धर्मनिरपेक्षता की मृगतृष्णा में भटक रहा 'इंडिया गठबंधन' तोड़ रहा है सियासी दम? जानिए कैसे

धर्मनिरपेक्षता की मृगतृष्णा में भटक रहा 'इंडिया गठबंधन' तोड़ रहा है सियासी दम? जानिए कैसे
@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

धर्मनिरपेक्षता की भारतीय अवधारणा मूलतः “सर्वधर्म समभाव” और राज्य की धार्मिक निष्पक्षता पर आधारित रही है। लेकिन पिछले कई दशकों में भारतीय राजनीति के एक हिस्से ने इसे सामाजिक संतुलन के बजाय “अल्पसंख्यक तुष्टिकरण” के राजनीतिक औजार के रूप में प्रस्तुत किया। यही कारण है कि आज अनेक क्षेत्रीय और राष्ट्रीय दल वैचारिक संकट से गुजरते दिखाई दे रहे हैं। सच कहूं तो वे सभी धर्मनिरपेक्षता की मृगतृष्णा में भटक रहे हैं, 'इंडिया गठबंधन' के सहयोगी दल कांग्रेस की बेरुखी से अपना अपना सियासी दम तोड़ते जा रहे हैं! जानिए कैसे

जहां कांग्रेस ने स्वतंत्रता के बाद लंबे समय तक खुद को धर्मनिरपेक्ष राजनीति की केंद्रीय धुरी के रूप में स्थापित रखा। परंतु समय के साथ उस पर यह आरोप मजबूत होता गया कि उसने बहुसंख्यक समाज की सांस्कृतिक आकांक्षाओं को पर्याप्त महत्व नहीं दिया और वोट बैंक आधारित राजनीति को प्राथमिकता दी। इसका परिणाम यह हुआ कि भाजपा ने “सांस्कृतिक राष्ट्रवाद” और “बहुसंख्यक अस्मिता” के प्रश्न को राजनीतिक विमर्श के केंद्र में ला दिया।

आज स्थिति यह है कि जो दल कभी भाजपा के हिंदुत्व विमर्श का तीखा विरोध करते थे, वे भी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से मंदिर, सनातन परंपरा, जातीय-सामाजिक प्रतिनिधित्व और राष्ट्रवाद की भाषा बोलने लगे हैं। इससे स्पष्ट संकेत मिलता है कि भारतीय मतदाता अब केवल “धर्मनिरपेक्षता” के पारंपरिक नारों से संतुष्ट नहीं है, बल्कि वह सांस्कृतिक आत्मसम्मान और विकास के संतुलन की अपेक्षा कर रहा है।

कांग्रेस के सामने सबसे बड़ा संकट यह है कि वह अभी तक यह तय नहीं कर पाई है कि उसकी राजनीति की मूल दिशा क्या होगी—पारंपरिक अल्पसंख्यक केंद्रित गठजोड़?
सामाजिक न्याय आधारित नई राजनीति? या फिर भारतीय सांस्कृतिक चेतना के साथ सामंजस्य? यदि कांग्रेस और उसके सहयोगी दल समय रहते अपने वैचारिक ढांचे का पुनर्मूल्यांकन नहीं करते, तो उनके सामने तीन बड़े खतरे बने रहेंगे—

पहला, बहुसंख्यक समाज से लगातार बढ़ती दूरी उनके लिए सियासी चिंता का सबब बन सकती है। क्योंकि क्षेत्रीय दलों द्वारा उनके पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लगाया जा चुका है। दूसरा, भाजपा के राष्ट्रवादी विमर्श के सामने वैकल्पिक नैरेटिव का अभाव उतपन्न हो गया है। हालांकि यह भी ध्यान रखना होगा कि भारतीय लोकतंत्र केवल बहुसंख्यक या अल्पसंख्यक राजनीति पर नहीं चलता। तीसरा, अंततः जनता विकास, सुशासन, सुरक्षा, सामाजिक न्याय और राष्ट्रीय आत्मविश्वास—इन सभी का संतुलन चाहती है। 

इसलिए भविष्य उसी राजनीतिक शक्ति का होगा जो पहचान की राजनीति से ऊपर उठकर विश्वसनीय शासन मॉडल प्रस्तुत कर सके। कांग्रेस के लिए चुनौती केवल चुनाव जीतने की नहीं, बल्कि अपनी वैचारिक प्रासंगिकता बचाने की है। आने वाले वर्षों में यह स्पष्ट होगा कि वह अपने पुराने ढांचे से बाहर निकलकर नई राजनीतिक भाषा गढ़ पाती है या नहीं।

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