को भारत के पीएम के तौर पर करारा जवाब दिया था और उन्हें घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया। हालांकि, तब भी अमेरिका ने पाकिस्तान और चीन को भारत के खिलाफ भड़काने की कोशिश की थी, लेकिन इंदिरा गांधी की रणचंडी वाली भूमिका और रूस से अटूट दोस्ती की वजह से किसी की हिम्मत नहीं हुई थी कि वह भारत की ओर आंख तरेर ले। और जब अमेरिका ने ऐसी जुर्रत की तो रूस के डर से सहम गया। इसलिए दुनिया की मीडिया में यह सवाल उठाए जा रहे हैं कि क्या यूक्रेनी राष्ट्रपति ब्लोदिमिर जेलेन्सकी, भारत की पूर्व प्रधानमंत्री स्व. इंद...

बसपा की सियासी दुर्गति के लिए मायावती खुद जिम्मेदार!

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# बसपा की सियासी दुर्गति के लिए मायावती खुद जिम्मेदार! @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक उत्तरप्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री और बहुजन समाज पार्टी की नेत्री सुश्री मायावती भले ही दलित की बेटी हैं, लेकिन जब दलित राजनीति के रथ पर सवार होकर वह सूबाई सत्ता और पार्टी दोनों के शीर्ष तक पहुंचीं तो दौलत पसंद बन गईं। उन्होंने अपनी सारी नीतियों को दौलत बटोरने के ही इर्दगिर्द केंद्रित कर दिया। जिससे दृढ़ स्वभाव की इस महिला नेत्री ने न केवल अकूत धन बटोरीं, बल्कि अपनी पार्टी को भी खूब आगे बढ़ाया। इस क्रम में उन्होंने जायज-नाजायज का ख्याल तक नहीं रखा। क्योंकि दलित समर्थक एक कानून हमेशा उन जैसों की कानूनी ढाल बन जाती है।हालंकि, वक्त का पाशा पलटते ही अब वही दौलत उन जैसी अविवाहित महिला के गले की फांस बन चुका है। बहरहाल वह सत्ताधारी भाजपा के इशारे पर थिरकने को अभिशप्त हैं। कहना न होगा कि जिस बामसेफ ने देश की दलित राजनीति को एक मजबूत प्रशासनिक आधार दिया, उसकी भी मायावती काल में इसलिए एक न चली, क्योंकि परिवार और पार्टी से आगे की सोच-समझ उनमें विकसित ही न हो पाई। दरअसल, बसपा के संस्था...