क्या न्यायपालिका में एआई के उपयोग से आमलोगों को न्याय मिलने में फायदा होगा? दुनियावी अनुभव से समझिए।

क्या न्यायपालिका में एआई के उपयोग से आमलोगों को न्याय मिलने में फायदा होगा? दुनियावी अनुभव से समझिए।
@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार

भारत की सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया और विभिन्न उच्च न्यायालय पहले से ही ई-कोर्ट, डिजिटल फाइलिंग, अनुवाद और न्यायिक शोध के लिए AI आधारित तकनीकों के प्रयोग की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं। AI को न्यायाधीश का विकल्प नहीं बल्कि एक "सहायक उपकरण" के रूप में देखा जा रहा है। इसलिए प्रबुद्ध लोगों के दिलोदिमाग में यह सवाल कौंध रहा है कि क्या भारतीय न्यायपालिका में एआई के उपयोग से आमलोगों को न्याय मिलने में फायदा होगा अथवा नहीं?
नाययिक मामलों के जानकार बताते हैं कि भारत की सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया और विभिन्न उच्च न्यायालय पहले से ही ई-कोर्ट, डिजिटल फाइलिंग, अनुवाद और न्यायिक शोध के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (AI) आधारित तकनीकों के प्रयोग की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं। हालांकि, AI को न्यायाधीश का विकल्प नहीं बल्कि एक "सहायक उपकरण" के रूप में देखा जा रहा है। इसलिए कहा जा सकता है कि हाँ, भारतीय न्यायपालिका में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के बढ़ते उपयोग से आम लोगों को न्याय मिलने में कई प्रकार के लाभ हो सकते हैं, लेकिन इसके साथ कुछ गंभीर चुनौतियाँ भी जुड़ी हुई हैं। सबसे पहले संभावित फायदे की बात कर लेते हैं, जो निम्नलिखित हैं:-

पहला, मुकदमों के तेजी से निपटारे में मदद: भारत में करोड़ों मामले लंबित हैं। AI दस्तावेजों की छंटनी, कानूनी शोध, पुराने फैसलों की खोज और केस प्रबंधन जैसे कार्य तेजी से कर सकता है। इससे न्यायाधीशों का समय बचेगा और मामलों के निपटारे की गति बढ़ सकती है।

दूसरा, गरीब और ग्रामीण लोगों के लिए न्याय तक पहुंच आसान: AI आधारित कानूनी चैटबॉट और डिजिटल सहायता प्रणालियाँ लोगों को उनकी कानूनी समस्याओं, अधिकारों और आवश्यक प्रक्रियाओं की जानकारी उनकी स्थानीय भाषा में दे सकती हैं। इससे कानूनी जागरूकता बढ़ेगी।

तीसरा, विभिन्न भाषाओं की बाधा कम होगी: भारत में अनेक भाषाएँ बोली जाती हैं। AI तत्काल अनुवाद और ट्रांसक्रिप्शन की सुविधा देकर अदालतों में भाषाई बाधाओं को कम कर सकता है।

चौथा, न्यायिक पारदर्शिता बढ़ सकती है: AI समान प्रकार के मामलों में दिए गए पूर्व निर्णयों का विश्लेषण करके न्यायाधीशों और वकीलों को अधिक सुसंगत दृष्टिकोण उपलब्ध करा सकता है।

पांचवां, मुकदमेबाजी की लागत घट सकती है: कई प्रारंभिक कानूनी सेवाएँ स्वचालित होने से आम नागरिकों का समय और पैसा दोनों बच सकते हैं।

जहां तक चुनौतियाँ और जोखिम की बात है तो वे इस प्रकार हैं जिन्हें समझने, बचने और इनका निर्णायक हल ढूँढने की जरूरत है-

पहला, अंतिम निर्णय AI नहीं दे सकता: न्याय केवल कानून का यांत्रिक अनुप्रयोग नहीं है; इसमें मानवीय संवेदना, सामाजिक परिस्थितियों और नैतिक पहलुओं का भी महत्व होता है। इसलिए अंतिम निर्णय न्यायाधीश द्वारा ही लिया जाना चाहिए।

दूसरा, एल्गोरिदमिक पक्षपात: यदि AI को पक्षपातपूर्ण या अधूरे डेटा पर प्रशिक्षित किया गया हो, तो उसके सुझाव भी पक्षपातपूर्ण हो सकते हैं।

तीसरा, गोपनीयता और डेटा सुरक्षा: अदालतों के रिकॉर्ड में संवेदनशील व्यक्तिगत जानकारी होती है। AI के उपयोग के साथ डेटा सुरक्षा सुनिश्चित करना आवश्यक होगा।

चौथा, डिजिटल असमानता: ग्रामीण और कम शिक्षित वर्ग के लोगों को AI आधारित सेवाओं का लाभ तभी मिलेगा जब डिजिटल साक्षरता और इंटरनेट पहुंच पर्याप्त होगी।

विशेषज्ञ बताते हैं कि भारतीय न्यायपालिका में AI का उपयोग आम लोगों को सस्ता, तेज और अधिक सुलभ न्याय दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। लेकिन न्यायिक विवेक, मानवीय संवेदना और संवैधानिक मूल्यों का स्थान AI नहीं ले सकता। लिहाजा, सबसे उपयुक्त मॉडल यही होगा कि AI न्यायाधीश का सहायक बने, न्यायाधीश का प्रतिस्थापन नहीं। दूसरे शब्दों में कहें तो, AI न्याय की गति बढ़ा सकता है, पर न्याय का अंतिम आधार अभी भी मानव बुद्धि, संवेदना और संविधान ही रहेंगे।

# क्या दुनिया के न्यायालयों से एआई अनुप्रयोग के अच्छे फीड बैक मिल रहे हैं?

सवाल है कि क्या दुनिया के न्यायालयों से एआई अनुप्रयोग के अच्छे फीड बैक मिल रहे हैं? तो जवाब होगा कि हाँ, दुनिया के कई देशों में न्यायपालिका में AI के प्रयोग से शुरुआती स्तर पर काफी सकारात्मक परिणाम देखने को मिले हैं, लेकिन इसके साथ ही कतिपय सावधानी बरतने की सलाह भी दी जा रही है। जहाँ अच्छे परिणाम मिले हैं, उनमें सिंगापुर, एस्टोनिया,  यूनाइटेड किंगडम, संयुक्त राज्य अमेरिका, चीन जैसे देश प्रमुख हैं, जिनकी चर्चा इस प्रकार होती है-
पहला, सिंगापुर: सिंगापुर ने न्यायिक प्रशासन, केस मैनेजमेंट और दस्तावेज़ विश्लेषण में AI का उपयोग किया है। इससे मामलों के प्रबंधन की गति और दक्षता में सुधार हुआ है।

दूसरा, एस्टोनिया: एस्टोनिया ई-गवर्नेंस में अग्रणी माना जाता है। वहाँ छोटे दावों (small claims) से जुड़े कुछ मामलों में AI आधारित प्रणालियों का परीक्षण किया गया, जिससे न्यायिक प्रक्रिया को सरल बनाने की कोशिश हुई।

तीसरा, यूनाइटेड किंगडम: वहाँ की अदालतें AI का उपयोग कानूनी शोध, दस्तावेज़ों की समीक्षा और न्यायिक कार्यभार कम करने के लिए कर रही हैं। न्यायाधीशों को निर्णय लेने में सहायता मिलती है, हालांकि अंतिम फैसला मानव न्यायाधीश ही देते हैं।

चौथा, संयुक्त राज्य अमेरिका: अमेरिका में AI आधारित कानूनी शोध उपकरण और दस्तावेज़ विश्लेषण प्रणालियाँ व्यापक रूप से उपयोग में हैं। इससे वकीलों और अदालतों का समय बचा है। हालांकि कुछ जोखिम मूल्यांकन (risk assessment) प्रणालियों में पक्षपात के आरोप भी लगे हैं।

पांचवां, चीन: चीन ने "स्मार्ट कोर्ट" की अवधारणा विकसित की है, जहाँ AI मुकदमों के दस्तावेज़ तैयार करने, साक्ष्यों को व्यवस्थित करने और ऑनलाइन सुनवाई में सहायता करता है। इससे दक्षता बढ़ी है, लेकिन पारदर्शिता और स्वतंत्रता को लेकर बहस भी हुई है।

जहां तक प्रमुख सकारात्मक फीडबैक मिलने की बात है तो उपर्युक्त देशों की न्यायपालिका को जहां लंबित मामलों के प्रबंधन में सहायता मिली है, कानूनी शोध का समय कम हुआ है, दस्तावेज़ों के विश्लेषण में तेजी आई है, वहीं 
न्यायिक प्रशासन की लागत में कमी और आम नागरिकों के लिए न्यायिक सेवाओं तक आसान पहुँच संभव हुआ है। 

इसके बावजूद कतिपय प्रमुख चिंताएँ हमें कुछ अलग सोचने पर सावधान करती हैं- क्योंकि AI के "हैलुसिनेशन" (गलत या काल्पनिक जानकारी उत्पन्न करना) का खतरा है, एल्गोरिद्मिक पक्षपात संभव है, निर्णय प्रक्रिया की पारदर्शिता और डेटा सुरक्षा और गोपनीयता सवालों के घेरे में है। साथ ही न्यायिक स्वतंत्रता पर संभावित प्रभाव चिंता पैदा करता है।

यदि सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष की बात करें तो दुनिया भर से जो फीडबैक सामने आया है, उसका सार यह है कि AI न्यायाधीश का अच्छा सहायक (Assistant) साबित हो रहा है, लेकिन न्यायाधीश का विकल्प (Replacement) नहीं। अधिकांश न्यायिक प्रणालियाँ मानती हैं कि तकनीक से न्याय की गति और दक्षता बढ़ सकती है, परंतु न्याय के अंतिम निर्णय में मानवीय विवेक, संवेदनशीलता और जवाबदेही अनिवार्य हैं। इसी कारण अधिकांश लोकतांत्रिक देशों की न्यायपालिकाएँ "Human-in-the-Loop" मॉडल अपना रही हैं, जिसमें AI सुझाव देता है, लेकिन अंतिम निर्णय मानव न्यायाधीश ही लेते हैं।


#  "राजनैतिकदुनिया डॉट ब्लॉग्स्पॉट डॉट कॉम" वैचारिक क्रांति का अग्रदूत है, इसलिए जनसहयोग अपेक्षित

बृहत्तर भारत, शांतिप्रिय विश्व की अवधारणा को मजबूत करने की मुहिम को समर्पित "राजनैतिकदुनिया डॉट ब्लॉग्स्पॉट डॉट कॉम" वैचारिक क्रांति का अग्रदूत है। विश्व व्यापी जनजागृति के निमित्त इसका लिंक फेसबुक, एक्स (ट्वीटर), लिंक्डइन, थ्रेड्स, इंस्टाग्राम, यूट्यूब, व्हाट्सएप आदि पर भी साझा किया जाता है, जो हर वक्त उपलब्ध है। 

जबतक अखंड भारत नया आकार नहीं लेगा और पूर्वी एशिया एवं पश्चिमी एशिया में भारत का वसुधैव कुटुंब कम वाला भाव मजबूत नहीं होगा, तबतक विश्वव्यापी संकट हमें प्रभावित/प्रताड़ित करते रहेंगे। लिहाजा, मजबूत और विस्तृत भारत का निर्माण हमारा भी लक्ष्य होना चाहिए। बिल्कुल पड़ोसी चीन की तरह। तिब्बत के बिना भी भारत असुरक्षित ही रहेगा। 

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