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ड्रीम बजट 2026-27: विकसित भारत के निमित्त शहरी विकास आवंटन में दृष्टिगोचर हुआ व्यापक बदलाव

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ड्रीम बजट 2026-27: विकसित भारत के निमित्त शहरी विकास आवंटन में दृष्टिगोचर हुआ व्यापक बदलाव @ अंकित जैन, सीईओ व कोफाउंडर, कोसमोस पम्पस भारत के बजट 2026-27 में शहरी विकास के लिए प्रस्तावित ₹20,000 करोड़ का आवंटन वास्तव में एक महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत देता है, लेकिन उपलब्ध जानकारी के अनुसार यह सीधे तौर पर ₹20,000 करोड़ का एकमुश्त खर्च शहरी विकास के लिए नहीं है। दरअसल, यह राशि मुख्य रूप से औद्योगिक क्षेत्रों में कार्बन कैप्चर प्रोजेक्ट्स से जुड़ी हो सकती है, जबकि शहरी विकास के लिए City Economic Regions (CER) पर 5 वर्षों में ₹5,000 करोड़ का निवेश प्रस्तावित है। हालांकि, इस व्यापक बदलाव का स्वरूप उल्लेखनीय है क्योंकि यह आवंटन पिछले बजटों से अलग है। चूंकि यह अब बड़े महानगरों से हटकर टियर-2 और टियर-3 शहरों (5 लाख से अधिक आबादी वाले) पर फोकस करता है, जहां बुनियादी ढांचे, पुनर्विकास और आर्थिक क्षेत्रों का विकास होगा। इससे छोटे शहरों में रियल एस्टेट, लॉजिस्टिक्स हब और रोजगार के अवसर बढ़ेंगे। देखा जाए तो पिछले बजटों से तुलना में यह विशेष कदम है, क्योंकि पिछले वर्षों में शह...

जातिवाद एक वैचारिक कैंसर, इससे अंतरराष्ट्रीय नुस्खे से निबटे भारत

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जातिवाद एक वैचारिक कैंसर, इससे अंतरराष्ट्रीय नुस्खे से निबटे भारत @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक भारत में जातिवाद को वैचारिक कैंसर कहना एक सशक्त रूपक है, जो इसकी गहरी जड़ों, फैलाव और विनाशकारी प्रभावों को दर्शाता है। दरअसल जातिवाद सामाजिक एकता को खोखला करता है और राजनीतिक-आर्थिक प्रगति में बाधा बनता है। इसलिए इसे जड़मूल से मिटाना अत्यन्त आवश्यक है। यदि अमेरिका, कनाडा, स्वीडन और सिंगापुर के सफल अनुप्रयोगों से भारतीय नेतृत्व कुछ सीख सके तो जातिवाद से भारत भी आसानी पूर्वक निबट सकता है।  देखा जाए तो भारत में जातिवाद एक राजनीतिक हथियार बन चुका है, क्योंकि राजनीतिक दल वोट बैंक के लिए जाति को भुनाते हैं, जिससे यह वैचारिक रूप से निरंतर मजबूत होता चला आया है। देखा जाता है कि दलगत उम्मीदवार चयन से लेकर नीतियां निर्धारित करने तक में दलीय हुक्मरानों के समक्ष जाति-आधारित प्राथमिकताएं बनी रहती हैं, जो समाज को क्यारियों में बांट देती हैं। इससे सामाजिक वैमनस्य बढ़ता है और राष्ट्रीय एकता कमजोर पड़ती है।  जातिवाद से सामाजिक विभाजन भी मजबूत होता है, क्योंकि जातिवाद ...

युवा बजट 2026-27 के आर्थिक मायने विशिष्ट, सियासी प्रभाव से विकसित भारत के सपने होंगे पूरे

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युवा बजट 2026-27 के आर्थिक मायने विशिष्ट, सियासी प्रभाववश विकसित भारत 2047 के सपने पूरे होंगे @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक भारत सरकार का 2026-27 का केंद्रीय बजट विकास, रोजगार सृजन और राजकोषीय अनुशासन पर केंद्रित है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार की वित्त मंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमण ने 1 फरवरी 2026, दिन रविवार को इसे संसद की पटल पर प्रस्तुत करके एक नया रिकॉर्ड कायम किया। लिहाजा इसके आर्थिक मायने और राजनीतिक प्रभाव महत्वपूर्ण है। इसपर बहस तेज हो गई, जो कई कारणों से अभिप्रेरित है। जहां सत्ता पक्ष ने इसे युवा शक्ति का प्रतीक बजट ठहराया, वहीं विपक्ष ने इसे अदृश्य बजट करार देते हुए जमकर आलोचना की। जहां तक कुल बजट आकार की बात है तो यह 53.5 लाख करोड़ रुपये है, जिसमें पूंजीगत व्यय 12.2 लाख करोड़ रुपये तक बढ़ाया गया। भले ही राजकोषीय घाटा जीडीपी (GDP) का 4.3% रखा गया, जो पिछले साल के 4.4% की तुलना में कुछ कम है। वहीं, जहां तक कर सुधार की बात है तो आयकर दरों में कोई बदलाव नहीं आया; जबकि नया आयकर अधिनियम 2026 अप्रैल से लागू होगा। वहीं, एफ एंड ओ (F&O) पर एसट...

भारत में सवर्ण विरोधी नीतियों को बढ़ावा देने से 'जातीय राष्ट्रवाद' को मिलेगा बल!

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भारत में सवर्ण विरोधी नीतियों को बढ़ावा देने से 'जातीय राष्ट्रवाद' को मिलेगा बल! @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक भारत में जड़ जमा चुकी जातीय सियासत से देर सबेर जातीय राष्ट्रवाद की भावना को बल मिलता प्रतीत होता है। यहां पर जिस तरह से दलित और ओबीसी नेताओं व उनके पिट्ठू बुद्धिजीवियों के द्वारा सवर्णों के खिलाफ सामाजिक विष-वमन जारी है, साहित्यिक और राजनीतिक प्रहार तेज किये जाने का प्रचलन बढ़ा है, सियासी रूप से सवर्णों को हाशिए पर धकेला जा रहा है, उनके बच्चों के लिए सरकारी शिक्षा और नौकरियों में निरंतर अवसर सीमित किये जा रहे हैं, उनको दलित-ओबीसी विरोधी कृत्य में फंसाने के लिए मजबूत कानून लाए जा रहे हैं, कतिपय दलित-ओबीसी अधिकारियों-कर्मचारियों द्वारा प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से सवर्णों के खिलाफ कार्य किये जाते हैं, इन सब बातों से तो यही महसूस किया जाता है कि ऐसा सवर्ण विरोधी संवैधानिक व व्यवहारिक षड्यंत्र अपनी सारी हदें पार करता जा रहा है। लिहाजा सवर्णों की मजबूत प्रतिक्रियाएं भी स्वाभाविक हैं। यदि समय रहते भारतीय संसद और सुप्रीम कोर्ट नहीं चेता तो भारत में सवर...

अतीत के भेदभाव पर सवर्णों के वर्तमान-भविष्य से खिलवाड़ कबतक?

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अतीत में हुए भेदभाव पर सवर्णों के वर्तमान-भविष्य को कानूनी शिकंजे में कसना न्यायसंगतता का तकाजा नहीं? @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक अतीत के भेदभाव को आधार बनाकर सवर्ण समाज के वर्तमान और भविष्य की पीढ़ियों को दंडित करने या आरक्षण जैसी नीतियों से बांधना न्यायसंगतता के सिद्धांतों के विरुद्ध प्रतीत होता है, क्योंकि यह व्यक्तिगत योग्यता को नजरअंदाज कर सामूहिक दोषारोपण करता है। इसलिए यक्ष प्रश्न है कि अतीत में हुए भेदभाव पर सवर्णों के वर्तमान-भविष्य को कानूनी शिकंजे में कसना दलित-ओबीसी नेतृत्व की न्यायसंगतता का तकाजा नहीं है! लिहाजा, उन्मुक्त हृदय से उनके मौजूदा प्रगतिशील नेताओं को गहराई पूर्वक विचार करना चाहिए और अपने पूर्वजों के प्रतिगामी नजरिए को बदलकर स्वतंत्रता, समानता व बंधुत्व के राष्ट्रव्यापी लोकतांत्रिक भाव को मजबूत करना चाहिए। अन्यथा सामाजिक विघटन को परमाण्विक प्रक्रिया तेज होगी और इससे पैदा हुए जनविद्वेष की आग में देर-सबेर हरेक शांतिप्रिय लोगों के भी झुलसने का आसन्न खतरा बना रहेगा। ऐसा इसलिए कि यह नीतिगत, वैधानिक और रणनीतिक सवाल है जिसे कूटनीतिक स्व...

विकसित भारत के दृष्टिगत आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के मायने

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विकसित भारत के दृष्टिगत आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के मायने @ कमलेश पांडेय/ वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 भारत की अर्थव्यवस्था की मजबूत स्थिति को दर्शाता है, जिसमें वैश्विक चुनौतियों के बावजूद उच्च वृद्धि दर का अनुमान है। देखा जाए तो यह बजट 2026-27 से पहले नीतिगत दिशा तय करता है और विकसित भारत 2047 के लक्ष्यों पर जोर देता है। यही वजह है कि आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में वैसे नीतिगत सुधारों पर बल दिया गया है जो आत्मनिर्भरता, रोजगार सृजन और दीर्घकालिक विकास को बढ़ावा दें। कहना न होगा कि ये सभी सुझाव वैश्विक चुनौतियों के बीच लचीलेपन और संरचनात्मक परिवर्तन पर केंद्रित हैं। जहां तक इस आर्थिक सर्वेक्षण की मुख्य विशेषताओं की बात है तो इस सर्वेक्षण में वित्त वर्ष 2026 के लिए जीडीपी वृद्धि 7.4% और जीवीए 7.3% का प्रथम अनुमान दिया गया है, जबकि एफ वाई (FY) 2027 के लिए 6.8-7.2% का पूर्वानुमान व्यक्त किया गया है। वहीं, निजी उपभोग (जीडीपी का 61.5%) और निवेश (30%) प्रमुख चालक हैं, साथ ही मुद्रास्फीति अप्रैल-दिसंबर 2025 में औसतन 1.7% रही। जबकि राजकोषीय घाटा वित्त वर्ष (FY)...

सनातन विरोधी भारतीय संविधान में संशोधन की अपेक्षाएं

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सनातन विरोधी भारतीय संविधान में संशोधन की अपेक्षाएं @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक भारतीय संविधान के कुछ प्रावधानों को यदि सनातन विरोधी षडयंत्र समझा जाता है तो यह अनायास नहीं है, क्योंकि इसके कई निर्माताओं का सार्वजनिक चरित्र संदिग्ध और हिंदुत्व विरोधी माना जाता रहा है। तत्कालीन नौकरशाहों, न्यायविदों, व उद्योगपतियों में भी ऐसे ही तत्वों की बहुतायत थी, जिससे आजादी के मौलिक उद्देश्य बता आजतक अधूरे हैं।  खास बात यह कि भले ही सत्तागत स्वार्थपूर्ति की गरज से तत्कालीन नेताओं ने सांप्रदायिक आधार पर हिन्दुस्तान व पाकिस्तान के विभाजन को स्वीकार कर लिया, लेकिन बाद में वोट बैंक की दृष्टि से जो नीतिगत  संवैधानिक शरारत की वह लोकतंत्र के मूलभूत सिद्धांत स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व को मुंह चिढ़ाने वाली प्रतीत हुई। इसके लिए संविधान निर्माता डॉ भीम राव अंबेडकर और आधुनिक भारत के निर्माता जवाहरलाल नेहरू गुट पूरी तरह से जिम्मेदार हैं। ऐसा इसलिए कि अंग्रेजों की फूट डालो और शासन करो वाली जातीय, क्षेत्रीय व धार्मिक नीतियों को स्वतंत्र भारत में हूबहू लागू कर दिया गया। ...