शाश्वत राजकाज में मान्य योग्य वही होत है जो परहित के जाई
शाश्वत राजकाज: मान्य योग्य वही होत है जो परहित के जाई @ डॉ दिनेश चंद्र सिंह, जिलाधिकारी, बहराइच, उत्तरप्रदेश। "मान्य योग्य नहि होत कोई जो कोरे पद पाई। मान्य योग्य वही होई जो परहित के जाई।।" साधारण ढंग से अति सुंदर, कालातीत तथा चिरस्थायी भाव को उपरोक्त पंक्तियों में अभिव्यक्त किया गया है। परंतु कुछ व्यक्ति एवं परिवार मानसिक कुंठा, अवसाद, ईर्ष्या एवं निज क्रोध के कारण अपने अग्रणी, मान्य, पूज्य, सदैव जनहित व मानवीय मूल्यों की स्थापना के प्रति सजगता से कार्य करने की प्रतिबद्धता रखने वाले ऐसे व्यक्तियों को कोसते हैं, जो अनुचित है। ऐसे कुंठित लोग या समाज, जो आत्मसुख के लिए कार्य करने वाले हैं, अनुपयोगी, नितांत स्वार्थ सुख की भावना से अभिप्रेत प्रयासों के कारक हैं, की जितनी निंदा की जाए, वह कम है। आधुनिक युग के स्वार्थपरक, मात्र व्यक्तिगत हितों की प्रतिपूर्ति के लिए किए जा रहे प्रयासों को पूर्ण करने की चेष्टा रखने वालों के बारे में कुछ भी बोलना निरर्थक है। किसी मर्यादा, शिष्टाचार एवं आदमकद व्यक्ति की सुदीर्घ साधना को नितांत क्षणिक व व्यक्तिगत सुख भोग की आकां...