भाजपा के चाणक्य अमित शाह की सियासी सफलता के अहम सूत्र और संभावित चुनौतियों को समझिए

भाजपा के चाणक्य अमित शाह की सियासी सफलता के अहम सूत्र और संभावित चुनौतियों को समझिए
@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

केंद्रीय गृहमंत्री और भाजपा के शीर्ष रणनीतिकार अमित शाह की सियासी सफलता के महत्वपूर्ण सूत्र क्या हैं, इसे समझने में अब हर किसी की दिलचस्पी बढ़ी है, क्योंकि राजनीतिक महकमें में उनको अक्सर “भाजपा का चाणक्य” कहा जाता है। खासकर उनकी अभूतपूर्व चुनावी रणनीति और कुशल संगठनात्मक क्षमता की तोड़ आज किसी भी विपक्षी दल के पास नहीं है। पहले दिल्ली, फिर बंगाल को उन्होंने जिस चुनौती पूर्ण तरीके से जीता है और बिहार में सम्राट चौधरी के नेतृत्व वाली भाजपाई सरकार बनवाई है, उससे अब भाजपा में उनके धुर विरोधी राजनेता भी पस्त नजर आ रहे हैं। वहीं मोदी-शाह का सियासी जलवा बुलंदियों के शीर्ष पर पहुंचने को कटिबद्ध है। 

स्वाभाविक सवाल है कि अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक चक्रब्यूह में लगातार घिरते जा रहे भारत ने और उसका विकल्प बनती जा रही भाजपा ने आंतरिक सियासत में जो मजबूत पकड़ बनाई है, उससे विदेशी-स्वदेशी षड्यंत्रकारी बेचैन दिखाई पड़ रहे हैं। राष्ट्रवाद की आंधी में और देशभक्ति के जज्बे में तमाम सांप्रदायिक और जातीय मंसूबे ध्वस्त होते जा रहे हैं, साथ ही क्षेत्रीय क्षत्रप भी लगातार ढहते जा रहे हैं। इसे पीछे यदि कोई है तो वह है टीम मोदी-शाह की अपराजेय संकल्पशक्ति। आरएसएस-भाजपा का संगठनात्मक लक्ष्य और अहम लक्षित मुद्दे, जिससे हर भारतीयों का भविष्य जुड़ा है। 

यही वजह है कि औद्योगिक घरानों से लेकर प्रशासनिक ठिकानों और राजनीतिक टापुओं पर भाजपा के शीर्ष रणनीतिकार अमित की संसदीय दहाड़ और मंचीय पुकार हर दिल में प्रतिध्वनित हो रही है।  वास्तव में उनकी राजनीतिक सफलता के पीछे कई कारण माने जाते हैं, जिसका दूसरा कोई सानी नहीं! योगी आदित्यनाथ, सम्राट चौधरी, देवेंद्र फडणवीस, सुवेन्दु अधिकारी, हिमंता विश्व सरमा जैसे अनगिनत प्रमुख चेहरों में आपको मोदी-शाह वाला जुनून ही दिखाई देगा। 

इसकी मुख्य वजहें निम्नलिखित हैं:- पहली, माइक्रो-मैनेजमेंट और बूथ-लेवल संगठन: अमित शाह की शैली बहुत डेटा-और-संगठन आधारित मानी जाती है। वे चुनाव को सिर्फ बड़े भाषणों से नहीं, बल्कि बूथ स्तर तक कार्यकर्ताओं की तैनाती, मतदाता वर्गीकरण और स्थानीय समीकरणों से जोड़कर देखते हैं। दूसरी, मजबूत संगठन निर्माण; भारतीय जनता पार्टी में सदस्यता विस्तार, स्थानीय नेतृत्व को सक्रिय करना और लगातार चुनावी मशीनरी को चलाए रखना उनकी ताकत मानी जाती है। कई राज्यों में पार्टी का विस्तार इसी मॉडल से हुआ।

तीसरी, स्पष्ट राजनीतिक लक्ष्य और आक्रामक रणनीति: वे अक्सर “विंनबिलिटी” यानी जीतने की संभावना) पर फोकस करते दिखते हैं—कौन उम्मीदवार, कौन गठबंधन, कौन सा मुद्दा किस क्षेत्र में काम करेगा, इस पर बहुत व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाने की छवि है। चौथी, डेटा और फीडबैक पर जोर: राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि शाह की टीम लगातार जमीनी रिपोर्ट, सर्वे और फीडबैक लेती है, जिससे रणनीति जल्दी बदली जा सके।

पांचवीं, नरेंद्र मोदी के साथ मजबूत तालमेल: उनकी सफलता को अक्सर मोदी-शाह जोड़ी के संदर्भ में देखा जाता है—जहाँ मोदी जन-अपील और संदेश पर केंद्रित रहे, वहीं शाह संगठन और चुनावी क्रियान्वयन पर। छठी, जोखिम लेने की प्रवृत्ति: जिन राज्यों में भाजपा पारंपरिक रूप से कमजोर थी, वहाँ भी आक्रामक विस्तार की रणनीति अपनाई गई।

हालाँकि उनके धुर आलोचक यह भी कहते पाए जाते हैं कि उनकी सफलता सिर्फ व्यक्तिगत रणनीति नहीं, बल्कि पार्टी संसाधन, नेतृत्व, विपक्ष की कमजोरी, मीडिया रणनीति और व्यापक राजनीतिक माहौल का भी परिणाम है। जबकि उनके कट्टर समर्थक इसे उनकी असाधारण संगठनात्मक क्षमता मानते हैं। संक्षेप में कहें तो अमित शाह की सफलता का “राज” अक्सर संगठन, डेटा,  बूथ मैनेजमेंट, राजनीतिक टाइमिंग, अनुशासित क्रियान्वयन का मिश्रण माना जाता है।

सच कहूं तो राम मंदिर निर्माण, जम्मू-कश्मीर से धारा 370 की विदाई, सामाजिक संतुलन जनित समावेशी विकास और अब तक हुए अभूतपूर्व कानूनी बदलाव के नजरिए से और भावी राजनीतिक प्राथमिकताओं की वजह से 
अमित शाह का राजनीतिक भविष्य “उज्ज्वल” माना जाता है, और उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हनुमान यानी स्वाभाविक उत्तराधिकारी के तौर पर चित्रित किया जाता  है। चूंकि यह दृष्टिकोण व्यक्ति व्यक्ति के नजरिए और भारतीय लोकतंत्र के समक्ष आये दिन बनती बिगड़ती परिस्थितियों पर निर्भर करता है। फिर भी यदि राजनीतिक विश्लेषण के आधार पर देखें, तो कई कारण हैं जिनकी वजह से लोग मानते हैं कि उनका भविष्य मजबूत है। इसके कई कारण हैं- 

पहला, पार्टी संगठन पर मजबूत पकड़: भारतीय जनता पार्टी में अमित शाह को एक कुशल चुनावी रणनीतिकार माना जाता है। कई राज्यों में पार्टी विस्तार और चुनावी प्रबंधन में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही है। वे संगठन और कैडर मैनेजमेंट में प्रभावशाली माने जाते हैं। दूसरा, केंद्रीय सत्ता में अहम भूमिका: वे लंबे समय से केंद्र सरकार में गृह मंत्री जैसे शक्तिशाली पद पर हैं और सुरक्षा, आंतरिक नीति व चुनावी रणनीति में प्रमुख चेहरा बने हुए हैं। हाल के वर्षों में भी वे राज्यों के चुनावी अभियानों में सक्रिय रहे हैं। 

तीसरा, शीर्ष नेतृत्व के करीबी: अमित शाह को अक्सर नरेंद्र मोदी के सबसे भरोसेमंद सहयोगियों में गिना जाता है। भाजपा में नेतृत्व की निरंतरता के लिहाज़ से यह उनकी राजनीतिक स्थिति को मजबूत बनाता है। चौथा, राष्ट्रीय स्तर पर पहचान: वे केवल एक मंत्री नहीं बल्कि भाजपा की रणनीतिक राजनीति के प्रमुख चेहरों में हैं। पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु जैसे राज्यों में पार्टी विस्तार की कोशिशों में भी उनकी बड़ी भूमिका दिखाई देती है। 

लेकिन दूसरी तरफ कुछ चुनौतियाँ भी हैं: पहली, उनकी लोकप्रियता जननेता वाली छवि से अधिक “रणनीतिकार” की मानी जाती है; यानी संगठन में मजबूत, पर जन-अपील को लेकर मतभेद हैं। दूसरी, विपक्ष उनकी नीतियों और निर्णयों की आलोचना करता है, जिससे उनकी स्वीकार्यता पर राजनीतिक बहस बनी रहती है। लिहाजा, भाजपा में भविष्य का नेतृत्व कैसा होगा, यह पार्टी की आंतरिक राजनीति और चुनावी प्रदर्शन पर निर्भर करेगा।

फिर भी यदि सरल शब्दों में कहें तो अगर भाजपा राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत रहती है और अमित शाह संगठन व सत्ता के केंद्र में बने रहते हैं, तो उनका राजनीतिक भविष्य काफी प्रभावशाली माना जा सकता है। लेकिन राजनीति में परिस्थितियाँ तेजी से बदलती हैं, इसलिए इसे निश्चित भविष्यवाणी नहीं कहा जा सकता। भले ही अमित शाह की भाजपा में स्थिति मजबूत मानी जाती है, लेकिन उनकी राह पूरी तरह आसान नहीं है। वास्तविक चुनौतियाँ कई स्तरों पर देखी जाती हैं- पार्टी के भीतर, चुनावी राजनीति में, और राष्ट्रीय माहौल में। लिहाजा, कतिपय मुख्य चुनौतियाँ निम्नलिखित हो सकती हैं:

पहली, नेतृत्व उत्तराधिकार: नरेंद्र मोदी के बाद भाजपा का शीर्ष नेतृत्व कैसा होगा, यह बड़ा सवाल है। भाजपा में कई वरिष्ठ और प्रभावशाली नेता हैं। यदि भविष्य में नेतृत्व परिवर्तन की चर्चा तेज होती है, तो अलग-अलग शक्ति केंद्र उभर सकते हैं। ऐसे में संतुलन बनाना चुनौती हो सकती है।
दूसरी, चुनावी प्रदर्शन पर निर्भरता: अमित शाह की सबसे बड़ी पहचान चुनावी रणनीतिकार की रही है। अगर भाजपा लगातार बड़े चुनाव जीतती है, तो उनकी स्थिति मजबूत रहती है; लेकिन महत्वपूर्ण राज्यों या राष्ट्रीय स्तर पर कमजोर प्रदर्शन होने पर रणनीति पर सवाल उठ सकते हैं।

तीसरी, राज्यों में क्षेत्रीय सीमाएँ: भाजपा कुछ राज्यों में अभी भी सीमित प्रभाव रखती है- जैसे दक्षिण भारत के कुछ हिस्से या ऐसे राज्य जहाँ मजबूत क्षेत्रीय दल हैं। संगठन विस्तार की चुनौती सीधे तौर पर उनके राजनीतिक मूल्यांकन से जुड़ती है। चौथी, पार्टी के भीतर संतुलन: 
भाजपा बड़ी पार्टी है, जिसमें अलग-अलग राज्यों के शक्तिशाली नेता, मुख्यमंत्री और संगठनात्मक धड़े हैं। केंद्रीय नेतृत्व और क्षेत्रीय आकांक्षाओं के बीच संतुलन बनाए रखना हमेशा आसान नहीं होता।

पांचवीं, नीतिगत और प्रशासनिक आलोचना: गृह मंत्री के रूप में सुरक्षा, कानून-व्यवस्था, सीमा, सामाजिक तनाव जैसे मुद्दों पर लिए गए फैसलों की लगातार राजनीतिक समीक्षा होती है। किसी बड़े विवाद या प्रशासनिक विफलता का राजनीतिक असर पड़ सकता है। छठी, पीढ़ीगत बदलाव: भाजपा में नई पीढ़ी के नेता भी उभर रहे हैं। लंबे समय में पार्टी नेतृत्व का स्वरूप बदल सकता है, जिससे वरिष्ठ नेताओं की भूमिकाएँ भी पुनर्परिभाषित हो सकती हैं।

'सातवीं, विपक्षी नैरेटिव और गठबंधन राजनीति: अगर विपक्ष अधिक एकजुट होता है या राज्य स्तर पर मजबूत गठबंधन बनते हैं, तो भाजपा की चुनावी मशीनरी के सामने नई चुनौतियाँ पैदा हो सकती हैं। हालाँकि, दूसरी तरफ यह भी सच है कि अमित शाह की संगठन क्षमता, पार्टी पर पकड़ और शीर्ष नेतृत्व के साथ तालमेल उन्हें भाजपा के सबसे प्रभावशाली नेताओं में बनाए रखता है। इसलिए चुनौती और ताकत- दोनों साथ-साथ मौजूद हैं।

बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि भाजपा के अंदर की चुनौती और या राष्ट्रीय राजनीति की चुनौती से अमित शाह कितनी कुशलतापूर्वक निपटते हैं। चूंकि राजनीति में “चुनौती” हमेशा सीधी प्रतिस्पर्धा नहीं होती, बल्कि कभी नेतृत्व, प्रभाव, जनाधार, या नीति-निर्माण के स्तर पर भी होती है। ऐसा इसलिए कि पहला, भाजपा के भीतर संभावित प्रभावशाली चेहरे की कमी नहीं है। ऐसे में अगर भविष्य में भाजपा में नेतृत्व संतुलन या नई पीढ़ी का सवाल उठता है, तो कुछ नाम राजनीतिक विश्लेषण में चर्चा में आते हैं: योगी आदित्यनाथ: मजबूत जनाधार, हिंदुत्व की स्पष्ट छवि, और बड़े राज्य का नेतृत्व उन्हें राष्ट्रीय स्तर का महत्वपूर्ण चेहरा बनाता है। राजनाथ सिंह: वरिष्ठता, संगठनात्मक अनुभव और व्यापक स्वीकार्यता के कारण प्रभावशाली बने रहते हैं। नितिन गडकरी: प्रशासनिक कामकाज और अपेक्षाकृत सर्वस्वीकार्य छवि के कारण अक्सर चर्चा में रहते हैं। शिवराज सिंह चौहान, देवेंद्र फडणवीस, सम्राट चौधरी या अन्य बड़े राज्यों के नेता में से अगर किसी नेता का राष्ट्रीय प्रभाव बढ़ता है, तो शक्ति-संतुलन बदल सकता है। हालाँकि, भाजपा में नेतृत्व आमतौर पर संगठनात्मक निर्णयों से तय होता है, खुली प्रतिस्पर्धा की शैली कम दिखाई देती है।

दूसरा, विपक्षी नेताओं से राजनीतिक चुनौती: राष्ट्रीय राजनीति में अमित शाह की रणनीतिक भूमिका को देखते हुए विपक्ष के प्रमुख नेता भी अप्रत्यक्ष चुनौती माने जा सकते हैं: राहुल गांधी: अगर विपक्षी राजनीति और गठबंधन मजबूत होते हैं। ममता बनर्जी: क्षेत्रीय राजनीति और भाजपा-विरोधी मोर्चे में प्रभावशाली भूमिका।
अरविंद केजरीवाल, अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव या अन्य क्षेत्रीय नेता- राज्य आधारित चुनावों में भाजपा की रणनीति को चुनौती दे सकते हैं।

तीसरा, सबसे बड़ी चुनौती: व्यक्ति नहीं, परिस्थितियाँ
कई राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि अमित शाह के लिए सबसे बड़ी चुनौती किसी एक नेता से ज़्यादा यह हो सकती है: भाजपा का चुनावी प्रदर्शन, नेतृत्व परिवर्तन की राजनीति, राज्यों में पार्टी विस्तार की सीमाएँ, जनमत और राजनीतिक माहौल में बदलाव, क्योंकि भाजपा में अमित शाह की ताकत सिर्फ व्यक्तिगत लोकप्रियता नहीं, बल्कि संगठन और चुनावी रणनीति पर पकड़ भी मानी जाती है। इसलिए भविष्य की राजनीति में चुनौती “कौन” से ज़्यादा “कैसी परिस्थितियाँ बनती हैं” पर निर्भर करेगा। लेकिन बस यह भी ध्यान रहे कि यह विश्लेषण है, कोई निर्विवाद “राज” नहीं।

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