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आंदोलनकारी केजरीवाल, राजनेता केजरीवाल और कूटनीतिज्ञ केजरीवाल!

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@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक यदि आपने जंतर-मंतर के 'आंदोलनकारी अरविंद केजरीवाल' को देखा है, आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक और दिल्ली के मुख्यमंत्री के रूप में 'राजनेता अरविंद केजरीवाल' को परखा है, तो आपको यह अवश्य समझ में आया होगा कि यह जुनूनी व्यक्तित्व किसी 'कुटनीतिज्ञ केजरीवाल' का नहीं हो सकता है, जो कि राजनैतिक सफलता को स्थायित्व देने की पहली शर्त समझी जाती है।  ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूँ कि जनसमस्याओं की शिनाख्त करने और उसके समाधान हेतु यानी लोकपाल बिल लाने के लिए उनका मिजाज अख्खड़ था और किसी से भी टकराव मोल लेने में वो कभी पीछे नहीं हटे। कुछ यही वजह है कि उनके डिप्लोमैटिक सहयोगी बदलते समय के साथ केजरीवाल के बढ़ते सियासी कद से जलते-भुनते हुए उनका साथ/हाथ दोनों छोड़ते चले गए।  वहीं, कुछ विघ्न-संतोषियों को उन्हें खुद दूर करना पड़ा या अपने भरोसेमंद सहयोगियों के मार्फ़त करवाना पड़ा। किंतु केजरीवाल ने कभी भी गहराई पूर्वक इसकी परवाह नहीं की कि आखिर यह सब क्यों और कैसे हो रहा है? वह तो सिर्फ अपने मातहत चलने वाले लोगों को जोड़ते चले गए और भारत की रा...

आर्टिफिशल इंटेलिजेंस को लेकर विभाजित दुनिया से आखिर कैसे तालमेल बिठायेगा भारत?

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@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक जब मौजूदा दशक में अस्तित्व में आए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से उतपन्न व्यवहारिक चुनौतियों से निपटने के लिए समकालीन विश्व अमेरिका, यूरोप और चीन जैसे तीन मजबूत खेमों में बंट चुका है, तब भारत जैसे निर्गुट खिलाड़ी की भूमिका भी बढ़ जाती है और कुछ नई संभावनाएं भी पैदा होती हैं। इसलिए सवाल उठता है कि आर्टिफिशल इंटेलिजेंस को लेकर लगभग तीन खेमों में बंटी समकालीन दुनिया से आखिर कैसे तालमेल बिठायेगा भारत?  जानकार बताते हैं कि अमेरिका और यूरोप के बीच एक भरोसेमंद पुल बनकर भारत अपनी भावी भूमिका निभा सकता है और इसकी वैश्विक जरूरत भी महसूस की जा रही है। चूंकि यूरोपीय संघ का अगुवा देश फ्रांस भारत का प्रगाढ़ मित्र है, इसलिए यह संभव भी है। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी इस अवसर को समझ चुके हैं और उसी के अनुकूल वर्तमान परिस्थितियों को तैयार भी कर रहे हैं।  जानकार बताते हैं कि साल 2023 में अस्तित्व में आई एआई को लेकर पहला शिखर सम्मेलन उसी वर्ष इंग्लैंड में,  हुआ था, जबकि दूसरा शिखर सम्मेलन 2024 में दक्षिण अफ्रीका में, तीसरा शिखर सम्मेलन 2025 म...

आखिर कौन, कैसे और कबतक पाएगा भीड़ से उतपन्न भगदड़ पर काबू?

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@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर शनिवार की रात प्रयागराज महाकुंभ जाने को उतावली भीड़ ने ऐसी भगदड़ मचाई कि लगभग डेढ़ दर्जन लोगों की जान चली गई, जबकि दर्जनाधिक घायल भी हुए। इस बार भी मृतकों में महिलाओं (10) और बच्चों (3) की संख्या ज्यादा रही, जबकि पुरुषों (2) की संख्या उनसे कम रही। वहीं, दर्जनाधिक घायलों में भी लगभग 14 महिलाएं समेत कुल 25 लोग शामिल हैं। ये महज आंकड़े नहीं हैं, बल्कि हमारी संवेदनाशून्य व्यवस्था की विफलता के नमूने मात्र हैं। ऐसी घटनाओं पर आखिर कौन, कैसे और कबतक काबू पाएगा, यह यक्ष प्रश्न ब्रेक के बाद पुनः समुपस्थित है।  ऐसा इसलिए कि भारत में पिछले कुछ वर्षों में भगदड़ के कई मामले सामने आए हैं। वहीं, इस बार तो महज एक महीने के अंदर ही भगदड़ के दो-दो मामले सामने आ चुके हैं, जो कि प्रशासन के लिए चिंता का विषय है। सवाल है कि जब महाकुंभ की तैयारियों को लेकर उत्तरप्रदेश प्रशासन लगातार डींगें हांक रहा था और केंद्र सरकार अपनी पीठ थपथपा रही थी, तब ऐसी हृदयविदारक घटनाओं का घटित होना उसकी तमाम व्यवस्थाओं पर सवालिया निशान लगा जाता है। सवाल यह...

आखिर भारत का 'असली' दुश्मन कौन?

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@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक जब ओवरसीज कांग्रेस के अध्यक्ष सैम पित्रोदा दलील देते हैं कि भारत को चीन को अपना दुश्मन नहीं मानना चाहिए, तो सवाल पैदा होता है कि आखिर इंडिया गठबंधन के मुख्य घटक समाजवादी पार्टी के संस्थापक अध्यक्ष और तत्कालीन रक्षा मंत्री मुलायम सिंह यादव ने चीन को भारत का दुश्मन नम्बर वन क्यों करार दिया था?  दरअसल, 1962 के भारत-चीन युद्ध से लेकर 2020 के गलवान घाटी हिंसक झड़प तक, क्रमशः उसके पहले या इसके बाद भारत को लेकर चीन के जो अंतर्राष्ट्रीय व्यवहार दिखते आए हैं, उससे तो यही प्रतीत होता है कि चीन भारत का मजबूत दुश्मन है। नेहरू-मोदी की मित्रता की भावना को उसने कुचला है। हालांकि अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों से पता चलता है कि भले ही ईसाईयत और इस्लाम से सम्भाव्य मुकाबले के लिए हिंदुत्व (भारत) को बुद्धत्व (चीन) की जरूरत पड़ेगी, लेकिन इसके लिए दोनों देशों को समझदारी भरी दूरदर्शिता दिखानी पड़ेगी, अन्यथा वैश्विक परिस्थितियों की धर्मांध चक्की में दोनों देश पिसे जाएंगे और युगों-युगों तक पछताएंगे। इसलिए स्वाभाविक सवाल है कि भारत का असली दुश्मन कौन है? तो जवाब ...

दिल्ली की किस्मत 'रेखा' से एनसीआर की अपेक्षाएं

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@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता से न केवल दिल्ली वासियों बल्कि एनसीआर के लोगों की अपेक्षाएं बढ़ चुकी हैं। क्योंकि दिल्ली-एनसीआर के इतिहास में संभवतया यह पहला मौका है जब दिल्ली और उसके पड़ोसी राज्य हरियाणा और उत्तरप्रदेश में भी भाजपा की सरकार है। चूंकि दिल्ली और एनसीआर के शहरों यथा- गाजियाबाद, गौतमबुद्धनगर, फरीदाबाद, गुरुग्राम, रोहतक, सोनीपत आदि में चोली-दामन का सम्बन्ध बन चुका है, इसलिए दिल्ली के मुख्यमंत्री से सबकी सकारात्मक अपेक्षाएं रहती आई हैं।  लिहाजा, अब यह रेखा गुप्ता पर निर्भर करेगा कि हरियाणा-उत्तरप्रदेश की भाजपा सरकारों को साधकर वह दिल्ली-एनसीआर वासियों के दूरगामी हित कितने महत्वपूर्ण कदम उठा पाती हैं। वहीं यदि वह राजस्थान और उत्तराखंड की भाजपा सरकारों को भी साध लें तो दिल्ली-एनसीआर वासियों का ज्यादा भला कर पाएंगी। ध्रुवसत्य है कि जब लोगों की रोजमर्रा की जरूरतें किसी नेता के एजेंडे में शामिल हो जाती हैं तो दोनों का संतुलित विकास होता है। ऐसे में यदि भाजपा और उसके तीनों-चारों मुख्यमंत्री जनहित में 'ग्रेटर दिल्ली' बनाने ...

'सियासी पापों' से जनहित की रक्षा के लिए गठित करनी होगी स्वतंत्र एजेंसी?

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@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक भारत की संसदीय राजनीति एक बार फिर सवालों के घेरे में है। यहां राजनीतिक दलों और निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को प्राप्त बेहिसाब अधिकार के दुरूपयोग की जिस तरह की दुनियावी खबरें मिल रही हैं, उससे पक्ष-विपक्ष दोनों की सियासी भूमिका संदेह के घेरे में है। सुलगता सवाल है कि जब राजनीतिक दलों और उनके द्वारा ही राष्ट्रीयता विरोधी कार्रवाई की जाएगी, राष्ट्रवाद की अवधारणा को मुंह चिढ़ाते हुए जनविरोधी फैसले लिए जाएंगे और कानून बनाए जाएंगे तो फिर इसकी निष्पक्ष जांच कौन करेगा?  चूंकि भारत में जिन दलित, आदिवासी और पिछड़े मतदाताओं का बहुमत है, उनकी कानूनी शिक्षा व राजनीतिक साक्षरता उस स्तर की नहीं है, जो किसी भी लोकतंत्र की सफलता के लिए जरूरी है। इसलिए उन्हें आरक्षण, जातिवाद और साम्प्रदायिकता जैसे मुद्दों पर सियासी समूहों द्वारा बरगलाया जाता है और जनविरोधी-राष्ट्रविरोधी कुकृत्य संपादित किये जाते हैं, इसलिए प्रबुद्ध सिविल सोसाइटी का जगना बदलते वक्त की मांग है, अन्यथा देश को पुनः गुलाम होने से कोई नहीं रोक सकता।  सच कहूं तो जैसे मुगल शासक बहुराष्ट्रीय...

क्या अमेरिका के स्वर्णिम दौर में शेष विश्व को मिल पाएगी तीसरे विश्वयुद्ध से मुक्ति?

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@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक दुनियावी चक्रब्यूह में निरंतर घिरते जा रहे अमेरिका ने जब यौद्धिक 'चंद्रायण व्रत' की बात कही तो सहसा विश्वास नहीं हुआ! वहीं, दुनिया के थानेदार की मजबूरी, दूरदर्शिता और खुदगर्जी भी स्पष्ट महसूस हुई। क्योंकि लगातार किसी न किसी सांसारिक संघर्ष में उलझकर थक-हार चुके देश अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंफ ने अपनी विक्ट्री रैली में विक्ट्री स्पीच देते हुए जो कुछ संकेत दिया, उसका सार-सत्य यही है कि अपने लोगों के बेहतर भविष्य के लिए अमेरिका अब तीसरा विश्व युद्ध नहीं लड़ना चाहता है और इसकी बची-खुची संभावनाओं को भी जल्द खत्म करने की हिमायत करेगा।  इसलिए सवाल उठ रहा है कि क्या अमेरिका के स्वर्णिम दौर में शेष विश्व को तीसरे विश्वयुद्ध से मुक्ति मिल पाएगी? या फिर यह किसी अन्य देश यथा- चीन या रूस के मार्फ़त अन्य देशों पर थोपी जाएगी, जिससे प्रथम विश्वयुद्ध की भांति अमेरिका दूर रहेगा। यूं तो दूसरे विश्वयुद्ध के शुरुआती चरण में भी अमेरिका इस महायुद्ध से दूर ही रहा था, लेकिन जब मजबूरी वश उसमें शामिल हुआ तो युद्ध के परिणामों ...