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आखिर ईरानी धार्मिक शासन से क्या सीख सकता है हिंदुत्व पुरोधा भारत?

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आखिर ईरानी धार्मिक शासन से क्या सीख सकता है हिंदुत्व पुरोधा भारत? @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक हिंदुत्व का प्रहरी भारत, इस्लामिक ईरानी धार्मिक शासन से कुछ रणनीतिक सबक ग्रहण कर सकता है, लेकिन भारत की 'धर्मनिरपेक्ष' संरचना को ध्यान में रखते हुए ऐसी किसी भी सोच को अमलीजामा पहनाने में पहला अड़ंगा माननीय सर्वोच्च न्यायालय ही लगाएगा! सच कहूँ तो भारत में जाति आधारित सामाजिक न्याय और धर्म आधारित अल्पसंख्यकवाद का वैधानिक बीजारोपण करके गोरे अंग्रेज तो चले गए, लेकिन भाषा आधारित क्षेत्रवाद तो काले अंग्रेजों की देन है। चूंकि इन तीनों से सम्बन्धित 'मूर्खतापूर्ण कानूनी विचार' व उससे स्थापित व्यवस्थाएं हिंदुओं के हिस्से वाले भारत में हिंदुत्व को निरंतर दीमक की तरह चाट रही हैं, जिसके सियासी दुष्प्रभाव वश राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और इसके आनुषंगिक संगठन भी अब हार्डकोर हिंदुत्व की राह से भटकते महसूस हो रहे हैं और सामाजिक न्याय, धर्मनिरपेक्षता और क्षेत्रीयता की छांव तलाशते फिर रहे हैं।  लिहाजा, हिंदुत्व के इस नैराश्यपूर्ण मोड़ पर अमेरिका-इजरायल के संयुक्त हमलों...

आखिर तेल के वैश्विक खेल से कैसे और कबतक निबटेगा भारत?

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आखिर तेल के वैश्विक खेल से कैसे और कबतक निबटेगा भारत? @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक अमेरिका की ब्रितानी साम्राज्यवादी चाहत से विकासशील दुनिया एक बार फिर संकट में फंस चुकी है। पहले कुवैत-इराक युद्ध के बहाने और अब इजरायल-ईरान युद्ध की आड़ लेकर अमेरिका ने जो युद्ध और तेल का खेल किया, उससे अमेरिकी कम्पनियां तो मालामाल हुईं, लेकिन इससे अभिशप्त विकासशील देश तबाह! वैसे तो पश्चिम और मध्य-पूर्व एशियाई देशों के बीच आपसी प्रतिस्पर्धा पैदा करके अमेरिका अपनी और अपने डॉलर की बादशाहत बनाए रखता है, और जब भी उसकी नीति को इराक, ईरान जैसे मजबूत देशों से चुनौती मिलती है तो उन्हें वह बर्बाद कर देने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ता। देखा जाए तो अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद, ड्रग्स स्मगलिंग और नानाविध उकसाऊ लोकतांत्रिक संगठन, जो धर्म और क्षेत्र के नाम पर लक्षित जगहों पर उन्माद पैदा करते आये हैं, वे सब उसके ही तो घिनौने चेहरे हैं, जिससे दुनिया अब वाकिफ हो चुकी है। उधर, जब अमेरिकी खलनीति पर पलटवार स्वरूप रूस, चीन, फ्रांस, इंग्लैंड, जर्मनी और भारत की दिलचस्पी भी अरब और खाड़ी के देशों में बढ़ी त...

भारतीय-अमेरिकी कूटनीतिक सम्बन्धों में दिखी हाजिरजवाबी के अंतरराष्ट्रीय निहितार्थ

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जितनी जल्दी अमेरिका, भारत के कूटनीतिक संदेशों को समझ लेगा, उसकी तिलमिलाहट दूर हो जाएगी! @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक वैश्विक सम्बन्धों को नया आयाम देने वाले रायसीना डायलॉग 2026 में अमेरिकी उप विदेश मंत्री क्रिस्टोफर लैंडौ के एक बेबाक से अब यह बात साफ हो चुकी है कि जब भारत के दोस्त अमेरिका जैसे हों, तो उसे बर्बाद होने के लिए चीन जैसे आस्तीन के सांपों की भी जरूरत नहीं पड़ेगी। तब शायद यूरोप और रूस मिलकर भी भारत को न बचा पाएं। ऐसा इसलिए कि जो जहर ब्रिटेन और अमेरिका जैसे साम्राज्यवादी देशों के दिलोदिमाग में भरा हुआ है, उससे न तो ब्रिटेन का कल्याण हुआ, न ही अमेरिका का होगा। हां, इनकी क्षुद्र चालों से भारतीय उपमहाद्वीप और अरब-खाड़ी देशों में भयंकर धार्मिक कलह पैदा होगी। हालांकि भारत सरकार भी इन विदेशों हरामखोर चालों से सावधान है और जो जवाबी कूटनीतिक मोर्चेबंदी करती जा रही है, वैसी बानगी अतीत में कभी नहीं दिखती। इसलिए भारत का भविष्य उज्ज्वल है। वह वीर भोग्या वसुंधरा की तर्ज पर वसुधैव कुटुम्बकम और सर्वे भवंतु सुखिनः की राह पर अग्रसर है। समकालीन कलह के लिए अमेरिका-...

उत्तरप्रदेश में भाजपा कार्यकर्ताओं के बीच उपजे असंतोष को सूझबूझ पूर्वक पाट रहे हैं योगी आदित्यनाथ!

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उत्तरप्रदेश में भाजपा कार्यकर्ताओं के बीच उपजे असंतोष को सूझबूझ पूर्वक पाट रहे हैं योगी आदित्यनाथ! @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक उत्तर प्रदेश में भाजपा के संगठनात्मक पदों और सरकारी निकायों के पदों पर नियुक्तियों में विलंब मुख्य रूप से जातीय-क्षेत्रीय संतुलन, आंतरिक खींचतान और केंद्रीय नेतृत्व के मंथन के कारण हो रहा है। इससे कार्यकर्ताओं में असंतोष बढ़ा है, हालांकि मार्च 2026 तक बड़े बदलाव की तैयारी चल रही है। आलम यह है कि प्रदेश के सभी 16 नगर निगम में 10-10 मनोनीत होने वाले पार्षदों की नियुक्ति अटकी पड़ी है, जबकि तीन साल बीतने को है। विभिन्न बोर्डों की भी यही स्थिति है। इससे विधानसभा चुनाव 2027 में पार्टी की रणनीति पर भी असर पड़ना लाजिमी है, क्योंकि अमित शाह और योगी आदित्यनाथ की रस्साकशी में कार्यकर्ताओं में निराशा है। जहां तक विलंब के प्रमुख कारण की बात है तो जातीय एवं सामाजिक समीकरण इसकी पहली वजह है। भाजपा का ओबीसी करण होने से पार्टी के वफादार कार्यकर्ताओं में रोष गहराता जा रहा है। इसका असर 2027 में होने वाले विधानसभा चुनावों और 2026 में होने वाले त्रिस्...

भारतीय राजनीति में महिलाओं की भूमिका बढ़ाने के लिए करने होंगे भगीरथ प्रयास

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भारतीय राजनीति में महिलाओं की भूमिका बढ़ाने के लिए करने होंगे भगीरथ प्रयास @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक भारतीय राजनीति में महिलाओं की भूमिका वर्तमान में सीमित है, लेकिन कानूनी सुधार, शिक्षा और सामाजिक जागरूकता से इसे मजबूत किया जा सकता है। इस दिशा बीते वर्षों में पारित हुआ महिला आरक्षण विधेयक जैसा कदम बहुत ही महत्वपूर्ण हैं, लेकिन इसके आकार लेने में अभी समय लगेगा, क्योंकि कतिपय तकनीकी बारीकियां अभी शेष हैं। आंकड़े बताते हैं कि वर्तमान लोकसभा में महिलाओं का प्रतिनिधित्व लगभग 14-15% है, जबकि राज्यसभा में 13% मात्र। वहीं पंचायती राज में 33-50% आरक्षण से स्थानीय स्तर पर सफलता मिली है, लेकिन संसदीय स्तर पर यह वैश्विक औसत (25%) से कम है। यही वजह है कि राजनीति में महिलाओं की भूमिका बढ़ाने के लिए निम्नलिखित प्रमुख उपाय करने होंगे।  पहला, अविलंब महिला आरक्षण लागू करें: नारी शक्ति वंदन अधिनियम (106वां संशोधन) भले ही 33% सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करता है, लेकिन 2026 के बाद जनगणना और परिसीमन के बाद ही यह प्रभावी होगा।  दूसरा, शिक्षा और प्रशिक्षण: महिलाओं क...

तो ग्रेटर इंडिया के संघी सपने को अब पलीता लगाएंगी ग्रेटर नेपाल, ग्रेटर बंगलादेश जैसी खतरनाक सोचें!

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तो ग्रेटर इंडिया के संघी सपने को अब पलीता लगाएंगी ग्रेटर नेपाल, ग्रेटर बंगलादेश जैसी खतरनाक सोचें! @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक आरएसएस-भाजपा के वृहत्तर भारत यानी ग्रेटर इंडिया के जवाब में हिन्दुस्तान से छिटककर अलग बने देशों में भी ग्रेटर नेपाल, ग्रेटर बंगलादेश, ग्रेटर पाकिस्तान, ग्रेटर श्रीलंका जैसे सपने देखे, दिखाए जा रहे हैं। चूंकि इन विचारों को जी-7, ब्रिक्स और ओआईसी से जुड़े शातिर देशों का शह प्राप्त है, इसलिए नई दिल्ली को रणनीतिक और कूटनीतिक मामलों में अतिशय सावधानी बरतनी होगी। भारत में जिस तरह से हिंदुत्व विरोधी धर्मनिरपेक्षता, भारत की रीढ़ समझे जाने वाले सामान्य जातियों यानी सवर्ण विरोधी सामाजिक न्याय जनित आरक्षण और भाषावाद आधारित क्षेत्रीयता को जो कानूनी शह दिए, दिलवाए जा रहे हैं, उसके पीछे भी इन्हीं ताकतों का शह है।  इतिहास साक्षी है कि भारत विरोधी मुगलिया और ब्रितानी षड्यंत्रों से हमारे वर्तमान राजनेता भी अनभिज्ञ बने रहने की कोशिश करते आए हैं और भारत एवं भारतीय उपमहाद्वीप के देशों को एकसूत्र में पिरोने हेतु दिली प्रयास नहीं करते, जिससे राष्ट...

क्या 'समाजवादी परिवार' की रिक्तता को भर पाएंगे समाजवादी पृष्ठभूमि के राजनीतिक दल?

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क्या 'समाजवादी परिवार' की रिक्तता को भर पाएंगे समाजवादी पृष्ठभूमि के राजनीतिक दल? @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक पहले कांग्रेस ने और अब भाजपा ने, जिस तरह से समाजवादी दलों को उनके साथ मिलकर बारी-बारी पूर्वक  निपटा दिया है, यह भारत की कूटनीतिक राजनीतिक परंपरा है। खासकर यह राजनेताओं व उनके कार्यकर्ताओं के लिए सियासी शोध-अनुसंधान का विषय है। ऐसा इसलिए कि पहले देश-दुनिया में समाजवादी और वामपंथी विचारधाराओं से प्रेरित दलों के बीच खुली टकराहट हुआ करती थी। जिसके दृष्टिगत भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने मध्यममार्गी राजनीति का रास्ता अख्तियार किया और देश को आजादी दिलाते हुए केंद्र-राज्य में सत्तारूढ़ होकर अपने राजनीतिक उद्देश्य में कामयाब हुई। हालांकि, कांग्रेस की दूरदर्शिता पूर्ण अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की नीतियों व अन्य कारणों से कांग्रेस सेवा दल में फूट पड़ी और 'राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ' (आरएसएस) का जन्म हुआ। जो हिंदुत्व व राष्ट्रीय विरासत पर गर्व करने वाला राष्ट्रवादी समाजसेवी संगठन है। इसी के राजनीतिक मुखौटे के रूप में पहले जनसंघ लोकप्रिय हुआ और अब भारत...