आखिर भारत-अमेरिका के सम्बन्धों में भरोसे का अभाव क्यों है? समझिए
@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
भारत और अमेरिका आज रणनीतिक साझेदार जरूर हैं, लेकिन दोनों के रिश्तों में पूरी तरह “विश्वास” अभी भी नहीं बन पाया है, भले ही वो लाख डिप्लोमैटिक नौटंकी कर लें। इसका कारण केवल वर्तमान राष्ट्रपति ट्रंफ की अटपटी कूटनीति जनित राजनीति ही नहीं, बल्कि अमेरिका से जुड़ा दशकों का ऐतिहासिक अनुभव, भू-राजनीतिक हितों का टकराव और अलग-अलग रणनीतिक सोच है। लिहाजा, द्विपक्षीय रिश्तों को मजबूती देने में फूंक-फूंक कर कदम रखना भारतीय रणनीतिकारों के लिए जरूरी है। 21वीं सदी केकूटनीतिक उतार-चढ़ाव भी इसी बातकी चुगली करते हैं।
आइए एक नजर डालते हैं अमेरिका-भारत के पारस्परिक रिश्तों से जुड़े कूटनीतिक चूहे-बिल्ली के खेल पर:-
पहला, शीत युद्ध की तल्ख विरासत: स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत ने “गुटनिरपेक्ष नीति” अपनाई, जबकि अमेरिका चाहता था कि भारत खुलकर पश्चिमी खेमे में आए। लिहाजा, अमेरिका ने उस दौर में पाकिस्तान को अपना सैन्य सहयोगी बनाया। फलस्वरूप पाकिस्तान को हथियार, आर्थिक सहायता और रणनीतिक समर्थन मिला, जिससे भारत में यह धारणा बनी कि अमेरिका दक्षिण एशिया में भारत की सुरक्षा चिंताओं को गंभीरता से नहीं समझता।विशेषकर 1971 के भारत-पाक युद्ध के दौरान अमेरिका का पाकिस्तान-समर्थक रुख भारत की रणनीतिक स्मृति में आज भी मौजूद है। उस समय यूएसएस एंटरप्राइज (USS Enterprise) को बंगाल की खाड़ी में भेजना भारत में दबाव की राजनीति के रूप में देखा गया। जबकि रूस ने भारत के पक्ष में खड़ा होकर अमेरिका को वापस लौटने पर विवश कर दिया। इसलिए जब अमेरिका, भारत-रूस में दूरी पैदा करने वाली चाल चलता है तो भारत सावधान हो जाता है।
दूसरा, पाकिस्तान नीति पर गहरा अविश्वास: भारत को हमेशा लगा कि अमेरिका आतंकवाद और पाकिस्तान के मुद्दे पर “दोहरी नीति” अपनाता रहा है। एक ओर अमेरिका आतंकवाद विरोध की बात करता है, तो दूसरी ओर वर्षों तक पाकिस्तान को सैन्य सहायता देता रहा। वहीं, अफगानिस्तान युद्ध के दौरान पाकिस्तान को “मुख्य सहयोगी” माना गया। लिहाजा भारत के कई रणनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि अमेरिका ने पाकिस्तान की “डीप स्टेट" (deep state) को लंबे समय तक नजरअंदाज किया। इसके अलावा, ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी वही नीति अपनाई, जिससे भारत की नजर में गैरजिम्मेदार और मौकापरस्त सहयोगी बन गया।
तीसरा, भारत पर लगाए गए आर्थिक प्रतिबंधों का इतिहास: भारत के परमाणु परीक्षणों के बाद अमेरिका ने भारत पर प्रतिबंध लगाए थे। साल 1998 के पोखरण परमाणु परीक्षण के बाद भारत में यह संदेश गया कि अमेरिका भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को सीमित करना चाहता है। हालांकि बाद में दोनों देशों के बीच असैन्य परमाणु समझौता हुआ, लेकिन अविश्वास की परत पूरी तरह खत्म नहीं हुई।
चतुर्थ, अमेरिका की “हित-आधारित” विदेश नीति से भारत सतर्कता बरतता: भारत में एक धारणा यह भी है कि अमेरिका स्थायी मित्रता से ज्यादा अपने हितों को प्राथमिकता देता है। उदाहरण: कभी चीन को रोकने के लिए भारत की जरूरत, तक कभी चीन से व्यापारिक समझौते।कभी लोकतंत्र की बात, तो कभी सामरिक समझौते। लिहाजा, इस उतार-चढ़ाव वाली अमेरिकी नीति से भारत सतर्क रहता है।
पांचवां, रूस के साथ भारत के भरोसेमंद संबंध: भारत दशकों से रूस के साथ रक्षा और ऊर्जा संबंध बनाए हुए है। लेकिन अमेरिका कई बार रूस के खिलाफ अपने प्रतिबंधों और नीतियों के कारण भारत पर अप्रत्यक्ष दबाव डालता दिखा। भारत इसे अपनी रणनीतिक स्वायत्तता में हस्तक्षेप के रूप में देखता है और अकसर सावधानी बरतता है।
छठा, भारत व अमेरिका में वैचारिक और रणनीतिक अंतर:भारत “बहुध्रुवीय विश्व” चाहता है, जबकि अमेरिका लंबे समय तक वैश्विक नेतृत्व की केंद्रीय भूमिका बनाए रखना चाहता रहा है। भारत, क्वाड (QUAD) में भी है, ब्रिक्स (BRICS) में भी है और एससीओ (SCO) में भी है।यह दिखाता है कि भारत किसी एक खेमे में पूरी तरह नहीं जाना चाहता। यही भारत की गुटनिरपेक्षता की नीति है। रणनीतिक स्वायत्तता भरी चाल है।
सातवां, तकनीक और खुफिया साझेदारी में सीमित विश्वास: हालांकि भारत और अमेरिका में रक्षा और तकनीकी सहयोग तेजी से बढ़ा है, फिर भी संवेदनशील तकनीक साझा करने में अमेरिका सावधानी बरतता है। वह डेटा सुरक्षा, खुफिया साझेदारी की सीमाएं, और सप्लाई चेन निर्भरता में भी कलाबाजी दिखाता है। लिहाजा इन मुद्दों पर दोनों पक्ष अभी भी पूरी तरह सहज नहीं हैं।
आठवां, और अंतिम सवाल है कि इन उतार-चढ़ाव के बावजूद भी रिश्ते क्यों मजबूत हो रहे हैं? तो जवाब होगा कि भारत-अमेरिका संबंध तेजी से मजबूत हो रहे हैं क्योंकि दोनों देश चीन के बढ़ते प्रभाव को चुनौती मानते हैं, और इसलिए हिंद-प्रशांत क्षेत्र में दोनों देशों का पारस्परिक सहयोग जरूरी है।टेक्नोलॉजी, एआई, सेमीकंडक्टर, रक्षा उत्पादन में साझा हित हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं के रूप में दोनों की वैश्विक उपयोगिता बढ़ी है। आज संबंध “मजबूरियों और हितों की साझेदारी” से आगे बढ़कर “रणनीतिक सहयोग” तक पहुंचे हैं, लेकिन अभी भी “पूर्ण भरोसे वाले गठबंधन” की स्थिति नहीं बनी है। इसलिए भारत की नीति का सार यही है कि“सहयोग करो, लेकिन निर्भर मत बनो।”
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