धर्म शासित ईरान की सामरिक-आक्रामक तैयारी व बढ़ती सैन्य क्षमता गैर इस्लामिक देशों के लिए नसीहत है, कैसे?

धर्म शासित ईरान की सामरिक-आक्रामक तैयारी व बढ़ती सैन्य क्षमता गैर इस्लामिक देशों के लिए नसीहत है, कैसे?
@ कमलेश पांडेय, वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

भारत के निकटम पड़ोसी देश ईरान की सामरिक और आक्रामक तैयारी पूरी भारत-इजरायल समेत पूरी दुनिया के लिए नसीहत बन गई है, क्योंकि उसने सीमित संसाधनों और भारी पश्चिमी प्रतिबंधों के बावजूद “असममित युद्ध” (Asymmetric Warfare) की ऐसी क्षमता विकसित कर ली, जिसने अमेरिका, इजराइल और पश्चिमी सैन्य गठबंधनों को भी नई रणनीति बनाने और उससे आगे की सोचने पर मजबूर कर दिया है। यदि समय रहते इसकी काट विकसित नहीं की गई, तो अरब देशों पर अमेरिका के बाद चीन की पकड़ मजबूत होगी, क्योंकि उसके साथ ईरान का सहयोगी रूस भी खड़ा है। 
वहीं, इस्लामिक मुल्क के नाम पर मुस्लिम देशों का अंदरूनी झुकाव भी उसकी ओर है, जिससे रूसी मित्रता और चीनी छल की चक्की में भारत के पिसने के आसार प्रबल हैं। अनुभव बताता है कि ईरान अपने पड़ोसी देशों पाकिस्तान और अफगानिस्तान पर ज्यादा भरोसा करता है और इस्लामिक नाटो का पक्षधर भी है, इसलिए ईरान के मामले में भारत की जरा सी रणनीतिक लापरवाही उसे चीनी चक्रब्यूह में घिरे अभिमन्यु वाली कर देगी, क्योंकि भारत की हिन्दू विरोधी मुस्लिम राजनीति के आर्थिक स्रोत भी इस्लामिक मुल्कों से ही जुड़े बताए जाते हैं।
पहले ईरान से भारत-इजरायल समेत शेष दुनिया को मिलने वाली प्रमुख सामरिक सीखें निम्नलिखित हैं—

पहला, आत्मनिर्भर सैन्य उत्पादन सबसे बड़ी ताकत है क्योंकि ईरान ने दशकों के प्रतिबंधों के बावजूद अपने मिसाइल, ड्रोन और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध तंत्र को घरेलू स्तर पर विकसित किया। आज उसके पास मध्य-पूर्व का सबसे बड़ा बैलिस्टिक मिसाइल भंडार माना जाता है। चूंकि वहां के लोग ज्यादा पढ़े लिखे होते हैं और ईरान ने लोकतंत्र की बजाय समानांतर कट्टर धार्मिक तंत्र विकसित कर लिया, जिससे  भारत को अवश्य सीखने की जरूरत है। क्योंकि ईरान की इस नीति का संदेश स्पष्ट है- “जो देश रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भर होगा, वही लंबे संघर्ष में टिकेगा।”

दूसरा, ड्रोन युद्ध ने युद्ध की परिभाषा ही बदल दी है, क्योंकि
ईरान ने कम लागत वाले ड्रोन को “रणनीतिक हथियार” बना दिया। उसने दिखाया कि हजारों करोड़ की एयर डिफेंस प्रणाली को सस्ते ड्रोन झुंड (swarm) से भी चुनौती दी जा सकती है। इसलिए आज अमेरिका तक स्वीकार कर रहा है कि महंगे इंटरसेप्टर मिसाइलों के मुकाबले सस्ते ड्रोन “Cost Imbalance” पैदा कर रहे हैं। 
तीसरा, युद्ध केवल हथियार नहीं, “धैर्य” से जीता जाता है, यही बात ईरान ने दुनिया को सिखलाया है। जिस तरह से उसने अमेरिका-इजरायल के यौद्धिक गुरूर को तोड़ा है, वह शोध का विषय है, क्योंकि रूस-चीन के नैतिक मदद से उसने यह सफलता हासिल की है। ईरान ने प्रत्यक्ष युद्ध से अधिक “लंबी थकाऊ लड़ाई” (War of Attrition) की रणनीति अपनाई। उसका उद्देश्य तत्काल जीत नहीं, बल्कि विरोधी की आर्थिक, सैन्य और मनोवैज्ञानिक क्षमता को थकाना रहा। यह आधुनिक युद्ध की नई वास्तविकता है—
“हर युद्ध Blitzkrieg नहीं होता; कई युद्ध विरोधी को थकाकर जीते जाते हैं।”

चौथा, कमांड सिस्टम का बैकअप अत्यंत जरूरी होता है, ताकि भारी हमलों और शीर्ष कमांडरों के मारे जाने के बावजूद ईरान का सैन्य कमांड ढांचा पूरी तरह ध्वस्त नहीं हुआ। उसने पहले से वैकल्पिक नेतृत्व और विकेंद्रीकृत कमांड संरचना तैयार कर रखी थी। यह हर राष्ट्र के लिए बड़ा संदेश है कि—“युद्ध में नेतृत्व का विकल्प पहले से तैयार होना चाहिए।”

पांचवां, मिसाइल, ड्रोन और प्रॉक्सी का संयुक्त मॉडल ही ईरानी सफलता का सूत्र है, क्योंकि ईरान ने केवल अपनी सेना पर निर्भर रहने के बजाय क्षेत्रीय नेटवर्क तैयार किया—हिजबुल्लाह, हूती और अन्य सहयोगी समूहों के माध्यम से उसने बहु-स्तरीय दबाव बनाया। यह “Hybrid Warfare” का आधुनिक मॉडल है।

छठा, समुद्री मार्गों पर नियंत्रण की शक्ति विकसित करके आक्रमणकारियों को तोड़ना ईरानी दूरदर्शिता का ही तकाजा है, क्योंकि होर्मुज जलडमरूमध्य पर ईरान का प्रभाव पूरी दुनिया की ऊर्जा सुरक्षा को प्रभावित करता है। इसी कारण अमेरिका और पश्चिम लगातार उस क्षेत्र में सैन्य उपस्थिति बढ़ाते रहे हैं। इससे यह सिद्ध होता है—“भूगोल भी उतना ही बड़ा हथियार है जितना मिसाइल।”

सातवां, तकनीकी युद्ध में सस्ता हथियार भी निर्णायक होता है, यह ईरान ने साबित कर दिया है। ईरान ने दिखाया कि हर युद्ध अत्याधुनिक स्टील्थ फाइटर से नहीं जीता जाता। कभी-कभी सस्ती, तेज और बड़ी संख्या में उपलब्ध तकनीक अधिक प्रभावी होती है। 

निष्कर्षत: ईरान की तैयारी गैर इस्लामिक दुनिया को यह सिखाती है कि आधुनिक युद्ध केवल परमाणु बम या महंगे लड़ाकू विमानों से नहीं लड़े जाते। आत्मनिर्भर रक्षा उत्पादन, ड्रोन तकनीक, मिसाइल क्षमता, साइबर-रणनीति, वैकल्पिक नेतृत्व और मनोवैज्ञानिक युद्ध—ये सब मिलकर किसी राष्ट्र को सामरिक शक्ति बनाते हैं। इसीलिए आज अमेरिका, इजराइल, रूस, चीन और भारत समेत दुनिया की बड़ी सैन्य शक्तियां भी “ईरानी मॉडल” का गंभीर अध्ययन कर रही हैं। 

एक बात और, ईरान के सामरिक मॉडल से भारत के लिए सबसे बड़ा सबक यह है कि केवल पारंपरिक सैन्य शक्ति पर्याप्त नहीं होती; दीर्घकालिक सुरक्षा के लिए “बहुस्तरीय राष्ट्रीय प्रतिरोध क्षमता” विकसित करनी पड़ती है। विशेषकर तब, जब भारत को दशकों से पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद, कट्टरपंथ और चीन-पाकिस्तान जैसे सामरिक गठबंधनों का सामना करना पड़ रहा हो।

हालांकि यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि “इस्लामिक देश” एक समान इकाई नहीं हैं। भारत के कई इस्लामी देशों—जैसे संयुक्त अरब अमीरात (UAE), सऊदी अरब, इंडोनेशिया और कतर—से मजबूत रणनीतिक और आर्थिक संबंध हैं। भारत की मुख्य सुरक्षा चुनौती कुछ कट्टरपंथी नेटवर्क, आतंकवादी संरचनाओं और शत्रुतापूर्ण राज्य-नीतियों से रही है, न कि सम्पूर्ण इस्लामी विश्व से।
भारत के लिए प्रमुख सबक इस प्रकार हैं—

पहला, आत्मनिर्भर रक्षा उत्पादन ही निर्णायक सुरक्षा :
ईरान ने प्रतिबंधों के बावजूद अपने ड्रोन, मिसाइल और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध तंत्र विकसित किए। भारत के लिए इसका अर्थ है कि विदेशी हथियारों पर अत्यधिक निर्भरता घटानी होगी। “आत्मनिर्भर भारत” को केवल नारा नहीं, बल्कि युद्धकालीन औद्योगिक क्षमता बनाना होगा। 

दूसरा, सस्ते ड्रोन बनाम महंगी सुरक्षा : ईरान ने दिखाया कि कम लागत वाले ड्रोन भी महंगी एयर डिफेंस प्रणाली को चुनौती दे सकते हैं। भारत को सीमा सुरक्षा, आतंकवाद-रोधी अभियानों और समुद्री निगरानी के लिए बड़े पैमाने पर स्वदेशी ड्रोन नेटवर्क बनाना होगा। 

तीसरा, “मोज़ेक डिफेंस” मॉडल : ईरान की विकेंद्रीकृत सैन्य संरचना—जहां शीर्ष नेतृत्व पर हमला होने के बाद भी स्थानीय इकाइयाँ लड़ती रहती हैं—भारत के लिए महत्वपूर्ण संकेत है। भारत को भी साइबर, सीमा, वायु और समुद्री मोर्चों पर ऐसी बहुस्तरीय कमांड संरचना विकसित करनी होगी जो अचानक हमले में भी सक्रिय रहे। 

चौथा, केवल सीमा नहीं, “मनोवैज्ञानिक युद्ध” भी :  आधुनिक संघर्ष अब केवल बंदूक और मिसाइल का नहीं, बल्कि सूचना और नैरेटिव का भी है। भारत को फेक न्यूज़, साइबर-प्रोपेगेंडा और धार्मिक कट्टरता आधारित डिजिटल अभियानों से निपटने के लिए राष्ट्रीय सूचना सुरक्षा ढांचा मजबूत करना होगा। 

पांचवां, लंबी लड़ाई की तैयारी :  ईरान ने दिखाया कि “War of Attrition” यानी विरोधी को धीरे-धीरे थकाना भी रणनीति हो सकती है। भारत को सीमित अवधि के युद्ध की सोच से आगे जाकर लंबे संघर्ष, आपूर्ति शृंखला और गोला-बारूद भंडारण की तैयारी करनी होगी। 

छठा, ऊर्जा सुरक्षा भी राष्ट्रीय सुरक्षा है : यदि पश्चिम एशिया में बड़ा युद्ध होता है, तो भारत की तेल आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। इसलिए सामरिक तेल भंडार, वैकल्पिक ऊर्जा और समुद्री मार्ग सुरक्षा भारत के लिए अत्यंत आवश्यक हैं। 
सातवां, “संयुक्त युद्ध” की तैयारी : आज युद्ध भूमि, समुद्र और आकाश तक सीमित नहीं है; साइबर, स्पेस और इलेक्ट्रॉनिक क्षेत्र भी युद्धक्षेत्र बन चुके हैं। भारत को थिएटर कमांड, AI आधारित निगरानी और संयुक्त सैन्य संचालन को तेज करना होगा। 

आठवां, राष्ट्रीय एकता सबसे बड़ी सुरक्षा : ईरान के उदाहरण से यह भी स्पष्ट हुआ कि बाहरी दबाव के समय आंतरिक सामाजिक एकता निर्णायक होती है। भारत जैसे विविधतापूर्ण राष्ट्र में सांप्रदायिक विभाजन, राजनीतिक ध्रुवीकरण और सामाजिक अविश्वास राष्ट्रीय सुरक्षा को कमजोर कर सकते हैं।

निष्कर्षतया यह कहा जा सकता है कि भारत के लिए सबसे बड़ा सबक यह है कि भविष्य का युद्ध केवल सेना नहीं, बल्कि पूरा राष्ट्र लड़ता है—तकनीक, अर्थव्यवस्था, साइबर क्षमता, ऊर्जा सुरक्षा, सामाजिक एकता और मनोवैज्ञानिक दृढ़ता—सब मिलकर राष्ट्रीय शक्ति बनाते हैं। ईरान ने दुनिया को यह दिखाया कि सीमित संसाधनों वाला राष्ट्र भी यदि आत्मनिर्भर, संगठित और रणनीतिक रूप से धैर्यवान हो, तो वह कहीं बड़ी शक्तियों को भी लंबे समय तक चुनौती दे सकता है।

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