आखिर मुस्लिम देशों से भारत के संबंध कैसे अच्छे होंगे?

आखिर मुस्लिम देशों से भारत के संबंध कैसे अच्छे होंगे?
 
@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

हिन्दू बहुल राष्ट्र भारत और मुस्लिम बहुल देश पाकिस्तान के बीच अक्सर चलने वाले दाव-प्रतिदाव अब तलक किसी से छिपे हुए नहीं हैं। लेकिन भारत के विरोध में अक्सर गोलबंदी दिखाने वाले तुर्किये जैसे कतिपय इस्लामिक देश और उन जैसों के इशारे पर काम करने वाला अंतरराष्ट्रीय संगठन 'ओआईसी' का 'धार्मिक पक्षपाती व्यवहार' सदैव इंडियन डिप्लोमेसी के समक्ष एक दुविधा खड़ा करता आया है। 

फिर भी, रणनीतिक स्वायत्तता और कूटनीतिक तटस्थता का हिमायती देश भारत सदैव बीच का रास्ता निकालकर इस्लामिक देशों से भरोसेमंद सम्बन्ध कायम रखता आया है। बावजूद इसके, अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच शुरू हुए युद्ध के बाद भारतीय कूटनीति की जिस तरह से फजीहत हुई और देश में तेल-गैस सहित उन तमाम वस्तुओं की किल्लत हो गई, जिनका निर्बाध आवागमन अब तक होमुर्ज़ जलडमरूमध्य, ईरान/ओमान के माध्यम से होता रहता था। इससे महंगाई बढ़ी और वैश्विक मुद्रा भंडार पर जोर पड़ा।

इसलिए भारत का बौद्धिक वर्ग यह जानना चाहता है कि आखिर चीन के प्रभाव क्षेत्र में समाते मुस्लिम देशों से भारत के संबंध कैसे अच्छे होंगे? क्या भारत और चीन की प्रतिद्वंद्विता समाप्त होगी? या फिर इस्लामिक देश भी अमेरिका तथा रूस के अलावा भारत और चीन के बीच अपने-अपने निहित स्वार्थों या अमूर्त प्रतिद्वंद्विता को लेकर आपस में बंटेंगे। यही रणनीतिक स्वायत्तता की कमजोरी भी है और मजबूती भी।

उल्लेखनीय है कि पिछले साढ़े साढ़े चार दशक से मुस्लिम साम्राज्यवाद का नया स्वप्नद्रष्टा देश ईरान ने अमेरिका विरोधी रूस, चीन और उत्तरकोरिया के सहयोग से और भारत की गुटनिरपेक्षता यानी तटस्थता की नीति का परोक्ष फायदा उठाते हुए न केवल मध्य एशिया और पश्चिमी एशिया में अपनी स्थिति लगातार मजबूत की, बल्कि भारतीय उपमहाद्वीप और दक्षिण-पूर्व एशिया एवं पूर्वी एशिया व अफ्रीकी देशों को भी प्रभावित करते रहने की क्षमता हासिल कर ली है, जो काबिलेतारीफ भी है और दुःखदायी भविष्य का द्योतक भी!

ऐसा इसलिए कि जब तमाम अमेरिकी-यूरोपीय प्रतिबंधों और उन्हें मिले कई अन्य देशों के मिले-जुले समर्थन से गुजरने के बावजूद भी उसने अपनी यह अनोखी उपलब्धियां हासिल कर ली हैं और आक्रमणकारियों व षड्यंत्रकारियों को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया है, तो अब खुल्लमखुल्ला रूस, चीन, उत्तरकोरिया आदि का सहयोग मिलने के बाद वह क्या-क्या करेगा, यक्ष प्रश्न है। 

जानकार बताते हैं कि जिस तरह से उसने एकमात्र यहूदी देश इजरायल के खात्मे का बीड़ा उठाया है, उसके मित्र और संरक्षक देश अमेरिका के पश्चिम एशिया व मध्य-पूर्व एशिया में स्थित सैन्य अड्डों को नेस्तनाबूद किया है और पाकिस्तान-अफगानिस्तान से सहयोग लेने-देने की योजना बनाई है, उससे उनके मनसूबे को समझना मुश्किल नहीं है। ऐसे में चीन के इशारे पर देर-सबेर भारत के साथ भी उसकी ठन जाए तो कोई अस्वाभाविक बात नहीं होगी। 

यदि पूरी दुनिया ने ऑपरेशन सिंदूर के दरम्यान भारत का सैन्य पराक्रम देखा है तो उसने अमेरिका/इजरायल-ईरान युद्ध के दौरान ईरान के सैन्य क्षमता का आकलन भी कर लिया है। अब दो कदम आगे बढ़कर उसने अपनी मजबूती और देशवासियों की चट्टानी एकता का प्रदर्शन करते हुए  अमेरिका-इजरायल के लिए एक बड़ी चुनौती खड़ी कर डाली है। इससे उपजे वैश्विक ऊर्जा संकट और असुरक्षा बोध के चलते एशिया और यूरोप के बहुतेरे देश परेशान हो चुके हैं। महंगाई बढ़ी सो अलग। ऐसे में भारतीय कूटनीति की आलोचना करने के साथ साथ उसकी दाद भी देनी होगी।

यह कड़वा सच है कि भारत और मुस्लिम-बहुल देशों के संबंध एक ही सांप्रदायिक कारक से तय नहीं होते; बल्कि वे रणनीतिक हित, व्यापार, ऊर्जा, सुरक्षा, प्रवासी भारतीय, और घरेलू राजनीति की धारणा—इन सबके मिश्रण से बने होते हैं। भारत यह भलीभांति समझता है कि “मुस्लिम देश” भी एकसमान समूह नहीं हैं; उदाहरण के लिए सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), इंडोनेशिया, ईरान और तुर्किये के हित और प्राथमिकताएँ अलग-अलग हैं।

लिहाजा, भारत से इनके संबंध बेहतर होने की संभावना आमतौर पर निम्नलिखित रास्तों से बढ़ती है: पहला, आर्थिक परस्पर हित: खाड़ी देशों के साथ भारत का रिश्ता तेल से आगे बढ़कर निवेश, टेक्नोलॉजी, बंदरगाह, रक्षा और खाद्य सुरक्षा तक गया है। संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) और सऊदी अरब के साथ व्यापार और निवेश इसका उदाहरण हैं। चूंकि इन देशों को भी ईरान के खिलाफ भारत का रणनीतिक समर्थन चाहिए, इसलिए ये भी परस्पर मधुर सम्बन्धों के हिमायती रहते आये हैं, कुछेक अपवादों को छोड़कर।


दूसरा, प्रवासी भारतीय और श्रम संबंध: खाड़ी देशों में बड़ी भारतीय आबादी काम करती है। लिहाजा यह संबंधों को व्यावहारिक बनाए रखता है, क्योंकि दोनों पक्षों का आर्थिक हित जुड़ा रहता है। तीसरा, संतुलित विदेश नीति: भारत अक्सर अलग-अलग प्रतिद्वंद्वी देशों से समानांतर संबंध रखने की कोशिश करता है—जैसे इजरायल  और ईरान दोनों से संपर्क बनाए रखना। इससे भरोसा बन सकता है, लेकिन कभी-कभी दोनों पक्षों को भारत पर्याप्त रूप से “अपने पक्ष” में नहीं लगता। यही दुविधा भारत के लिए असुविधाजनक रहता आया है।

तीसरा, घरेलू घटनाओं की अंतरराष्ट्रीय छवि: कुछ मुस्लिम-बहुल देशों में भारत की घरेलू सामाजिक/धार्मिक खबरों पर प्रतिक्रिया होती है। हालांकि कई सरकारें व्यवहारिक हितों को प्राथमिकता देती हैं, लेकिन जनमत का असर पड़ सकता है। ऐसा इसलिए कि भारत से अलग होकर बना मुस्लिम देश पाकिस्तान और बांग्लादेश की भूमिका किसी बाधक से कम नहीं है।

सवाल है कि आखिर इस नजरिए से पाकिस्तान कितना बाधक? तो जवाब यह होगा कि पाकिस्तान कुछ मंचों पर भारत की आलोचना उठाता है, खासकर ऑर्गनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन (ओआईसी) जैसे मंचों पर। लेकिन उसकी प्रभाव क्षमता सीमित भी है, क्योंकि कई खाड़ी देशों के भारत के साथ मजबूत आर्थिक और रणनीतिक हित हैं। पिछले वर्षों में कई देशों ने भारत के साथ संबंध पाकिस्तान की स्थिति से अलग रखे हैं।

वहीं, यह भी महत्वपूर्ण सवाल है कि बांग्लादेश कितना बाधक है? तो जवाब होगा कि बांग्लादेश का मामला अलग है। भारत और बांग्लादेश के संबंधों में सीमा, नदी जल, व्यापार, प्रवासन और राजनीतिक संवेदनशीलताएँ आती-जाती रहती हैं। अगर द्विपक्षीय तनाव बढ़े तो क्षेत्रीय माहौल प्रभावित हो सकता है, लेकिन बांग्लादेश आम तौर पर मुस्लिम दुनिया में भारत के खिलाफ “नेतृत्वकारी विरोध” की भूमिका नहीं निभाता जैसा पाकिस्तान करने की कोशिश करता है।

वहीं, एक बड़ा बिंदु यह भी है कि आज कई मुस्लिम-बहुल देश विदेश नीति को धर्म-आधारित एकजुटता से अधिक राष्ट्रीय हित के आधार पर देखते हैं। इसलिए भारत के साथ उनके संबंधों का निर्धारण अक्सर ऊर्जा, निवेश, रक्षा, बाजार और भू-राजनीति से होता है—सिर्फ पाकिस्तान या बांग्लादेश की स्थिति से नहीं। अगर एक वाक्य में कहें तो भारत की सबसे मजबूत स्थिति खाड़ी में है, और सबसे कठिन संतुलन ईरान में, जो कि उसके पड़ोस में ही है। इसके अलावा, भारत को सबसे ज्यादा राजनीतिक चुनौती तुर्की से मिलती रहती है, और सबसे बड़ा भविष्य का अवसर अफ्रीका व दक्षिण-पूर्व एशिया में दिखता है।

राजनीतिक विश्लेषक बताते हैं कि भारत के “मुस्लिम-बहुल देशों” से रिश्ते एक जैसे नहीं हैं। कहीं भारत बहुत मजबूत स्थिति में है, तो कहीं संबंध संतुलन पर टिके हैं, और कहीं राजनीतिक/भूराजनीतिक चुनौतियाँ ज्यादा हैं। जहां तक खाड़ी देश (Gulf) की बात है तो भारत सबसे मजबूत 
संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), सऊदी अरब, कतर, ओमान, और कुवैत में हैं। 

जानकार बताते हैं कि इन देशों में भारत निम्नलिखित नजरिए से मजबूत है। जैसे- ऊर्जा और व्यापार: तेल-गैस आपूर्ति और बड़ा व्यापारिक बाजार। प्रवासी भारतीय: लाखों भारतीय काम करते हैं; रेमिटेंस बड़ा कारक है। रणनीतिक साझेदारी: रक्षा, निवेश, बंदरगाह, लॉजिस्टिक्स। व्यावहारिक राजनीति: खाड़ी देश अब आर्थिक विविधीकरण पर ध्यान दे रहे हैं, इसलिए भारत महत्वपूर्ण साझेदार है। 

जहां तक चुनौतियाँ की बात है तो यदि क्षेत्रीय युद्ध (जैसे ईरान-इजरायल तनाव) बढ़ता है तो भारत को संतुलन रखना मुश्किल होता है। जबकि घरेलू धार्मिक/राजनीतिक घटनाओं पर कभी-कभी जनमत आधारित प्रतिक्रिया देता है। लिहाजा भारत यहाँ सबसे मजबूत स्थिति में माना जा सकता है।

दूसरा, तुर्की: यहां राजनीतिक चुनौती ज्यादा है। तुर्किये में 
भारत व्यापार, पर्यटन, कुछ कारोबारी अवसर के नजरिए से मजबूत है। जबकि उसके शासक एरदोगान (Recep Tayyip Erdoğan) ने कई बार कश्मीर जैसे मुद्दों पर पाकिस्तान के करीब रुख दिखाया, जिससे चुनौतियाँ पैदा होती हैं। साथ ही तुर्की–पाकिस्तान रक्षा संबंध भारत के लिए चिंता का विषय रहे हैं। वहां की स्थिति राजनीतिक रूप से चुनौतीपूर्ण है, जबकि आर्थिक रूप से सीमित अवसर हैं।

तीसरा, ईरान: यह भारत के लिए रणनीतिक रूप से अहम है, लेकिन वैश्विक आतंकवाद के प्रसार में पाकिस्तान का गुरू होने के चलते इसके साथ द्विपक्षीय रिश्ते अक्सर जटिल हालात में रहते आये हैं। यहां पर भारत चाबहार बंदरगाह पर मजबूत है, जो भारत के लिए मध्य एशिया और अफ़ग़ानिस्तान पहुँच का रणनीतिक रास्ता है। इसके अलावा भारत-ईरान के बीच ऐतिहासिक सांस्कृतिक संबंध भी हैं। वहीं इससे जुड़ी कुछ चुनौतियाँ भी हैं। चूंकि अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण तेल व्यापार सीमित हुआ है, क्योंकि भारत को अपने फायदे के लिए अमेरिका और ईरान के बीच संतुलन रखना पड़ता है। यह स्थिति रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण, लेकिन उच्च जोखिम वाला संतुलन है।

चतुर्थ, दक्षिण-पूर्व एशिया के मुस्लिम-बहुल देश में भारत  के लिए अवसर ज्यादा हैं। यहां के मुख्य देश इंडोनेशिया, मलेशिया, ब्रूनेई हैं जहां पर भारत मजबूत है। इन देशों में भारत समुद्री सुरक्षा और इंडो-पैसिफिक सहयोग के साथ साथ व्यापार, शिक्षा, टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में मजबूत है। खासकर इंडोनेशिया के साथ तो भारत के ऐतिहासिक-सांस्कृतिक संबंध हैं। फिर भी यहां की कुछ चुनौतियाँ लाजिमी हैं। वह यह कि कभी-कभी धार्मिक मुद्दों पर सार्वजनिक प्रतिक्रिया होती है। जबकि मलेशिया में कुछ सरकारों के दौर में कश्मीर/घरेलू राजनीति पर आलोचना देखी गई। बावजूद इसके भारत के लिए यहां अच्छी संभावना, पर छवि-आधारित जोखिम मौजूद है।

पंचम, अफ्रीका के मुस्लिम-बहुल देश भारत के लिए बढ़ता अवसर साबित हो रहे हैं। खासकर मिस्र, मोरक्को, अल्जीरिया, नाइजीरिया और सोमालिया में भारत मजबूत स्थिति में है। यहां पर भारत दवाइयाँ, शिक्षा, आईटी, कृषि और रक्षा सहयोग के क्षेत्र में काफी मजबूत है, क्योंकि चीन के विकल्प के रूप में भारत की सकारात्मक छवि बनी है। इसलिए चीन की नाराजगी स्वाभाविक है। इससे कुछ 
चुनौतियाँ पैदा होती हैं। चूंकि इन देशों में चीन का भारी निवेश है, लिहाजा कुछ क्षेत्रों में अस्थिरता और सुरक्षा संकट की स्थिति व्याप्त है। फिर भी यह भारत के लिए उभरता अवसर है, जहां पर अभी भारत का प्रभाव बढ़ रहा है।
कुल मिलाकर भारत की स्थिति अभी अच्छी है, संतोषजनक है।

सच कहें तो भारत की सबसे मजबूत स्थिति खाड़ी देशों में है, सबसे कठिन संतुलन ईरान में है, सबसे ज्यादा राजनीतिक चुनौती तुर्की से मिलती है, और सबसे बड़ा भविष्य का अवसर अफ्रीका व दक्षिण-पूर्व एशिया में दिखता है। इसलिए भारत को अपने राष्ट्रीय हितों के प्रति चौकन्ना रहना चाहिए।

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