आखिर डॉनल्ड ट्रंफ के प्रेममय-नफरती बयानों पर पूर्ण भरोसा कैसे करे भारत?

आखिर डॉनल्ड ट्रंफ के प्रेममय-नफरती बयानों पर पूर्ण भरोसा कैसे करे भारत?
@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

जब अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो भारत के तीन दिवसीय दौरे पर रहे, तब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को अपना ‘‘महान’’ मित्र बताते हुए गत रविवार की रात कहा कि भारत उन पर ‘‘100 प्रतिशत भरोसा’’ कर सकता है। इसलिए सवाल उठता है कि आखिर डॉनल्ड ट्रंफ के प्रेममय-नफरती बयानों के दृष्टिगत भारत, अमेरिका पर पूर्ण भरोसा कैसे करे?
उल्लेखनीय है कि ट्रंप ने अमेरिका की स्वतंत्रता की 250वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में भारत मंडपम में आयोजित एक कार्यक्रम के क्रम में उपर्युक्त टिप्पणियां कीं। इस कार्यक्रम में भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर, अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रूबियो और अमेरिका के राजदूत सर्जियो गोर मौजूद थे। इसी क्रम में राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने गोर के साथ फोन पर बातचीत में कहा, ‘‘मैं सभी को नमस्कार कहना चाहता हूं। मुझे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बहुत पसंद हैं, मोदी महान हैं, वह मेरे मित्र हैं और मैं सभी को एक अच्छी शाम की शुभकामनाएं देना चाहता हूं।’’ उन्होंने आगे कहा, ‘‘मैं प्रधानमंत्री मोदी का बहुत बड़ा प्रशंसक हूं।’’
गौरतलब है कि अमेरिकी राजदूत गोर ने ट्रंप की टिप्पणी सुनाने के लिए अपना फोन माइक्रोफोन के पास रखा। इस दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा, ‘‘हम भारत के पहले कभी इतने करीब नहीं रहे और भारत मुझ पर तथा हमारे देश पर 100 प्रतिशत भरोसा कर सकता है। यदि उन्हें कभी मदद की जरूरत पड़े, तो वे जानते हैं कि कहां फोन करना है - वे यहीं फोन करेंगे।’’ ट्रंप ने यह भी दावा किया कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था अच्छा प्रदर्शन कर रही है। उन्होंने कहा, ‘‘हम अच्छा कर रहे हैं, हम रिकॉर्ड बना रहे हैं। हमारे पास रिकॉर्ड अर्थव्यवस्था और रिकॉर्ड शेयर बाजार है।’’ कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण रहमान की प्रस्तुति रही, जिसमें उन्होंने ‘‘दिल से’’, ‘‘मां तुझे सलाम’’ और ‘‘तेरे बिना’’ जैसे लोकप्रिय गीत गाए। 

वहीं, अपने संबोधन में ट्रंप ने रूबियो को ‘‘अमेरिका के इतिहास का सबसे महान विदेश मंत्री’’ बताया और अंत में कहा, ‘‘प्रधानमंत्री मोदी को मेरा नमस्कार कहना और उन्हें बताना कि मैं उनका बहुत बड़ा प्रशंसक हूं।’’ अपने संक्षिप्त संबोधन में रूबियो ने भारत को अमेरिका का एक प्रमुख साझेदार बताया। ऐसे में सवाल उठता है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंफ ने भारत और भारत की नीतियों को लेकर कई बार आलोचनात्मक या नकारात्मक टिप्पणियाँ की हैं। 

हालांकि वे कई मौकों पर भारत और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ भी करते रहे हैं, लेकिन व्यापार, टैरिफ, रूस से संबंध और आव्रजन जैसे मुद्दों पर उन्होंने कठोर बयान दिए हैं। उनकी मुख्य नकारात्मक टिप्पणियाँ इस प्रकार हैं: पहला, भारत को “Tariff King” और “Very High Tariff Nation” कहना: ट्रंप ने कई बार कहा कि भारत दुनिया के सबसे ज्यादा टैरिफ लगाने वाले देशों में है। उन्होंने भारत को “Tariff King” कहा और आरोप लगाया कि भारत अमेरिकी उत्पादों पर बहुत अधिक शुल्क लगाता है। 

दूसरा, 2025 में भारत पर 26% टैरिफ लगाने की घोषणा करते समय ट्रंप ने कहा: “You’re a friend of mine, but you’re not treating us right.”अर्थात भारत अमेरिका के साथ निष्पक्ष व्यापार नहीं कर रहा।
तीसरा, भारत के व्यापारिक अवरोधों को “obnoxious” कहना: ट्रंप ने कहा कि भारत के “non-monetary trade barriers” यानी गैर-शुल्क व्यापारिक नियम बेहद कठिन और परेशान करने वाले हैं। 

चौथा, भारत पर “one-sided relationship” का आरोप:
उन्होंने कहा कि भारत वर्षों तक अमेरिका के साथ “एकतरफा फायदा” उठाता रहा। ट्रंप के अनुसार भारत अमेरिका में अपने उत्पाद बेचता रहा, लेकिन अमेरिकी कंपनियों को भारत में बराबरी का अवसर नहीं मिला। 
पांचवां, रूस से तेल खरीदने पर नाराज़गी: ट्रंप ने भारत की रूस से ऊर्जा खरीद पर भी हमला बोला। उन्होंने कहा कि भारत “Russia’s largest buyer of ENERGY” में से एक है और इसे लेकर “all things are not good.” 

छठा, भारत पर भारी टैरिफ लगाने की धमकी और कार्रवाई: उन्होंने भारत पर 25%, 26% और बाद में 50% तक टैरिफ लगाने की बात कही। यह भारत की निर्यात नीति और रूस से संबंधों पर दबाव बनाने की रणनीति मानी गई। सातवां, Harley-Davidson उदाहरण देकर भारत की आलोचना: ट्रंप ने कहा कि भारत में अमेरिकी मोटरसाइकिल कंपनी Harley-Davidson को 100%-200% तक शुल्क देना पड़ता था, इसलिए उसे भारत में फैक्ट्री लगानी पड़ी। 

आठवां, भारतीय अर्थव्यवस्था पर कठोर टिप्पणियाँ: 
कुछ मौकों पर ट्रंप ने भारत की आर्थिक नीतियों और व्यापारिक व्यवस्था पर तीखी टिप्पणी की, जिसे भारतीय मीडिया में भारत विरोधी आर्थिक बयान माना गया। 
हालांकि दूसरी तरफ ट्रंप लगातार मोदी को “great friend” भी कहते रहे हैं। इसलिए उनके बयान पूरी तरह भारत-विरोधी नहीं बल्कि अधिकतर “America First” आर्थिक नीति के तहत दबाव बनाने वाले माने जाते हैं। 

यही वजह है कि भारत अमेरिका पर भरोसा कर सकता है- लेकिन “पूर्ण भरोसा” शायद नहीं। क्योंकि भारत की विदेश नीति का मूल सिद्धांत ही यही रहा है कि किसी भी महाशक्ति पर उतना ही भरोसा करो, जितना आपके राष्ट्रीय हितों के अनुकूल हो। इसलिए कई रणनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत को अमेरिका के साथ साझेदारी रखनी चाहिए, लेकिन आंख मूंदकर निर्भरता नहीं बनानी चाहिए।

यही वजह है कि अमेरिका और भारत के रिश्ते आज पहले से कहीं ज्यादा मजबूत हैं- रक्षा, टेक्नोलॉजी, इंडो-पैसिफिक, एआई, सेमीकंडक्टर, ऊर्जा और चीन-रोधी रणनीति में दोनों साथ काम कर रहे हैं। हाल ही में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो और भारतीय विदेशमंत्री सुब्रमण्यम जयशंकर की वार्ता में भी दोनों देशों ने सामरिक सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया। 

लेकिन भारत के भीतर एक बड़ा वर्ग यह भी मानता है कि अमेरिका का व्यवहार अक्सर “हित-आधारित” होता है, स्थायी मित्रता आधारित नहीं। इसके पीछे कई कारण हैं—
शीत युद्ध के दौरान अमेरिका का पाकिस्तान-समर्थन,
अफगानिस्तान दौर में पाकिस्तान को भारी सैन्य सहायता,
भारत पर समय-समय पर प्रतिबंध और दबाव, रूस से भारत के संबंधों पर अमेरिकी असहजता के अलावा
चीन के साथ अमेरिका की कभी प्रतिस्पर्धा, और कभी समझौता नीति के चलते ही भारत “रणनीतिक स्वायत्तता"  की नीति अपनाता है। 

कई शोध-पत्रों और रणनीतिक विश्लेषणों में कहा गया है कि भारत-अमेरिका संबंध गहरे तो हुए हैं, लेकिन अभी भी “पूर्ण विश्वास” वाले सैन्य गठबंधन जैसे नहीं बने हैं। भारत के लिए वास्तविकता यह है कि चीन सबसे बड़ा दीर्घकालिक सामरिक खतरा है। पाकिस्तान लगातार सुरक्षा चुनौती बना हुआ है। अमेरिका चीन को संतुलित करने में उपयोगी साझेदार है। लेकिन अमेरिका अपने हित बदलने पर नीति भी बदल सकता है। यही कारण है कि भारत आज “multi-alignment” की नीति चला रहा है—अमेरिका से तकनीक और रक्षा सहयोग, रूस से ऊर्जा और हथियार,
मध्य-पूर्व से आर्थिक साझेदारी, और ग्लोबल साउथ में अलग नेतृत्व।

कुछ विश्लेषकों का मानना है कि भारत और अमेरिका के बीच अभी भी “trust deficit” मौजूद है, खासकर तब जब अमेरिका पाकिस्तान के साथ भी सामरिक संपर्क बनाए रखता है। दूसरी ओर, चीन-पाकिस्तान संबंध आज “all-weather alliance” माने जाते हैं। हाल ही में Xi Jinping ने पाकिस्तान को “iron brother” कहा और संबंधों को “unbreakable” बताया। 

इसलिए भारत के लिए सबसे व्यावहारिक दृष्टिकोण शायद यही है:कि “अमेरिका के साथ सहयोग करो, लेकिन आत्मनिर्भर शक्ति बनो; किसी भी महाशक्ति पर इतना निर्भर मत हो जाओ कि वह आपकी रणनीतिक स्वतंत्रता तय करने लगे।” यही वजह है कि भारत QUAD में भी है और BRICS में भी; अमेरिका के साथ भी है और रूस से दूरी भी नहीं बनाता।

हालांकि, भारत मंडपम में ही भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने द्विपक्षीय रिश्तों में गर्मजोशी भरते हुए ठीक ही कहा कि अमेरिकी स्वतंत्रता की घोषणा ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता, कानून के शासन, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और जवाबदेह शासन जैसे विचारों को सामने रखा, जिन्होंने आधुनिक दुनिया को आकार दिया। उन्होंने कहा कि भारत जैसे बहुलतावादी और परामर्श आधारित समाज में इन विचारों की स्वाभाविक प्रतिध्वनि रही है। 

विदेश मंत्री जयशंकर ने आगे कहा कि दुनिया इस समय बदलाव के दौर से गुजर रही है तथा यह भारत-अमेरिका संबंधों को और मजबूत बनाने का एक अच्छा अवसर है। कार्यक्रम में रूबियो का जन्मदिन भी मनाया गया और इसका समापन अमेरिकी बैंड ‘विलेज पीपुल’ की प्रस्तुति के साथ हुआ।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इजरायल यात्रा के कूटनीतिक निहितार्थ

जनहितैषी सुझाव को शिकायत समझने की भूल न करें, अपेक्षित बदलाव के वाहक बनें

शिक्षक दिवस: जिलाधिकारी डॉ दिनेश चंद्र सिंह ने स्कूलों का औचक निरीक्षण किया और बाल बाटिका का महत्व समझाया