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आखिर पश्चिम बंगाल में 'चुनावी जंगलराज' के लिए जिम्मेदार अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई क्यों नहीं?

आखिर पश्चिम बंगाल में 'चुनावी जंगलराज' के लिए जिम्मेदार अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई क्यों नहीं? @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक पश्चिम बंगाल के मालदा जिले में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया के दौरान 7 न्यायिक अधिकारियों, जिनमें 3 महिलाएं भी शामिल थीं, के साथ हुई दुर्व्यवहार की घटना वहां के कानून-व्यवस्था और चुनावी प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाती है। चूंकि राज्य में चुनावी प्रक्रिया चल रही है और राज्य प्रशासन चुनाव आयोग के अधीन है, इसलिए मौजूदा स्थिति के लिए ममता सरकार को दोषी ठहराना न्यायोचित नहीं है।  दरअसल, मालदा के कयाचक क्षेत्र में वोटर लिस्ट से नाम हटाए जाने के विरोध में सैकड़ों लोगों ने 1 अप्रैल 2026 को दोपहर 3:30 बजे से 9 घंटे से अधिक समय तक अधिकारियों को घेर लिया। प्रदर्शनकारियों ने बीडीओ कार्यालय में अधिकारियों को बंधक बनाया, जहां उन्हें भोजन-पानी के बिना रखा गया। सुप्रीम कोर्ट ने कलकत्ता हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के पत्र पर स्वत: संज्ञान लिया। सुप्रीम कोर्ट ने राज्य के मुख्य सचिव, गृह सचिव, डीजीपी, मालदा डीएम व एसपी को कारण बताओ (शो-कॉज) नोटि...

क्या पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में टीएमसी की जमीनी रणनीति से ममता बनर्जी पुनः मारेंगी बाजी?

क्या पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में टीएमसी की जमीनी रणनीति से ममता बनर्जी पुनः मारेंगी बाजी? # मतदाताओं का 'भरोसा' बढ़ेगा तो दीदी सीएम के बाद सीधे बनेंगी पीएम: कीर्ति झा आजाद @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक भागलपुर मूल के दिल्लीवासी नेता और तृणमूल कांग्रेस के तेजतर्रार सांसद कीर्ति झा आजाद ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के संदर्भ में एक बड़ा संकेत दिया और शांडिल्य गोत्रीय ब्राह्मण मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की तारीफ करते हुए भविष्यवाणी की कि राज्य विधानसभा चुनाव में टीएमसी 250 सीटें जीतेगी और 2029 में ममता बनर्जी भारत की प्रधानमंत्री बनेंगी। यदि ऐसी राजनीतिक परिस्थिति बनती है तो पूर्वी भारत की सियासत के लिए यह शुभ घड़ी होगी।  ऐसा इसलिए कि बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव और पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री ज्योति बसु पारस्परिक दांवपेंचों की वजह से देश का प्रधानमंत्री नहीं बन पाए थे। जहां सूझबूझ वाले दूरदर्शी नेता ज्योति बसु ने कांटे के ताज पीएम पद की पेशकश को विनम्रतापूर्वक ठुकरा दिया था, वहीं लालू प्रसाद के सपनों का शिकार उत्तरप्रदेश के पूर्व मु...

जनविश्वास विधेयक क्या है? इससे किसको फायदा मिलेगा? इसके प्रभाव पर विशेषज्ञों की राय क्या है?

जनविश्वास विधेयक क्या है? इससे किसको फायदा मिलेगा? इसके प्रभाव पर विशेषज्ञों की राय क्या है? @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक "जनविश्वास विधेयक" देश का एक बड़ा विधेयक‑सुधार है, जिसका मुख्य उद्देश्य “छोटे‑मोटे” अपराधों को अपराध की श्रेणी से बाहर कर जीवन‑यापन और कारोबार को आसान बनाना है। इस विधेयक के तहत कई केंद्रीय कानूनों के सैकड़ों प्रावधानों में संशोधन करके जेल और गंभीर सजाओं की जगह जुर्माना या चेतावनी जैसे हल्के दंडों को प्राथमिकता दी जाती है।  सवाल है कि जनविश्वास विधेयक क्या है? तो जवाब होगा  कि जनविश्वास (प्रावधानों में संशोधन) विधेयक, 2026 लगभग 79 केंद्रीय कानूनों के 780 से ज़्यादा प्रावधानों में संशोधन करता है और हज़ारों छोटे‑मोटे उल्लंघनों को “अपराध” की श्रेणी से बाहर निकाल देता है या उन्हें जुर्माना/चेतावनी तक सीमित कर देता है। इसका ढांचा “विश्वास आधारित शासन” पर आधारित है, यानी मामूली तकनीकी गलतियों या बिना इरादे के हुई चूकों पर जेल‑जैसी कठोर सजा के बजाय नियमों का पालन करवाना और अनुपालन को बढ़ावा देना लक्ष्य है।  सवाल है कि इससे किसको फायदा मिल...

आखिर अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय के रहते हुए भी युद्ध अपराध को ठेंगा क्यों दिखा देते हैं वीटो धारी व उनके चहेते मजबूत देश? समझिए

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आखिर अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय के रहते हुए भी युद्ध अपराध को ठेंगा क्यों दिखा देते हैं वीटो धारी व उनके चहेते मजबूत देश? समझिए @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय के दृष्टिकोण से युद्ध अपराध ऐसे कार्य हैं जो युद्ध के दौरान "अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून" के स्पष्ट नियमों का गंभीर उल्लंघन करते हैं, जैसे निर्दोष नागरिकों, अस्पतालों, स्कूलों या सुरक्षित उद्देश्यों पर जानबूझकर हमला, यातना, संघर्षनिरत व्यक्तियों के साथ अमानवीय व्यवहार, लड़ाई में निषिद्ध हथियारों का उपयोग आदि। लिहाजा, इन अपराधों के लिए राज्य नहीं, बल्कि व्यक्ति अर्थात सैनिक, सेनाधिकारी, नेता वगैरहव्यक्तिगत रूप से जवाबदेह होते हैं। फिर भी अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय के रहते हुए भी वीटो धारी व उनके चहेते मजबूत देश युद्ध अपराध को ठेंगा क्यों दिखा देते हैं? यक्ष प्रश्न बना हुआ है।  वास्तव में, कभी अमेरिका/यूरोप तो कभी रूस/चीन की ओर से या उनके शह पर युद्ध और युद्ध अपराध होते आये हैं। पुराने युद्धों की बात यदि भूला भी दी जाए तो अमेरिका-ईरान और रूस-यूक्रेन युद्...

अमेरिका-ईरान में हुए संघर्ष विराम समझौते के वैश्विक मायने

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अमेरिका-ईरान में हुए संघर्ष विराम समझौते के वैश्विक मायने @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक अमेरिका-ईरान में हुए संघर्ष विराम के समझौते वैश्विक सुख-शांति की वापसी की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, जिससे भारत को भी राहत मिलेगी। इसलिए इसके वैश्विक मायने बेहद अहम हैं। उम्मीद है कि इसी तरह से रूस-यूक्रेन युद्ध का हल भी जल्दी निकल आएगा। देखा जाए तो ईरान की दस‑सूत्री शांति योजना मूल रूप से “संघर्षविराम” (युद्धविराम) नहीं, बल्कि युद्ध और क्षेत्रीय द्वन्द्व को स्थायी रूप से समाप्त करने की शर्तों की चौखट पेश करती है; और अमेरिका के साथ इसकी सहमति बनने पर यह वैश्विक स्तर पर कूटनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा‑संबंधी गतिशीलता को काफी हद तक बदल देगी। # जानिए ईरान की दस‑सूत्री योजना का सार-सत्य ईरान ने अमेरिका के 15‑सूत्री युद्धविराम प्रस्ताव को “अत्यधिक शर्तोंवाला” और पक्षीय ठहराते हुए खारिज कर दिया और जवाब में 10‑सूत्री “व्यावहारिक” शांति योजना पेश की, जिसमें युद्ध को स्थायी रूप से खत्म करने, प्रतिबंध हटाने और क्षेत्रीय गारंटी बनाने पर जोर दिया गया है, जिसके केंद्रीय बिंदुओं मे...

सबरीमाला प्रकरण: धर्म सम्मत न्याय दीजिए, अन्यथा लोकतांत्रिक तर्क-वितर्क भारी पड़ेगा!

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सबरीमाला प्रकरण: धर्म सम्मत न्याय दीजिए, अन्यथा लोकतांत्रिक तर्क-वितर्क भारी पड़ेगा! @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक सबरीमाला प्रकरण के बहाने भारतीय लोकतंत्र में, संसद और संविधान के दायरे में, सियासत और न्यायपालिका के मठाधीशों के नजरिए में, क्या सही है और क्या गलत? क्या जिम्मेदारी है और क्या नहीं?, यह बहस का विषय नहीं होना चाहिए, बल्कि स्पष्ट कार्रवाई नजर आनी चाहिए। या तो सियासतदान, संसद और विधानमंडलों में कानून स्पष्ट बनाएं या फिर सुलगते सवालों पर न्यायपालिका के न्यायाधीशगण स्वतः संज्ञान लेकर निष्पक्ष न्यायदेश देने की पहल करें, क्योंकि आम जनता का हित सर्वोपरि होना चाहिए।  हालांकि, व्यवहारिक कसौटी पर ये बातें पूरी तरह से खरी नहीं उतरती हैं। इसलिए अपेक्षा है कि धर्म सम्मत न्याय दीजिए, अन्यथा लोकतांत्रिक तर्क-वितर्क भारी पड़ेगा! धर्मनिरपेक्षता की आड़ में एक शांति प्रिय धर्म के बारे में  सुनवाई और दिशानिर्देश, जबकि दूसरे-तीसरे कट्टर धर्म के बारे में अपेक्षित सुनवाई पर टालमटोल ज्यादा दिन तक नहीं चलने वाला है, क्योंकि प्रबुद्ध हिंदुओं के संज्ञान में सारी ...

आखिर राज्यसभा और विधानपरिषदों में महिलाओं को क्यों नहीं मिलेगा आरक्षण? पूछ रही है आधी आबादी!

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आखिर राज्यसभा और विधानपरिषदों में महिलाओं को क्यों नहीं मिलेगा आरक्षण? पूछ रही है आधी आबादी! @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक भारतीय संसद द्वारा देश की आधी आबादी समझी जाने वाली महिलाओं को महज 33 प्रतिशत आरक्षण देने की एक सकारात्मक नीतिगत पहल तो लोकसभा और विधानसभाओं के लिए की गई, लेकिन उच्च सदन समझे जाने वाले राज्यसभा और विधान परिषदों के लिए उन्हें उनके स्वाभाविक हक से क्यों वंचित रखा गया, इसके  सियासी मायने तलाशे जाने लगे हैं।  पहला, क्या उनकी विद्वता पर हमारे नेताओं को संदेह है? दूसरा, क्या वह धनकुबेरों की जमात में शामिल नहीं हैं इसलिए इन सदनों के लिए उपयोगी नहीं समझी गईं? तीसरा, आरक्षण के भीतर दलितों, पिछड़ों और गरीब सवर्णों को आरक्षण देने की मांगों को तवज्जो देने में क्या और किसको हर्ज है? चौथा, जिसकी जितनी आबादी, उसकी उतनी हिस्सेदारी के तर्ज पर 50 प्रतिशत उन्हें आरक्षण क्यों नहीं दिया गया, जबकि कई राज्यों में त्रिस्तरीय पंचायती राज निकायों में उन्हें यह प्राप्त है? पांचवां, क्या त्रिस्तरीय पंचायती राज संस्थाओं में महिला आरक्षण की सीमित सफलता से ...