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सबरीमाला प्रकरण: धर्म सम्मत न्याय दीजिए, अन्यथा लोकतांत्रिक तर्क-वितर्क भारी पड़ेगा!

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सबरीमाला प्रकरण: धर्म सम्मत न्याय दीजिए, अन्यथा लोकतांत्रिक तर्क-वितर्क भारी पड़ेगा! @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक सबरीमाला प्रकरण के बहाने भारतीय लोकतंत्र में, संसद और संविधान के दायरे में, सियासत और न्यायपालिका के मठाधीशों के नजरिए में, क्या सही है और क्या गलत? क्या जिम्मेदारी है और क्या नहीं?, यह बहस का विषय नहीं होना चाहिए, बल्कि स्पष्ट कार्रवाई नजर आनी चाहिए। या तो सियासतदान, संसद और विधानमंडलों में कानून स्पष्ट बनाएं या फिर सुलगते सवालों पर न्यायपालिका के न्यायाधीशगण स्वतः संज्ञान लेकर निष्पक्ष न्यायदेश देने की पहल करें, क्योंकि आम जनता का हित सर्वोपरि होना चाहिए।  हालांकि, व्यवहारिक कसौटी पर ये बातें पूरी तरह से खरी नहीं उतरती हैं। इसलिए अपेक्षा है कि धर्म सम्मत न्याय दीजिए, अन्यथा लोकतांत्रिक तर्क-वितर्क भारी पड़ेगा! धर्मनिरपेक्षता की आड़ में एक शांति प्रिय धर्म के बारे में  सुनवाई और दिशानिर्देश, जबकि दूसरे-तीसरे कट्टर धर्म के बारे में अपेक्षित सुनवाई पर टालमटोल ज्यादा दिन तक नहीं चलने वाला है, क्योंकि प्रबुद्ध हिंदुओं के संज्ञान में सारी ...

आखिर राज्यसभा और विधानपरिषदों में महिलाओं को क्यों नहीं मिलेगा आरक्षण? पूछ रही है आधी आबादी!

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आखिर राज्यसभा और विधानपरिषदों में महिलाओं को क्यों नहीं मिलेगा आरक्षण? पूछ रही है आधी आबादी! @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक भारतीय संसद द्वारा देश की आधी आबादी समझी जाने वाली महिलाओं को महज 33 प्रतिशत आरक्षण देने की एक सकारात्मक नीतिगत पहल तो लोकसभा और विधानसभाओं के लिए की गई, लेकिन उच्च सदन समझे जाने वाले राज्यसभा और विधान परिषदों के लिए उन्हें उनके स्वाभाविक हक से क्यों वंचित रखा गया, इसके  सियासी मायने तलाशे जाने लगे हैं।  पहला, क्या उनकी विद्वता पर हमारे नेताओं को संदेह है? दूसरा, क्या वह धनकुबेरों की जमात में शामिल नहीं हैं इसलिए इन सदनों के लिए उपयोगी नहीं समझी गईं? तीसरा, आरक्षण के भीतर दलितों, पिछड़ों और गरीब सवर्णों को आरक्षण देने की मांगों को तवज्जो देने में क्या और किसको हर्ज है? चौथा, जिसकी जितनी आबादी, उसकी उतनी हिस्सेदारी के तर्ज पर 50 प्रतिशत उन्हें आरक्षण क्यों नहीं दिया गया, जबकि कई राज्यों में त्रिस्तरीय पंचायती राज निकायों में उन्हें यह प्राप्त है? पांचवां, क्या त्रिस्तरीय पंचायती राज संस्थाओं में महिला आरक्षण की सीमित सफलता से ...

प्रतिकूल परिस्थितियों में लंबी प्रतीक्षा नहीं बल्कि अन्तःकरण की आवाज सुनकर अविलंब पहल करें : डीएम डॉ दिनेश चंद्र सिंह, आईएएस

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प्रतिकूल परिस्थितियों में लंबी प्रतीक्षा नहीं करें, अपने अन्तःकरण की आवाज सुनकर अविलंब पहल करें : डीएम डॉ दिनेश चंद्र सिंह, आईएएस जौनपुर, उत्तरप्रदेश। स्थानीय जिलाधिकारी डॉ दिनेश चंद्र सिंह, आईएएस ने गत शुक्रवार (3 अप्रैल) को शासकीय कार्यों के भ्रमण/पर्यवेक्षण के दौरान तहसील मड़ियांव के विभिन्न क्षेत्रों अंतर्गत पूल निर्माण कार्य, फार्मर रजिस्ट्री कार्य, सीएससी और अन्य प्रशासनिक कार्यों का औचक निरीक्षण करते हुए जायजा लिया। इसी क्रम में उन्होंने लोगों को एक संदेश देते हुए कर्तव्यनिष्ठ लोगों को अंगवस्त्र व मिठाई देकर सम्मानित करके उन सबका उत्साह बर्द्धन किया।  प्राप्त जानकारी के मुताबिक, डीएम डॉ सिंह ने सर्वप्रथम  बाबतपुर स्थित नवनिर्मित विशालकाय हनुमान जी का दर्शन करते हुए आशीर्वाद प्राप्त किया। ततपश्चात फार्मर रजिस्ट्री के कार्य का जायजा स्थानीय सीएससी में जाकर लिया, जिसका कुशलतापूर्वक संचालन एक दिव्यांग व्यक्ति के द्वारा किया जा रहा है। उन्होंने किसानों से बातचीत करने के बाद उस दिव्यांग व्यक्ति से बातचीत की और उनके कार्यों के महत्व के दृष्टिगत उन्हें सम...

क्या पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणाम सवर्णों के राजनीतिक-सामाजिक भविष्य को तय करेंगे?

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क्या पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणाम सवर्णों के राजनीतिक-सामाजिक भविष्य को तय करेंगे? @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक देश के पश्चिम बंगाल समेत असम, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी जैसे 5 राज्यों के विधानसभा चुनाव हो रहे हैं, जिसके मतदान/परिणाम भाजपा नीत एनडीए की भावी रीति-नीति और सवर्णों के सामाजिक-राजनीतिक भविष्य को तय करेंगे। बताया जाता है कि यदि इन चुनावों को भाजपा नीत गठबंधन जीत जाता है तो वह ओबीसी-दलित वोटरों को रिझाने के लिए सवर्ण विरोधी एजेंडों को इत्मीनान पूर्वक धार देगा! ऐसा इसलिए कि सामान्य जातियों से जुड़े सवर्ण वोटर ही भाजपा के कोर वोटर माने जाते हैं, लेकिन ओबीसी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार के रहते हुए भी जिस तरह से सवर्ण विरोधी यूजीसी इक्विटी बिल लाया गया है, उससे सामान्य जातियों के लोग अर्थात सवर्ण समुदाय का एक बड़ा तबका अपनी मुख्य पार्टी भाजपा से काफी नाराज हैं और बदलती राजनीति के बीच वे किधर करवट लेंगे, यह बात पूरी तरह से चुनाव परिणाम आने के बाद ही पता चलेगा।  राजनीतिक मामलों के जानकार बताते हैं कि अपने हिंदुत्व के एजेंडे को धार द...

आखिर नफरत भरे भाषण पर कब सजग और सक्रिय होंगे हमारे हुक्मरान? यक्ष प्रश्न

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आखिर नफरत भरे भाषण पर कब सजग और सक्रिय होंगे हमारे हुक्मरान?  यक्ष प्रश्न @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक नफरत भरे भाषण, किसी भी सभ्य समाज के लिए वैचारिक कैंसर और सामाजिक एड्स के जैसा जानलेवा है, लेकिन दुनियावी तर्ज पर भारतीय लोकतंत्र में भी यह एक बुनियादी राजनीतिक-सामाजिक फैशन बनता प्रतीत हो रहा है। कोढ़ में खाज यह कि 'बहुमत की भूखी' संसद और उसके 'इशारे पर कुछ कुछ फैसले लेने के आदी बन चुके' सुप्रीम कोर्ट ने आजादी के 8वें दशक में भी विषाक्त बयानबाजियों के खिलाफ कोई कड़ा राष्ट्रवादी स्टैंड नहीं लिया ताकि राष्ट्रीय एकता व अखंडता पर अनवरत रूप से जारी साम्राज्यवादी वैचारिक हमले की धार कुंद की जा सके! ऐसा इसलिए कि इनकी भी अपनी विवशता है! चूंकि पद और गोपनीयता की शपथ लेने वाले अधिकार संपन्न लोग ब्रितानी नौकरशाही और राजशाही के इशारे पर बने "भारतीय संविधान" को मानने को अभिशप्त हैं और अपनी व्यवहारिक और मौलिक सोच को ताखे पर रख चुके हैं, इसलिए हर जनतांत्रिक बीमारी लाइलाज हो चुकी है और भारत माता अपनी ही संतानों को निरंतर मुखाग्नि देते देते थककर ...

अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच जारी युद्ध से अंतर्राष्ट्रीय गठबंधनों पर सवालिया निशान लगा?

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अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच जारी युद्ध से अंतर्राष्ट्रीय गठबंधनों पर सवालिया निशान लगा?  @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक पश्चिमी एशिया के लिए अभिशाप साबित हो रहे ईरान-इजरायल युद्ध, कोई साधारण युद्ध नहीं बल्कि एक प्रकार का सभ्यता-संस्कृति संघर्ष है, जिसके बीज इतिहास में ही जमे हुए हैं। एक ओर जहां यह युद्ध इजरायल के लिए उसके अस्तित्व के रक्षा की लड़ाई है, वहीं दूसरी ओर यह युद्ध ईरान के लिए ईसाई मुल्कों के कथित लोकतांत्रिक-आर्थिक दांवपेंचों से ईरान को महफ़ूज रखकर अरब-खाड़ी देशों में एक मजबूत इस्लामिक साम्राज्य स्थापित करने की मन:संकल्पित सोच-समझ और ईरान से वैश्विक इस्लामिक साम्राज्यवाद का दबदबा बढ़ाने के लक्ष्य को केंद्र में रखकर लड़ी जा रही है, जो आगे भी बदस्तूर जारी रह सकती, क्योंकि ईरानी धार्मिक शासन व संगठन का एकमात्र ध्येय यही है। वहीं, पश्चिम एशिया और मध्य-पूर्व के अकूत तेल व गैस भंडार पर जिस तरह से अमेरिकी-यूरोपीय गठबंधन वर्चस्व कायम है, और अपने अपने हितों को लेकर उनके बीच भी अंतर्विरोध उपज चुका है, वह अप्रत्याशित है। जबकि मध्यपूर्व में अमेरिकी वर्चस्...

भारत में बेहतर शासन प्रणाली के लिए चीनी मॉडल को अपनाइये

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भारत में बेहतर शासन प्रणाली के लिए चीनी मॉडल को अपनाइये  @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक भारत का पड़ोसी देश चीन, रणनीतिपूर्वक पश्चिमी देशों के लोकतांत्रिक षड्यंत्रों को मात देता आया है। इससे भी भारत बहुत कुछ सीख सकता है। कहा भी जाता है कि अमेरिका को वकील और चीन को इंजीनियर चलाते हैं। यह पश्चिमी लोकतंत्र पर बहुत बड़ा व्यंग्य भी समझा जाता है। चूंकि देर-सबेर भारत का मुकाबला चीन से ही होना है तो फिर क्यों नहीं भारत चीनी शासन प्रणाली को अपनाकर खुद को उस जैसा ही मजबूत बना ले। ऐसा इसलिए कि अब्राहम परिवार का सूत्रधार अमेरिका, ईसाई-यहूदी-इस्लामिक मुल्कों में भारत को कभी आगे नहीं बढ़ने देगा। वह ब्रिटेन के ही तर्ज पर यहां जातीयता और धर्मनिरपेक्षता को हवा देगा। पक्ष-विपक्ष को शह देकर भटकाएगा। लोकतंत्र और भागीदारी की आड़ में एक दूसरे के विरुद्ध कुचक्र चलवायेगा। इसलिए भारत-चीन की दोस्ती, उतनी क्षति नहीं पहुंचाएगी, जितनी कि पश्चिमी देशों की दोगलागिरी पहुंचा चुकी है।  वहीं, पश्चिमी कुचक्रों यानी अमेरिकी-यूरोपीय षड्यंत्रों से एशिया को महफूज रखने के लिए, सावधान रहकर रू...